अरुणोदय होने वाला था। कली-कली पर झूम रहा, एक चंचरीक मतवाला था।। गुंजन कर रहा, प्रतीक्षा में, कब पुष्प बने कोई कलिका। मकरन्द-पान को मचल रहा, मन मोर नाच करता अलि का।। लाल-कपोल, लोल-लोचन, अधरों पर मृदु मुस्कान लिए। उपवन में एक कली आयी, सुन्दरता का वरदान लिए।। देख अधखिली सुन्दर कलिका, भँवरे के मन में आस पली। और अधर-कपोल चूमने को, षट्पद के मन में प्यास पली।। बस रूप सरोवर में देखा, और मुँह में पानी भर आया। प्रतिछाया को समझा असली, और मन ही मन में ललचाया।। आशा-विश्वास लिए पँहुचा, अधरों से अधर मिला बैठा। पर भीग गया लाचार हुआ, जल के भीतर वह जा पैंठा।। सत्यता समझ ली परछाई, कामुकता में वह छला गया। नही प्यास बुझी उस भँवरे की, इस दुनिया से वह चला गया।। |
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बुधवार, 18 जुलाई 2012
"इस दुनिया से वह चला गया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 24 अप्रैल 2012
"होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों! सात जुलाई, 2009 को यह रचना लिखी थी! इस पर नामधारी ब्लॉगरों के तो मात्र 14 कमेंट आये थे मगर बेनामी लोगों के 137 कमेंट आये। एक बार पुनः इसी रचना ज्यों की त्यों को प्रकाशित कर रहा हूँ। आशा है कि आपको पसन्द आयेगी! इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है, दल-दल दलों का जमघट। संसद में फिल्म जैसा, होता है खूब झंझट। फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे।। गुस्सा व प्यार इनका, केवल दिखावटी है। और देश-प्रेम इनका, बिल्कुल बनावटी है। बदमाश, माफिया सब इनके ही घर पलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।। खादी की केंचुली में, रिश्वत भरा हुआ मन। देंगे वहीं मदद ये, होगा जहाँ कमीशन। दिन-रात कोठियों में, घी के दिये जलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।। |
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