मोहब्बत की हसीं राहें
तुम्हारे प्यार को खुश्बू बसा, इस दिल में लाया हूँ
मोहब्बत की हसीं राहों में, यादें छोड़ आया हूँ
कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें
मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ
मेरी उल्फत की यादें, जब कभी तुम भूल जाओगे
चुभाने के लिये दिल में, मैं काँटे छोड़ आया हूँ
जहाँ में खुश्बू-ए-गुल सा महकना, घर को महकाना
तुम्हारे बन्द कमरों में, उजाले छोड़ आया हूँ
तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला
दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ
उन्हें अब दायरों में बाँधना, “बदनाम” करना है
महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ।
![]()
(गुरू सहाय भटनागर "बदनाम")
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
Linkbar
फ़ॉलोअर
सोमवार, 17 दिसंबर 2012
"ग़ज़ल - गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गुरुवार, 6 सितंबर 2012
"ग़ज़ल - गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (प्रस्तोता- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों! इन दिनों मेरी तबियत खराब चल रही है। जिसके चलते नया कुछ भी नहीं लिख पा रहा हूँ। आज प्रस्तुत है गुरूसहाय भटनागर की एक ग़ज़ल! मोहब्बत की हसीं राहें तुम्हारे प्यार को खुश्बू बसा, इस दिल में लाया हूँ मोहब्बत की हसीं राहों में, यादें छोड़ आया हूँ कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ मेरी उल्फत की यादें, जब कभी तुम भूल जाओगे चुभाने के लिये दिल में, मैं काँटे छोड़ आया हूँ जहाँ में खुश्बू-ए-गुल सा महकना, घर को महकाना तुम्हारे बन्द कमरों में, उजाले छोड़ आया हूँ तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ उन्हें अब दायरों में बाँधना, “बदनाम” करना है महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ। ![]() (गुरू सहाय भटनागर "बदनाम") |
मंगलवार, 8 नवंबर 2011
"ग़ज़ल - गुरूसहाय भटनागर बदनाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| मोहब्बत की हसीं राहें तुम्हारे प्यार को खुश्बू बसा, इस दिल में लाया हूँ मोहब्बत की हसीं राहों में, यादें छोड़ आया हूँ कभी जब याद करके गाँव की, गलियों से गुजरेगें मैं अपनी खिल-खिलाहट के वो मंजर छोड़ आया हूँ मेरी उल्फत की यादें, जब कभी तुम भूल जाओगे चुभाने के लिये दिल में, मैं काँटे छोड़ आया हूँ जहाँ में खुश्बू-ए-गुल सा महकना, घर को महकाना तुम्हारे बन्द कमरों में, उजाले छोड़ आया हूँ तमन्नाओं को मेरी, तुमने अपना रंग दे डाला दुआयें खुशनसीबी की, तुम्हें मैं छोड़ आया हूँ उन्हें अब दायरों में बाँधना, “बदनाम” करना है महकने और महकाने को, गुलशन छोड़ आया हूँ। ![]() (गुरू सहाय भटनागर "बदनाम") |
सोमवार, 19 सितंबर 2011
"ग़ज़ल मय पीते रहे" (गुरू सहाय भटनागर "बदनाम")
![]() (गुरू सहाय भटनागर "बदनाम") हम तुम्हारे वास्ते दुनियॉ में फिर जीते रहे चाक कर अपना गिरेवॉ रात दिन सीते रहे हमने तेरी राह देखी मिलने आओगे जरूर तन्हा तुम्हारी याद में हम दिल को बहलाते रहे रात का तन्हा सफर काटा था हमने जागकर फिर सहर होते तेरी यादों को हम खोते रहे इस जहाँ के ताने जब हम सुनते-सुनते थक गये हो गये ‘बदनाम’ मय खाने में मय पीते रहे |
लोकप्रिय पोस्ट
-
लगभग 24 वर्ष पूर्व मैंने एक स्वागत गीत लिखा था। इसकी लोक-प्रियता का आभास मुझे तब हुआ, जब खटीमा ही नही इसके समीपवर्ती क्षेत्र के विद्यालयों म...
-
दोहा और रोला और कुण्डलिया दोहा दोहा , मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) मे...
-
नये साल की नयी सुबह में, कोयल आयी है घर में। कुहू-कुहू गाने वालों के, चीत्कार पसरा सुर में।। निर्लज-हठी, कुटिल-कौओं ने,...
-
समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ...
-
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं। उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं। रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घ...
-
इन्साफ की डगर पर , नेता नही चलेंगे। होगा जहाँ मुनाफा , उस ओर जा मिलेंगे।। दिल में घुसा हुआ है , दल-दल दलों का जमघट। ...
-
आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
-
"चौपाई लिखिए" बहुत समय से चौपाई के विषय में कुछ लिखने की सोच रहा था! आज प्रस्तुत है मेरा यह छोटा सा आलेख। यहाँ ...
-
मित्रों! आइए प्रत्यय और उपसर्ग के बारे में कुछ जानें। प्रत्यय= प्रति (साथ में पर बाद में)+ अय (चलनेवाला) शब्द का अर्थ है , पीछे चलन...
-
“ हिन्दी में रेफ लगाने की विधि ” अक्सर देखा जाता है कि अधिकांश व्यक्ति आधा "र" का प्रयोग करने में बहुत त्र...
