-- अन्तस के कुछ अनुभावों से, करता हूँ माँ का अभिनन्दन। शब्दों के अक्षत-सुमनों से, करता हूँ मैं माँ का वन्दन।। -- मैं क्या जानूँ लिखना-पढ़ना, नहीं जानता रचना गढ़ना, तुम हो भाव जगाने वाली, नये बिम्ब उपजाने वाली, मेरे वीराने उपवन में आ जाओ माँ बनकर चन्दन। शब्दों के अक्षत-सुमनों से, करता हूँ मैं माँ का वन्दन।। -- कितना पावन माँ का नाता, तुम वाणी हो मैं उदगाता, सुर भी तुम हो, तान
तुम्हीं हो, गीत तुम्हीं हो, गान
तुम्हीं हो, वीणा की झंकार सुना दो, तुम्हीं साधना, तुम
ही साधन। शब्दों के अक्षत-सुमनों से, करता हूँ मैं माँ का वन्दन।। -- मुझको अपना कमल बना लो, सेवक को माता अपना लो, मेरी झोली बिल्कुल खाली, दूर करो मेरी कंगाली, ज्ञान सिन्धु का कणभर दे दो, करता हूँ माता आराधन। शब्दों के अक्षत-सुमनों से, करता हूँ मैं माँ का वन्दन।। -- |
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रविवार, 18 अगस्त 2024
वन्दना "माँ का वन्दन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 10 मार्च 2023
सरस्वती वन्दना "अडिगता-सजगता का प्रण चाहता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- नही कार-बँगला, न धन
चाहता हूँ। उगे सुख का सूरज, धरा
जगमगाये, बजे शंख-घण्टे, नमाजें
अदा हों, कलम के पुजारी, कहीं सो
न जाना, -- |
शनिवार, 20 अगस्त 2022
सरस्वती वन्दना "मस्तक का अँधियार हरो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आया हूँ चरण-शरण में
माँ, सपनों को तुम साकार
करो। गुण-ज्ञानवान मुझको
करके, मन में मेरे सुविचार
भरो।। पतझड़ की मारी बगिया
में, अब सुमन खिलाओ गुलशन
में। आशा के अंकुर उपजाओ, पादप महकें चन्दन वन
में। छन्दों का मुझको वर
देकर, जड़ मस्तक का अँधियार
हरो। गुण-ज्ञानवान मुझको
करके, मन में मेरे सुविचार
भरो।। तुम शब्दस्वरूपा
सरस्वती, बहती भारत के भूतल
में। तुम सलिला मातु शारदा
हो, ज्यों योगशास्त्र पातंजल
में। विज्ञान-ज्ञान का अन्तस
में वीणावादिनी आधार धरो। गुण-ज्ञानवान मुझको
करके, मन में मेरे सुविचार
भरो।। हो निराकार-साकार मातु, तुम हो जल में, तुम
हो थल में, जीवन तुम बिन है
मरुथल सा, माँ आ जाओ वक्षस्थल
में। लेखनी-पुस्तक माला
धात्री, अब मेरा भी उद्धार
करो। गुण-ज्ञानवान मुझको
करके, मन में मेरे सुविचार
भरो।। |
रविवार, 21 नवंबर 2021
सरस्वती वन्दना "माँगता काव्य-छन्दों का वरदान हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आओ माता! सुवासित करो मेरा मन। शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।। घोर तम है भरा आज परिवेश में, सभ्यता सो गई आज तो देश में, हो रहा है सुरा से यहाँ आचमन। शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।। दो सुमेधा मुझे मैं तो अनजान हूँ, माँगता काव्य-छन्दों का वरदान हूँ, चाहता हूँ वतन में सदा हो अमन। शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।। वन्दना आपकी नित्य मैं कर रहा, शीश चरणों में, मैं आपके धर रहा, आपके दर्शनों के हैं प्यासे नयन। शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।। तान वीणा की माता सुना दीजिए, मेरे मन को सुमन अब बना दीजिए, हो हमेशा चहकता-महकता चमन। शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।। |
सोमवार, 4 जनवरी 2021
सरस्वती वन्दना "रचनाएँ रचवाती हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रोज-रोज सपनों में आकर, |
मंगलवार, 18 मार्च 2014
"माँ शब्द सरल भर दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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माँ मेरी रचना में, कुछ शब्द सरल भर दो।
गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।
दिन-रात तपस्या कर, मैंने पूजा तुमको,
जीवन भर का मेरा, संधान सफल कर दो।
गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।
कुछ भी तो नहीं मेरा, माँ सब कुछ है तेरा,
इस रीती गागर में, निज स्नेह सबल भर दो।
गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।
लिखता हूँ जो कुछ मैं, वो धूमिल हो जाता,
मसि देकर माता तुम, छवि धवल-प्रबल कर दो।
गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।
जितना माँगा मैंने, उससे है अधिक दिया,
मनके मनकों को तुम, माता उज्जवल कर दो।
गीतों के सागर से, सब दूर गरल कर दो।।
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