सहारों का भरोसा क्या, न जाने छूट जायें कब? -- अज़ब हैं रंग दुनिया के, अज़ब हैं ढंग लोगों के इशारों का भरोसा क्या, न जाने लूट जायें कब? -- चलाना संभलकर चप्पू, नदी की तेज है धारा, किनारों का भरोसा क्या, न जाने घूँट जायें कब -- न कहना राज-ए-दिल अपना, कभी सूखे सरोवर से फुहारों का भरोसा क्या, न जाने फूट जायें कब? -- दमकते “रूप” का सोना, हमारी आँख का धोखा सितारों का भरोसा क्या, न जाने टूट जायें कब? -- |
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बहुत ही सारगर्भित संदेशों और प्रेरक मार्गदर्शन दिखातीं सुंदर पंक्तियां ।
जवाब देंहटाएंग़ज़ल का एक-एक शेर सीधे दिल पे चोट करने वाला है।
जवाब देंहटाएंबहारों का भरोसा क्या, न जाने रूठ जायें कब?
जवाब देंहटाएंसहारों का भरोसा क्या, न जाने छूट जायें कब?
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अज़ब हैं रंग दुनिया के, अज़ब हैं ढंग लोगों के
इशारों का भरोसा क्या, न जाने लूट जायें कब?
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चलाना संभलकर चप्पू, नदी की तेज है धारा,
किनारों का भरोसा क्या, न जाने घूँट जायें कब
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न कहना राज-ए-दिल अपना, कभी सूखे सरोवर से
फुहारों का भरोसा क्या, न जाने फूट जायें कब?
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दमकते “रूप” का सोना, हमारी आँख का धोखा
सितारों का भरोसा क्या, न जाने टूट जायें कब?
बेहतरीन ग़ज़ल कही है रूप चंद्र शास्त्रीजी मयंक ने -एक तुकबंदी ये भी -
चुनावी हैं सभी वायदे ,वफ़ा होते नहीं दीखे
भरोसे का भरोसा क्या ,न जाने टूट जाए कब ,
kabirakhadabazarmein.blogspot.com
न कहना राज-ए-दिल अपना, कभी सूखे सरोवर से
जवाब देंहटाएंफुहारों का भरोसा क्या, न जाने फूट जायें कब?
वाह बहुत सुंदर रचना
बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय गजल
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ग़ज़ल...
जवाब देंहटाएंमाता जी की अस्वस्थता के कारण विलम्ब से यहां आने हेतु क्षमा चाहती हूं।
सादर,
डॉ. वर्षा सिंह
बहुत बहुत उम्दा ग़ज़ल आदरणीय हर शेर की अपनी अलग व्यथा है।
जवाब देंहटाएंवाह!
सुन्दर गजल
जवाब देंहटाएंअज़ब हैं रंग दुनिया के, अज़ब हैं ढंग लोगों के
जवाब देंहटाएंइशारों का भरोसा क्या, न जाने लूट जायें कब?
सुन्दर ग़ज़ल......
बेहतरीन ग़ज़ल आदरणीय।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ग़ज़ल...
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