करिये नियम-विधान से, नौ दिन तक उपवास। जगदम्बा माँ आपकी, पूर्ण करेंगी आस।। -- शुद्ध आचरण में रहे, उज्जवल चित्र-चरित्र। प्रतिदिन तन के साथ में, मन को करो पवित्र।। शाकाहारी मनुज ही, पूजा के हैं पात्र। खान-पान में शुद्धता, सिखलाते नवरात्र।। -- माता के नवरात्र हों, या हो कोई पर्व। अपने-अपने पर्व पर, होता सबको गर्व।। -- त्यौहारों की शृंखला, बना सुखद संयोग। मस्ती में उल्लास में, झूम रहे हैं लोग।। -- मत-मजहब का भूल से, मत करना उपहास। होता इनके मूल में, छिपा हुआ इतिहास।। -- त्यौहारों के नाम पर, लोक-दिखावा मात्र। पाश्चात्य परिवेश में, गुम हो गये सुपात्र।। -- करते पाठन-पठन को, विद्यालय में छात्र।। सफल वही होते सदा, जो होते हैं पात्र।। -- |
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बहुत सुंदर संदेशपूर्ण तथा प्रेरक दोहे,सार्थक सृजन, नवरात्रि की अग्रिम बधाई एवम शुभकामनाएं ।
जवाब देंहटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-4-21) को "काश में सोलह की हो जाती" (चर्चा अंक 4035) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
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कामिनी सिन्हा
बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंनवरात्रि की बहुत बहुत बधाई एव शुभकामनाएं ।
सुन्दर दोहे, नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएं
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंसुंदर संदेश, नवरात्र पर शुभकामनाएं !
जवाब देंहटाएंसुंदर और शिक्षाप्रद दोहे ।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित सृजन।
जवाब देंहटाएंनव सवंत्सर की हार्दिक शुभकामनाएं आदरणीय सर।
प्रणाम
सादर।
बहुत बढियां, नवरात्र में सुचिता का सम्मान सुपात्र ही करते हैं
जवाब देंहटाएंमाता के नवरात्र हों, या हो कोई पर्व।
जवाब देंहटाएंअपने-अपने पर्व पर, होता सबको गर्व।।
वाह!!!
बहुत ही लाजवाब सृजन...
नवसंवत्सर की अनंत शुभकामनाएं।