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जवाब देंहटाएंदिल भर आया शास्त्री जी आपकी इस काव्याभिव्यक्ति को पढ़कर।
जवाब देंहटाएंपथ से ही जो भटक गया हो वह मंजिल कैसे पा सकता है, वाकई आज के हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे, पर हर रात के बाद सवेरा आता है
जवाब देंहटाएंदशा-दिशा बदली-बदली है,
जवाब देंहटाएंनवयुग की सरगम पगली है,
पानी में प्यासी मछली है,
दूषित मन है दूषित तन है,
संकट में अब जन-जीवन है,
नाविक जब आवारा हों तो, नौका कौन बचायेगा।
नयी पौध को वो खेतों में वो, अब कैसे रोपायेगा।।..बिलकुल सही कहा आपने आदरणीय शास्त्री जी ।
आप अपना विशेष ध्यान रखें, हम सब की शुभकामनाएं आप के साथ हैं ।
बहुत सुंदर। आपको जल्द से जल्द स्वास्थ्य लाभ हो यहीं शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंवाह! बहुत ही सुंदर सृजन आदरणीय सर।
जवाब देंहटाएंसादर प्रणाम
सादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(29 -6-21) को "मन की बात नहीं कर पाया"(चर्चा अंक- 4110 ) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
सुन्दर सृजन।
जवाब देंहटाएंसुंदर हृदय स्पर्शी सृजन।
जवाब देंहटाएंअभिनव सार्थक।