सरदी पड़ती ग़ज़ब की, गया दिवाकर हार। मैदानी भूभाग में, कुहरे की है मार।। -- लकड़ी-ईंधन का हुआ, अब तो बड़ा अभाव। बदन सेंकने के लिए, कैसे जले अलाव।। -- हैं काजू-बादाम के, आसमान पर भाव। मूँगफली को खाइए, मेरा यही सुझाव।। -- शीतलता की मार से, निर्धन है भयभीत। बच्चे-बूढ़ों के लिए, कठिन झेलना शीत। -- सूखा पाला पड़ रहा, फसल रही है सूख। लगती अधिक गरीब को, कंगाली में भूख।। -- नीयत चाहे नेक हो, नियमन में है खोट। हथकण्डे अपना रहे, पाने को सब वोट।। -- ताल और लय के बिना, बिगड़ा सुर-आलाप। कोरोना है बन गया, दुनिया में अभिशाप।। |
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ताल और लय के बिना, बिगड़ा सुर-आलाप।
जवाब देंहटाएंकोरोना है बन गया, दुनिया में अभिशाप।।
यथार्थ पूर्ण सुन्दर सृजन ।
बहुत बढ़िया।
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(१६-१२ -२०२१) को
'पूर्णचंद्र का अंतिम प्रहर '(चर्चा अंक-४२८०) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
बेहतरीन दोहे।
जवाब देंहटाएंप्रणाम शस्त्री जी, बहुत खूब लिखे दोहे, नीयत चाहे नेक हो, नियमन में है खोट।
जवाब देंहटाएंहथकण्डे अपना रहे, पाने को सब वोट।।
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ताल और लय के बिना, बिगड़ा सुर-आलाप।
कोरोना है बन गया, दुनिया में अभिशाप।।----वाह
सुंदर सृजन।
जवाब देंहटाएंसमसामयिक परिस्थितियों पर सुंदर दोहा भावपूर्ण. अभिव्यक्ति सर।
जवाब देंहटाएंसादर।
सूखा पाला पड़ रहा, फसल रही है सूख।
जवाब देंहटाएंलगती अधिक गरीब को, कंगाली में भूख।।
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नीयत चाहे नेक हो, नियमन में है खोट।
हथकण्डे अपना रहे, पाने को सब वोट।।
--बहुत ही सटीक एव़ सार्थक दोहे...
वाह!!!
बहुत ही खूबसूरत सृजन
जवाब देंहटाएंजाड़े में गरीब की व्यथा दर्शाते सुन्दर दोहे !
जवाब देंहटाएंकोई भी आफत आये वह गरीब का घर ही पूछती है
जवाब देंहटाएंबहुत सही सामयिक रचना