आज विश्व गौरय्या दिवस है! मित्रों! खेतों में विष भरा हुआ है, ज़हरीले हैं ताल-तलय्या। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या? -- अन्न उगाने के लालच में, ज़हर भरी हम खाद लगाते, खाकर जहरीले भोजन को, रोगों को हम पास बुलाते, घटती जाती हैं दुनिया में, अपनी ये प्यारी गौरय्या। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- चिड़िया का तो छोटा तन है, छोटे तन में छोटा मन है, विष को नहीं पचा पाती है, इसीलिए तो मर जाती है, सुबह जगाने वाली जग को, अपनी ये प्यारी गौरय्या।। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- गिद्धों के अस्तित्व लुप्त हैं, चिड़ियाएँ भी अब विलुप्त हैं, खुशियों में मातम पसरा है, अपनी बंजर हुई धरा है, नहीं दिखाई देती हमको, अपनी ये प्यारी गौरय्या।। दाना-दुनका खाने वाली, कैसे बचे यहाँ गौरय्या?? -- |
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गौरैया के संरक्षण की बहुत आवश्यकता है, उसी को केंद्रित कर लिखी गयी अनुपम रचना।
जवाब देंहटाएंगौरैया के संरक्षण और उन्हें सहेजने के प्रति
जवाब देंहटाएंसचेत करती सुंदर और प्रभावी रचना
सादर
बहुत शानदार रचना ... सदैव समसामयिक है आदरणीय 🙏
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर सृजन ।
जवाब देंहटाएंसुबह जगाने वाली जग को,
जवाब देंहटाएंअपनी ये प्यारी गौरय्या।।
दाना-दुनका खाने वाली,
कैसे बचे यहाँ गौरय्या?
विचारणीय प्रश्न है,गौरेया को समर्पित सुंदर सृजन आदरणीय सर,सादर नमन
शानदार चिंतन परक रचना।
जवाब देंहटाएंगौरैया, बिन तेरे आँगन सूना
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