सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार। करके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार।१। सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास। मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२। श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस। सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३। चलना ही है ज़िन्दग़ी, रुकना तो हैं मौत। सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।४। |
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सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
जवाब देंहटाएंकरके पूजा-जाप को, लो बुहार घर-बार।१।
सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।
वाह शास्त्री जी बहुत गहन अर्थ समेटे सार्थक दोहे
शिक्षाप्रद दोहे |
जवाब देंहटाएंनिकम्मों को न मोहे |
सादर ||
बड़े ही शिक्षाप्रद..
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया ...!!
जवाब देंहटाएंउत्कृष्ट अभिव्यक्ति ...
सुन्दर, स्वच्छ, सरल कविता, जो अच्छी तरह बुहारे हुए स्वच्छ निर्मल मन से लिखी गयी है...
जवाब देंहटाएंसुंदर सीख...अनुकरणीय
जवाब देंहटाएंसुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
जवाब देंहटाएंकरके पूजा-जाप को, लो बुहार घर-बार।१।
सुंदर दोहे...शिक्षाप्रद...
सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
जवाब देंहटाएंकरके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार...
Very motivating...
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प्रेरक सटीक सार्थक दोहे,
जवाब देंहटाएंसार्थक सीख देते दोहे
जवाब देंहटाएंअत्यंत सुन्दर सार्थक दोहे....
जवाब देंहटाएंसादर
प्रभात का सु-स्वागतम
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