लीक पीटने का कहीं, छूट न जाय रिवाज। मना रहा है इसलिए, महिला-दिवस समाज।। -- जग में अब भी हो रहे, मौखिक जोड़-घटाव। कैसे होगा दूर फिर, लिंग-भेद का भाव। -- नारी की अपनी अलग, कैसे हो पहचान। ढोती है वो उमर भर, साजन का उपनाम।। -- सीमाओँ में है बँधी, नारी की आवाज। नारी की कमनीयता, कमजोरी है आज।। -- सदियों से महिलाओं का, होता मर्दन मान। अहंकार का पुरुष में, अब भी भाव प्रधान।। केवल कागज-कलम में, नारी दुर्गा-रूप। मान नहीं उसको मिला, पोथी के अनुरूप।। -- अब तक भी परिवेश में, आया नहीं सुधार। केवल हैं कानून में, नारी के अधिकार।। -- शक्ति-स्वरूपा हो भले, माता का अवतार। नारी की सुनता नहीं, कोई करुण पुकार।। -- आओ महिलादिवस पर, ऐसे करें उपाय। जग में नारी-जाति पर, कहीं न हो अन्याय।। -- |
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जब तक नारी के प्रति समाज की सोच नहीं बदलेगी तब तक परिवर्तन संभव नहीं ।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छे दोहे ।
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जवाब देंहटाएंशक्ति-स्वरूपा हो भले, माता का अवतार।
नारी की सुनता नहीं, कोई करुण पुकार।।
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आओ महिलादिवस पर, ऐसे करें उपाय।
जग में नारी-जाति पर, कहीं न हो अन्याय।। नारी के सम्मान में,सुंदर भावों भरी अनुपम कृति..आपका हृदय से आभार..
लीक पीटने का कहीं, छूट न जाय रिवाज।
जवाब देंहटाएंमना रहा है इसलिए, महिला-दिवस समाज।।
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जग में अब भी हो रहे, मौखिक जोड़-घटाव।
कैसे होगा दूर फिर, लिंग-भेद का भाव।
..चिंतनशील गंभीर विचारणीय सामयिक रचना प्रस्तुति
जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (०९-०३-२०२१) को 'मील का पत्थर ' (चर्चा अंक- ४,००० ) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
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अनीता सैनी
महिला दिवस पर प्रेरक रचना
जवाब देंहटाएंचिंतन परक दोहे नारी की दशा पर ।
जवाब देंहटाएंसुंदर सृजन आदरणीय।