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बुधवार, 8 अप्रैल 2009

"शूद्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सोच रहा हूँ-

कहाँ से शुरू करूँ,

अपनी बात,

कैसे पहुँचाऊँ?

धर्म और समाज के,

ठेकेदारों को कुछ आघात।


बड़ी मछली,

छोटी व कमजोर मछली को-निगल रही है,

फिर भी दुनिया चल रही है।


क्या यही संसार की रीति है?

क्या समाज की यही नीति है?


ईश्वर ने बनाए हैं,

तीन प्रकार के अछूत,

जो हैं पर्यावरण को,

बचाने के जीते-जागते सबूत।


शूद्र सेवक हैं ममत्व के,

ये भूखे हैं अपनत्त्व के।


लेकिन,

आधुनिक समाज ने,

पाश्चात्य सभ्यता में रंगे हुए आज ने।


इन्हें ही खाना शुरू कर दिया है,

इनकी सेवाओं का अच्छा सिला दिया है।

- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

मछली! जल का शूद्र,

अर्थात्,

पानी को साफ करने वाला,

सूअर!

विष्टा जैसी,

गन्दगी को साफ करने वाला,

और मुर्गा!

नाक-थूक आदि को साफ करने वाला।

- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

परमात्मा के बनाये हुए,

इन तीनों प्रकार के शूद्रों को,

मनुष्य,

प्रेम से खा रहा है,

और शान से-अपने को,

श्रेष्ठ और उच्च वर्ग का बता रहा है।

7 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ का बोध कराती कविता।
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. bahut hi shandar likha hai aur ek teekha prahar hai samaj ke thekedaron par.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मांसाहारी मनुष्यों पर
    इससे अच्छा
    कोई दूसरा कटाक्ष
    हो ही नहीं सकता!

    इस कविता की
    जितनी प्रशंसा की जाए,
    उतनी कम है!

    उत्तर देंहटाएं

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