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बुधवार, 8 अप्रैल 2009
"राजनीति" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मैने विश्वामित्र जैसे ऋषि को,
अपनी करतूतों से हिला दिया,
और भी न जाने,
कितनों के मन में,
काँटों का,
फूल खिला दिया।
ये लोकतन्त्र के तपस्वी,
मेरा क्या करेंगे?
कुछ करेंगे,
तो बिन-मौत मरेंगे।
मैं केवल पाप का,
वरण करती हूँ,
जब जिसका चाहूँ,
उसका हरण करती हूँ।
मैं,
कभी नही मरती हूँ,
अच्छे-अच्छों का,
शीलभंग करती हूँ।
शरीफ लोग,
हैं किस खेत की मूली?
उन्हें तो मैं,
आये दिन-
चढ़ाती हूँ शूली।
मैं,
गरीबों का नही,
केवल-
गरीबी का हित करती हूँ,
कभी लालटेन,
हाथ में लेकर,
साइकिल की सवारी करती हूँ।
मेरी दया, प्रेम, सत्य, अहिंसा में,
कभी भी,
नही रही प्रीति है।
इसीलिए तो,
मेरा नाम राजनीति है।
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rajniti ki paribhasha bakhoobi likhi hai aapne.
जवाब देंहटाएंक्या बात है शाश्त्री जी? आज तो आपने कस कस के सतसैया के बाण मारे हैं. बहुत आनंद आया आज आपकी इन क्षणिकाओं में.
जवाब देंहटाएंरामराम.
rajneeti ka sahi roop dikha diya aapne. bvadhai ho.
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर ... राजनीति के बारे में लिखा है।
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