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रविवार, 12 अप्रैल 2009

"टिपियाने में छन्द बन गये" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मत ढूढों दर्पण लेकर, कविता अन्तस् में रहती है,

सरिता की धारा ही आँसू बन नयनों में बहती है।


भाव-भाव हैं, छन्द-शास्त्र के कभी रहे मुहताज नही,

सभी बादशाहों के दिल में, रह सकती मुमताज नही।


सागर की गहराई में जाकर ही मोती मिलते हैं,

काँटों की शैय्या पर ही, कोमल गुलाब खिलते हैं।


व्यंग बाण से घायल होकर, आह निकल जाती है,

गजल-गीत की रचना को, लेखनी फिसल जाती है।


दिलवालों की बातें दिलवाले ही जानें,

बे-दिलवाले पीर पराई क्या पहचानें?


अकस्मात् ही भाव बहे और बन्द बन गये,

टिपियाने के लिए अनोखे छन्द बन गये।

10 टिप्‍पणियां:

  1. दिलवालों की बातें दिलवाले ही जाने
    बे-दिलवाले पीर परायी क्या जाने .....

    वाह उस्ताद वाह ..मान गए

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  2. अकस्मात् ही भाव बहे और बन्द बन गये,
    टिपियाने के लिए अनोखे छन्द बन गये।

    आदरणीय शास्त्री जी,
    ये तो वाकई बहुत सुन्दर गीत बन गया .वैसे भी आपकी गीत शैली में लिखी गयी टिप्पणी बहुत अच्छी लगती हैं.
    हेमंत कुमार

    उत्तर देंहटाएं
  3. Is kavitaa kee sabse sundar panktiyaa -

    Sabhee baadshaahon ... ...
    ... ... Mumtaaz naheen.

    Man ko lubhaa gaeen.
    (Mobile se)

    उत्तर देंहटाएं
  4. "व्यंग बाण से घायल होकर,
    आह निकल जाती है,
    गजल-गीत की रचना को,
    लेखनी फिसल जाती है।"
    सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मयंक जी!
    आप आशु कवि हैं। लाजवाब शायरी।
    मुबारकवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  6. टिपियाना मन को भा गया सर।
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  7. टिपियाने में इतना सुन्दर लिखा है तो फुरसत में तो कहर ही ढायेंगे।
    बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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