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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

"सावन में बादल का, छा जाना अच्छा लगता है।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


(बहिन अल्पना वर्मा ने मेरी इससे पहले वाली पोस्ट पर
टिप्पणी के रूप में इस गीत की लय पर दो पंक्तियाँ प्रेषित की थीं।
बस उसी पर यह तुकबन्दी तैयार हो गयी।
इसे छोटी बहिन अल्पना को सादर समर्पित कर रहा हूँ।)


सावन में बादल का छा जाना, अच्छा लगता है।

अल्पनाओं में रंगों का आ जाना, अच्छा लगता है।।


सपनों में ही मन से, मन की बातें हो जाती थी।

चितवन की तिरछी चालों से, मातें हो जाती थी।

भूली-बिसरी यादों को पा जाना, अच्छा लगता है।।


कभी रूठना, कभी मनाना, मान-मनव्वल होती थी।

गाना हो या हो रोना, वो सबमें अव्वल होती थी।

दर्पण में भोली छवि का भा जाना, अच्छा लगता है।


कितना ही बिसरायें, वो क्षण याद बहुत आते हैं।

प्रेम-प्रीत में सने हुए, सम्वाद बहुत भाते हैं।

कभी-कभी तीखा भोजन खा जाना, अच्छा लगता है।

13 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय शास्त्री जी!
    आप अपनी हाजिर जवाबी से चूकते नही हैं। आखिर अल्पना जी को जवाब दे ही दिया।

    जवाब देंहटाएं
  2. अच्छा कलाम पेश किया है।
    मैं आपकी कलम का कायल हो गया हूँ।
    मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. मयंक जी!
    रचना सुन्दर बन पड़ी है।
    बधायी स्वीकार करें।

    जवाब देंहटाएं
  4. गीतों की श्रंखला में आपका
    यह प्रणय-गीत लाजवाब है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर रचना प्रकाशित करने के लिए,
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  6. भैया मयंक जी!
    इतनी जल्दी गीत गढ़ दिया और
    प्रकाशित भी कर दिया।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  7. कल्पनाओं की नगरी में खो जाना,
    अच्छा लगता है।
    मीठी बातों में उनका हो जाना,
    अच्छा लगता है।
    बधायी स्वीकार करें।

    जवाब देंहटाएं
  8. भाई शाश्त्री जी क्या कहूं? दो गुणी जनों की संगत मे आनन्द ही पैदा होता है. सो वाकई आनन्द आगया/ बहुत शुभकामनाएं आपको.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत बढिया रहा ... बधाई स्‍वीकारें।

    जवाब देंहटाएं

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