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सोमवार, 13 अप्रैल 2009

"ताज-महल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





चारु-चन्द्र की किरणों का, दुखदायी लगता है अवलोकन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।


पूनम की रातों में कैसे, देखूँ सुन्दर ताज महल को,

किया हुआ है दफ्न यहीं, उसने प्यारी मुमताज महल को।

सुख का साथी बिछुड़ गया, तो दोजख ही मानो जीवन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।



प्रेमी-युगल यहाँ मत आना, छाया यहाँ विरह का घेरा,

दूर-दूर तक नही सवेरा, यहाँ भरा घन-घोर अन्धेरा,

यहाँ प्रीत का अन्त छिपा है, लुप्त हो गया है अपनापन।

शीतल चमकीली रातों मे, बोझिल हो जाता सबका मन।।



13 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut shaktishaalee aakarshan Tazmahal kaa hai.
    Isse naa koee bach paayaa,
    Avsar milte hee iske darshan ko aayaa.
    (Mobile se)

    जवाब देंहटाएं
  2. शास्त्री जी!
    आपने ताजमहल की हकीकत बयां की है। मुबारकवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. अरे शास्त्री जी! आपने तो ताजमहल का क्रेज ही खतम कर दिया।
    जय हो!

    जवाब देंहटाएं
  4. ताज को आपने खूब धोया है। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  5. अमर प्रेम की मिसाल ताज को आपने अनोखे अन्दाज में पेश किया।
    शुक्रिया।

    जवाब देंहटाएं
  6. ताज पर आपकी अभिव्यक्ति
    अच्छी लगी।

    जवाब देंहटाएं
  7. शास्त्री जी! आपकी पोस्ट पढ़ने में बोरियत नही होती है। आप अच्छा लिख रहे हैं।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  8. गद्य और पद्य दोनो पर ही आपकी लेखनी कमाल की है। बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  9. ताजमहल पर कविता अच्छी है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  10. ताजमहल की बात कहती सुन्दर कविता ..बहुत पसंद आई शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  11. shastri ji
    aapne to tajmahal ka dard bayan kar diya.duniya to khoobsoorti hi dekhti hai aur aapne uska dard dekha.
    bahut khoob

    जवाब देंहटाएं

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