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गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

‘‘नेता खोज रहा हूँ।’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

सतयुग हो या कलियुग हो, या हो द्वापर या त्रेता।

हर युग में ही पैदा, होते रहते हैं कुछ नेता।।

नेता उसको कहते, जो जनता को कुछ है देता।

किन्तु आज का नेता तो, जनता का सब ले लेता।।

किस नेता की बात करूँ, और लिखूँ कहानी किसकी।

ऐसा नेता ढूँढ रहा हूँ, छवि उज्जवल हो जिसकी।।

ज्यादातर तो ऐसे हैं, जो करते माँ से गद्दारी।

जननी-जन्मभूमि से ज्यादा, जिनको कुर्सी प्यारी।।

कुछ ऐसे नेता भी थे, जो अब तक पूजे जाते हैं।

हर युग में ये राम-कृष्ण, गांधी-इन्दिरा कहलाते हैं।।

मातृ-भूमि के लिए यही, जीवन के सुमन चढ़ाते हैं।

भारत भाग्य विधाता बन, ये माँ का नाम बढ़ाते हैं।।

अब तक इनके जैसा ही, मैं नेता खोज रहा हूँ।

उसके ऊपर महाकाव्य, रचने की सोच रहा हूँ।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा है।ऐसे नेता बहुत मिल जाएगे।

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  2. क्या बात है साहब बहुत ही बढ़िया!

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  3. नेता हो गए अभिनेता
    अभिनेता हो गए नेता

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  4. शास्त्री जी !
    आपने माहौल के हिसाब से यह शायरी अपने ब्लाग पर लगाई है। मुबारकवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आजकल तो कोई नेता मेरी नजर में जँच नही रहा है। यदि कोई कसौटी पर खरा उतरा तो उसकी सिफारिस कर दूँगा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मयंक जी !
    इस रचना को मैंने आपके मुख से 20-25 साल पहले सुना था। आज आपके ब्लाग पर देखा तो पुरानी यादें ताजा हो गयीं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद सुंदर और सटीक लिखा आपने.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं

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