"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

समर्थक

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

‘‘बाबा नागार्जुन के तर्क ने मुझे निरुत्तर कर दिया था।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बाबा नागार्जुन की तो हर बात निराली ही थी। वे जो कुछ बोलते थे। तर्क की कसौटी पर कस कर नपा तुला ही बोलते थे।

बात 1989 की है। उन दिनों मेरे एक जवाँदिल बुजुर्ग मित्र ठा0 कमला कान्त सिंह थे, इनका खटीमा शहर में ‘होटल बेस्ट व्यू’ के नाम से एक मात्र थ्री स्टार होटल था। ये बाबा नागार्जुन के हम-उम्र ही थे। बिहार से लगते हुए क्षेत्र पूर्वी उत्तर-प्रदेश के ही मूल निवासी थे।


बाबा से मिलने अक्सर आ जाते थे।


एक दिन बातों-बातों में ठाकुर साहब को पता लग ही गया कि बाबा मीट भी खा लेते हैं। बस फिर क्या था, उन्होंने बाबा को खाने की दावत दे दी।


बाबा ने कहा- ‘‘ठाकुर साहब! मैं होटल का मीट नही नही खाता हूँ। घर पर ही मीट बनवाना।’’


शाम को ठाकुर साहब ने बाबा को बुलावा भेज दिया।


मैं बाबा को साथ लेकर ठाकुर साहब के घर गया।


अब ठा0 साहब ने अपनी कार में बाबा को बैठाया और अपने होटल ले गये।


बस फिर क्या था?


बाबा बिफर गये और बड़ा अनुनय-विनय करने पर भी बाबा ने ठाकुर साहब की दावत नही खाई और होटल से वापिस लौट आये। मेरे घर पर खिचड़ी बनवा कर बडे प्रेम से खाई।


मैंने बाबा से पूछा- ‘‘बाबा! आपने ठा0 साहब की दावत क्यों अस्वीकार कर दी।’’


बाबा ने कहा- ‘‘शास्त्री जी! मैंने ठा0 साहब से पहले ही कहा था कि मैं होटल का मीट नही खाता हूँ।’’


मैंने प्रश्न किया- ‘‘ बाबा! होटल में क्यों नही खाते हो?’’


बाबा बोले- ‘‘अरे भाई! होटल के खाने में घर के खाने जितना प्यार और अपनत्व नही होता है। प्यार पैसा खर्च करके तो नही खरीदा जा सकता।’’


बाबा के तर्क ने मुझे निरुत्तर कर दिया था।

4 टिप्‍पणियां:

  1. "बाबा नागार्जुन की तो हर बात निराली ही थी। वे जो कुछ बोलते थे। तर्क की कसौटी पर कस कर नपा तुला ही बोलते थे।"

    प्रेरणादायक संस्मरण है।
    बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  2. सचमुच, होटल के खाने में घर के खाने जितना प्यार और अपनत्व नहीं होता है!

    जवाब देंहटाएं
  3. बाबा सही कहते थे। जब जब होटल में खाया पेट भरा पर मन ना भरा।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी और बड़ी बात कही उन्होंने

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails