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सोमवार, 20 अप्रैल 2009

‘‘दिनचर्या’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे पड़ोस में शारदा की उपत्यिका में बसा एक सुन्दर नगर टनकपुर के नाम से जाना जाता है।

कई दशक पुरानी बात है। यहाँ एक सज्जन पान की दूकान चलाते थे। उनका नाम गंगाराम पनवाड़ी था। समाज के निचले दर्जे के आदमी थे। उनके 6 बच्चे थे। बड़ी मुश्किल से पान की दूकान से गुजर-बसर हो पाती थी। लेकिन दिनचर्या में उनका जवाब नही था।

रोज शाम को घर आते ही उनका सबसे पहला काम यह होता था कि अलग-अलग गोलकों में हर बच्चे की फीस के पैसे, दूध के पैसे, और आम खर्च के पैसे जरूर जमा करते थे। इसीलिए उनके बच्चों की कभी स्कूल की फीस लेट नही हुई। दूधवाले का पैसा कभी लेट नही हुआ।

आज उनके सभी बच्चे अच्छा पढ़-लिख कर उच्च पदों पर कार्यरत है। समाज में इस परिवार का आदर-मान है।

कहने का तात्पर्य यह है कि यदि लगन हो तो गरीब व्यक्ति भी समाज में अपना स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए दिनचर्या तो निश्चित करनी ही होगी।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है.. शायद आज का युवा वर्ग (मैं भी इसी श्रेणी में हूं) जमा करना तो दूर, क्रेडिट कार्ड संस्कृति में भविष्य के ऋण को गले से लगा रहा है.. चार्वाक का कथन- याज्जीवेत सुखम् जीवेत.. ऋणम् कृत्वा घृतम् पीबैत.. (जब तक जीओ सुख से जीओ, ऋण करो और घी पीओ).. आज बिल्कुल सार्थक प्रतीत हो रहा है.. हर इंसान को गंगाराम पनवाड़ी जी से प्रेरणा लेनी चाहिए..

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  2. चरित्र ही धन है। गंगाराम जी को सलाम!

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  3. kaha gaya hai shiksha to jahan se bhi mile aur jis keemat par mile usi se grahan karni chahiye.

    aapne sahi kaha hai .........har insaan ko isse prerit hona chahiye phir to ek insaan nhi poore desh ka bhavishya sukhmay aur ujjwal ho jaaye.

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  4. बहुत सही कहा ... लगन हो तो आदमी कुछ भी प्राप्‍त कर लेता है।

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  5. बहुत सही बात. आज छोटी और नियमित बचत को कोई महत्व ही कहां देता है? भूल जाते हैं कि बूंद-बूंद से ही घट भरता है. जीवन में नियमितता तो नायाब है ही.

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  6. अंतरजाल के
    पाठकों को
    इस प्रसंग से
    अच्छी प्रेरणा
    मिलेगी!

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  7. बहुत प्रेरणास्पद प्रसंग आपने सबके सामने रखा पर यह भी अब समय की विडम्बना ही कही जायेगी कि युवा वर्ग EMI संस्कृति मे डुब रहे हैं.

    रामराम.

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  8. गंगाराम जी का उदाहरण बहुत अच्छा है. जिम्मेदारी का अहसास और व्यक्तिगत अनुशासन बेकार कैसे जा सकते हैं?

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