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रविवार, 19 अप्रैल 2009

‘‘पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।‘‘ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।


इन गुस्सालों ने अपना गुलशन वीरान बना डाला।।


जागा सबका मन, और माटी का जागा है कण-कण,


जागी कलियाँ और चमन का जागा है हर एक सुमन,


आस्तीन में पलने नही देंगे, कोई विषधर काला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।



धन-बल से इन्सानों के, ईमान नही बिक पायेंगे,


असली के आगे, नकली भगवान नही टिक पायेंगे,


देश-भक्त इन शैतानों को याद दिला देंगे खाला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।



जमा विदेशों में सारा, अब काला-धन लाना होगा,


जन-गण-मन में, स्वाभिमान का अलख जगाना होगा,


उग्रवादियों की गरदन में, डालो फाँसी की माला।


पहना दो अब मक्कारों को चप्पल-जूतों की माला।।


9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बधाई ऐसी ओजपुर्ण रचना के लिये.

    रामराम.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ओजस्वी रचना-बधाई के पात्र हैं आप.

    जवाब देंहटाएं
  3. रचना बहुत अच्ची लगी।आप मेरे ब्लाग पर आए इसके लिए बहुत बहुत धन्यवाद।आगे भी हर सप्ताह आप को ऐसी ही रचनाएं मेरे तीनों ब्लाग पर मिलेगी,सहयोग बनाए रखिए......

    जवाब देंहटाएं

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