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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

दोहे "कठिन झेलना शीत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सरदी पड़ती ग़ज़ब की, गया दिवाकर हार।
मैदानी भूभाग में, कुहरे की है मार।।
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लकड़ी-ईंधन का हुआ, अब तो बड़ा अभाव।
बदन सेंकने के लिए, कैसे जले अलाव।।
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हैं काजू-बादाम के, आसमान पर भाव।
मूँगफली को खाइए, मेरा यही सुझाव।।
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शीतलता की मार से, है गरीब भयभीत।
बच्चे-बूढ़ों के लिए, कठिन झेलना शीत। 
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सूखा पाला पड़ रहा, फसल रही है सूख।
लगती अधिक गरीब को, कंगाली में भूख।।
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नीयत चाहे नेक हो, नियमन में है खोट।
लगते लोग कतार में, पाने को कुछ नोट।।
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ताल और लय के बिना, बिगड़ा सुर-आलाप।
दो हजार का नोट तो, आज बना अभिशाप।।

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

गीत "पौधे मुरझाये गुलशन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुख का सूरज नहीं गगन में।
कुहरा पसरा है कानन में।।

पाला पड़ता, शीत बरसता,
सर्दी में है बदन ठिठुरता,
तन ढकने को वस्त्र न पूरे,
निर्धनता में जीवन मरता,
पौधे मुरझाये गुलशन में।
कुहरा पसरा है कानन में।।

आपाधापी और वितण्डा,
बिना गैस के चूल्हा ठण्डा,
गइया-जंगल नजर न आते,
पायें कहाँ से लकड़ी कण्डा,
लोकतन्त्र की आजादी तो,
बन्धक है अब राजभवन में।
कुहरा पसरा है कानन में।।

जोड़-तोड़ षडयन्त्र यहाँ है?
गांधीजी का मन्त्र कहाँ है?
जिसके लिए शहादत दी थी.
वो जनता का तन्त्र कहाँ है?
कब्ज़ा है अब दानवता का,
मानवता के इस कानन में।
कुहरा पसरा है कानन में।।

दुर्नीति ने पाँव जमाया, 
विदुरनीति का हुआ सफाया,
आदर्शों को धता बताकर,
देश लूटकर सबने खाया,
बरगद-पीपल सूख गये हैं,
खर-पतवार उगी उपवन में।
कुहरा पसरा है कानन में।।

बुधवार, 12 दिसंबर 2018

तेरह दोहे "फूली-फूली रोटियाँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

फूली रोटी देखकर, मन होता अनुरक्त।
हँसी-खुशी से काट लो, जैसा भी हो वक्त।१।

फूली-फूली रोटियाँ, सजनी रही बनाय।
बाट जोहती है सदा, कब साजन घर आय।२।

घर के खाने में भरा, घरवाली का प्यार।
सजनी खाने के लिए, करती है मनुहार।३।

फूली-फूली रोटियाँ, मन को करें विभोर।
इनको खाने देश में, आते रोटीखोर।४।

नगर-गाँव में बढ़ रहे, अब तो खूब दलाल।
रोटीखोरों ने किया, वतन आज कंगाल।५।

रोटी का अस्तित्व है, जीवन में अनमोल।
दुनिया में सबसे अहम, रोटी का भूगोल।६।

रोटी सबका लक्ष्य है, रोटी है तकदीर।
रोटी के बिन जगत में, चलता नहीं शरीर।७।

जीवन जीने के लिए, रोटी है आधार।
अगर न होती रोटियाँ, मिट जाता संसार।८।

हो रोटी जब पेट में, भाते तब उपदेश।
रोजी-रोटी के लिए, जाते लोग विदेश।९।

कुनबे और पड़ोस में, अच्छे रखो रसूख।
तब रोटी अच्छी लगे, जब लगती है भूख।१०।

बाहर खाने में नहीं, आता कोई स्वाद।
होटल में जाकर सदा, होता धन बरबाद।११।

दौलत के बाजार में, बिकते रोज रसूख।
रोटी की कम भूख है, धन की ज्यादा भूख।१२।

खाकर माल हराम का, करना मत आखेट।
श्रम से अर्जित रोटियाँ, भरती सबका पेट।१३।

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

दोहे "महज नहीं संयोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उलटफेर परिणाम में, महज नहीं संयोग।
तानाशाही को सहन, कब तक करते लोग।।

जनता की तो नाक में, पड़ती नहीं नकेल।
जनमत पर ही है टिका, लोकतन्त्र का खेल।।

जनसेवक जनतन्त्र में, ओटन लगे कपास।
पूरी होगी किस तरह, तब जनता की आस।।

जनता का जनतन्त्र में, जिसको मिलता साथ।
सत्ता की चाबी रहे, उस दल के ही हाथ।।

लोगों को लगने लगा, फिर से अच्छा हाथ।
छोड़ दिया है कमल का, जनता ने अब साथ।।

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

दोहे "महावीर हनुमान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
पुरखों का इससे अधिक, होगा क्या अपमान।
जातिवाद में बँट गये, महावीर हनुमान।।

राजनीति के बन गये, दोनों आज गुलाम।
जनता को लड़वा रहे, पण्डित और इमाम।।

भजन-योग-प्रवचन गये, अब योगी जी भूल।
लगे फाँकने रात-दिन, राजनीति की धूल।।

रास नहीं आता जिन्हें, योगासन का कार्य।
व्यापारी बन गये हैं, अब वो योगाचार्य।।

दल के दल-दल में धँसे, महापुरुष श्री राम।
रावण मौज मना रहे, राम हुए बदनाम।।

गंगा मइया के लिए, झूठे सब ऐलान।
अनशन करके दे रहे, सन्त स्वयं की जान।।

आँख मूँदकर है पड़ी, गफलत में सरकार।
अरबों-खरबों की रकम, नेता गये डकार।।

रविवार, 9 दिसंबर 2018

संस्मरण "वो पतला सा शॉल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वो पतला सा शॉल
      आज से ठीक अट्ठारह साल पुरानी बात है। उत्तराखण्ड को जन्मे हुए उस समय एक मास ही हुआ था और उसके पहले मनोनीत मुख्यमन्त्री थे नित्यानन्द स्वामी। मा. नित्यानन्द स्वामी से मेरा बहुत पुराना सम्बन्ध था। उस समय मैं खटीमा में पूर्व माध्यमिक विद्यालय चलाता था और आदरणीय स्वामी जी उत्तरप्रदेश में एम.एल.सी के लिए स्नातक कोटे से ही चुनाव लड़ते थे। इसलिए वह जब खटीमा आते थे तो मेरे निवास पर अवश्य आते थे। अतः मैं उनसे मिलने के लिए देहरादून के लिए चल पड़ा। साथ में बनबसा निवासी मेरे मित्र डॉ. अशोक शर्मा भी थे।
       इस यात्रा में हम दोनों लोग पहले दिल्ली गये उसके बाद रुड़की होते हुए देहरादून प्रातःकाल पहुँचे। उस समय उत्तराखण्ड नया था राजधानी नई थी और मुख्यमन्त्री निवास कैण्ट में बने पुराने एनेक्सी भवन को बनाया गया था। वर्तमान में तो उसी स्थान पर भव्य भवन बन गया है जो मुख्यमन्त्री का आधिकारिक निवास बन गया है।
       प्रातः काल दस बजे हम मा. मुख्यमन्त्री श्री नित्यानन्द स्वामी से मिलने के लिए कैण्ट में बने पुराने एनेक्सी भवन में पहुँचे। उस समय मुख्यमन्त्री की सुरक्षा तो पर्याप्त थी मगर इस भवन की चाहरदीवारी नहीं थी। कंटीले तारों से अस्थायी सुरक्षा की हुई थी। मा. मुख्यमन्त्री उस समय बाहर खुली धूप में बैठे हुए थे। उनके साथ उनके सलाहकार नारायण सिंह राणा जी और कुछ आगन्तुक लोग बैठे थे। जब हम प्रवेश द्वार पर गये तो सुरक्षा कारणों से तलाशी तो होनी ही थी और हमें इसमें कोई आपत्ति भी नहीं थी। मुझे मा.मुख्यमन्त्री जी ने जब देखा तो उनके साथ बैठे उनके सलाहकार नारायण सिंह राणा जी जो को गेट पर भेजा और राणा जी ने सुरक्षा कर्मियों को कहा कि इनको आने दो और हम मुध्यमन्त्री जी के पास पहुँच गये।
        पुराने दिनों की काफी बातें हुई और हम लोग बधाई देकर खटीमा के लिए लौटने लगे। संयोगवश हमें बरेली के लिए देहरादून हावड़ा ऐक्सप्रेस में रिजर्वेशन भी मिल गया। नौ दिसम्बर का दिन था और सर्दी भी काफी थी मगर मेरे पास एक पतला सा शॉल था। रात में गर्म कपड़े पहने हुए मैं बर्थ पर लेट गया और ऊपर से वह पतला सा शॉल ओढ़ लिया। सर्दी अत्यधिक बोने के बावजूद भी उस पतले से शॉल में इतनी गर्माहट न जाने कहाँ से भर गयी जितनी कि आज तक मुझे भारी-भरकम रजाई में भी नहीं महसूस हुई।

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

ग़ज़ल "कल हो जाता आज पुराना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन एक मुसाफिरखाना
जो आया हैउसको जाना

झूठी कायाझूठी छाया
माया में मत मन भरमाना

सुख के सपने रिश्ते-नाते
बहुत कठिन है इन्हें निभाना

ताकत है तोसब है अपने
कमजोरी में झिड़की-ताना

आँखों के तारे दुर्दिन में
जान गये हैं आँख दिखाना

इस दुनिया की यही कहानी
कल हो जाता आज पुराना

सुमन सीख देते हैं सबको
आज खिले कल है मुरझाना

रूप” न टिकता कभी किसी का
क्षमा न करता कभी ज़माना 

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

प्रकाशन "जय विजय के दिसम्बर अंक में मेरी कविता"


मैं तुमको मैना कहता हूँ,
लेकिन तुम हो गुरगल जैसी।
तुम गाती हो कर्कश सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी??
सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।

भोली-भाली चिड़ियों को तुम,
लड़कर मार भगाती हो।
प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी,
तुम बहुत सताती हो।।

मीठी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।

बैर-भाव को तजकर ही तो,
अच्छे तुम कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

गीत "भवसागर भयभीत हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जो लगता था कभी पराया,
वो ही अब मनमीत हो गया।
पतझड़ में जो लिखा तराना,
वो वासन्ती गीत हो गया।।

अच्छे लगते हैं अब सपने,
अनजाने भी लगते अपने,
पारस पत्थर को छू करके,
रिश्ता आज पुनीत हो गया।

मैंने जब सरगम को गाया,
उसने सुर में ताल बजाया,
गायन-वादन के संगम से,
मनमोहक संगीत हो गया।

उमर हो गयी कब की पूरी,
लेकिन चाहत पड़ीं अधूरी
आशाओँ के ज्वार उठे जब,
भवसागर भयभीत हो गया।

सुलझ गया है ताना-बाना,
पतझड़ लगने लगा सुहाना,
बासन्ती अब सुमन हो गये,

जीवन आशातीत हो गया।

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