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बुधवार, 19 सितंबर 2018

गीत "हुआ निर्मल गगन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


खिल उठे फिर से वही सुन्दर सुमन।
छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन।।

उष्ण मौसम का गिरा कुछ आज पारा,
हो गयी सामान्य अब नदियों की धारा,
नीर से, आओ करें हम आचमन।

रात लम्बी हो गयी अब हो गये छोटे दिवस,
सूर्य की गर्मी घटी, मिटने लगी तन की उमस,
सुख हमें बाँटती, मन्द-शीतल पवन।

अर्चना-पूजा की चहके दीप लेकर थालियाँ,
धान के बिरुओं ने पहनी हैं सुहानी बालियाँ,
अन्न की खुशबू से, महका है चमन।

तितलियाँ उड़ने लगीं बदले हुए परिवेश में,
भर गयीं फिर से उमंगे आज अपने देश में,
शीत का होने लगा अब आगमन।

रविवार, 16 सितंबर 2018

बालकविता "छुट्टी दे दो अब श्रीमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मास्साब मत पकड़ो कान।
है जुकाम से बहुत थकान।।

सरदी से ठिठुरे हैं हाथ।
नहीं दे रहे कुछ भी साथ।।

नभ में छाये काले बादल।
भरा हुआ जिनमें शीतल जल।।

आज नहीं लिखने की मर्जी।
सेवा में भेजी है अर्जी।।

दया करो हे कृपानिधान!
छुट्टी दे दो अब श्रीमान।।

जल्दी से अब घर जाऊँगा।
चाय-पकौड़े मैं खाऊँगा।।

कल जब सूरज उग जायेगा।
समय सुहाना तब आयेगा।।

तब मैं आऊँगा स्कूल।
नहीं करूँगा कुछ भी भूल।।



गीत "धान खेतों में लरजकर पक गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
आषाढ़ से आकाश अब तक रो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
आज पानी बन गया जंजाल है,
भूख से पंछी हुए बेहाल हैं,
रश्मियों को सूर्य अपनी खो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
कब तलक नौका चलाएँ मेह में,
भर गया पानी गली और गेह में,
इन्द्र जल-कल खोल बेसुध सो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 Image result for उड़ते पंछी
बिन चुगे दाना गगन में उड़ चले,
घोंसलों की ओर पंछी मुड़ चले,
दिन-दुपहरी दिवस तम को ढो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?
 
धान खेतों में लरजकर पक गया है,
घन गरजकर और बरसकर थक गया है,
किन्तु क्यों नगराज छागल  ढो रहा है?
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है
 
पुण्य सलिला में नजर आने लगे हैवान हैं
देखकर अतिवृष्टि को सब लोग अब हैरान हैं
उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है।
बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?  

शनिवार, 15 सितंबर 2018

गीत "तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो" डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुवन में महक समाई है
कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर
भँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
मधुमक्खी भीने-भीने सुर में
सुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भी
आस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैखुलकर कलियों मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।
 
चाहे मत दो मधु का कणभर
पर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करके
तुम मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं में, तुम बिजली बन कर आओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातुरगगरी से जल छलकाओ तो।।

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

गीत "हिन्दी की बिन्दी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गौरय्या का नीड़, चील-कौओं ने है हथियाया
हलो-हाय का पाठ हमारे बच्चों को सिखलाया

जाल बिछाया अपना, छीनी है हिन्दी की बिन्दी
अपने घर में हुई परायी, अपनी भाषा हिन्दी
खोटे सिक्के से लोगों के मन को है बहलाया

हिन्दीभाषा से हमने, भारत स्वाधीन कराया
हिन्दी में भाषण करके, सत्ता का आसन पाया
लेकिन गद्दी पाते ही उस हिन्दी को बिसराया

चीन और जापान आज भाषा के बल पर आगे
किन्तु हमारे खेवनहारे नहीं नींद से जागे
अन्न देश का खाकर, हमने राग विदेशी गाया

वाणी क्यों हो गयी विदेशी, क्या ऐसी लाचारी
विश्वपटल पर कैसे होगी, अब पहचान हमारी
पुरखों के गौरव-गुमान पर भी संकट गहराया

अन्धे-गूँगे-बहरों को क्या अपनी व्यथा सुनायें
हुक्मरान हिन्दी के दिन को हिन्दी-डे बतलाएँ
हलवा-पूड़ी व्यञ्जन छोड़े, पिज्जा-बर्गर खाया

गीत "व्याकरण से हो रही खूब छेड़खानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दी के महलों में, अँगरेजी रानी।
हिन्द का अतीत, आज बन गया कहानी।।

फूल और फल रहे, देश में सुरालय
लूट रहे लाज को आज खुद हयालय
नित्य क्यों दरक रहे, सन्तरी हिमालय
बन्द होते जा रहे, हिन्दी के विद्यालय
व्याकरण से हो रही खूब छेड़खानी।
हिन्द का अतीत, आज बन गया कहानी।।

नहीं रहा सुलेख और, वर्तनी की शुद्धता
भाषा चाहे कोई हो नहीं किसी में सिद्धता
विशुद्धता छली गयी, चली गयी प्रबुद्धता
लीलती ही जा रही, विनम्रता को क्रुद्धता
अमृत सा गंगा जल रह गया है पानी।
हिन्द का अतीत, आज बन गया कहानी।।

घोषणाओं पर कभी, कहीं अमल हुआ नहीं
सेवकों का आचरण, कभी धवल हुआ नहीं
ताल में खिला कमल, मगर विमल हुआ नहीं
पूजने को आज तक, चरण कमल हुआ नहीं
नाम के जवान है मगर नहीं रवानी।
हिन्द का अतीत, आज बन गया कहानी।।

किन्तु राजसी प्रसूत, मत के वशीभूत हैं
लोकसेवकों के पास, सम्पदा अकूत है
आज मेरे हिन्द में, सियासती सपूत हैं
वंशवाद ढो रहे, बहुत से राजपूत हैं
रात है हसीन जिनकी सुबह है सुहानी।
हिन्द का अतीत, आज बन गया कहानी।।

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

दोहे "सभी गणों के ईश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

विघ्नविनाशक आप हो, सभी गणों के ईश।
पूजा करते आपकी, सुर-नर और मुनीश।।
--
सबसे पहले आपकी, पूजा होती देव।
सबकी रक्षा कीजिए, जय-जय गणपतिदेव।।
--
करता है आराधना, मन से सकल समाज।
बिना आपके तो नहीं, होता मंगल काज।।
--
दीपों के त्यौहार में, होता दिव्य निवेश।
घर में लाते हैं सभी, लक्ष्मी और गणेश।।
--
पार्वतीनन्दन प्रभो, शिवजी के हो पूत।
नहीं आपकी दृष्टि में, कोई वृन्द अछूत।।
--
शुक्ल चतुर्थी से शुरू, चतुर्दशी अवसान।
दस दिन रहता देश में, श्रद्धा का उन्वान।।
--
सॉँझ-सवेरे आरती, उसके बाद प्रसाद।
होता है दरबार में, घण्टा-ध्वनि का नाद।।
--
गणनायक भगवान की, महिमा बहुत अनन्त।
कृपा आपकी हो अगर, जीवन बने बसन्त।।
--
मोदक हैं प्रिय आपको, गणनायक भगवान।
बनकर वाहन आपका, मूषक हुआ महान।।

दोहागीत "हिन्दी करे पुकार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



तोड़ दीजिए मिथक सब, भाषा करे पुकार।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।।

ओ काशी के सांसद, संसद के शिरमौर।
विदा करो अब देश से, अँगरेजी का दौर।।
है कठिनाई कौन सी, क्यों हो अब लाचार।
पूरे बहुमत की मिली, तुमको है सरकार।।
हिन्दी-हिन्दुस्थान हो, जिस दल का आधार।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।१। 

कहनेभर से तो नहीं, होगा देश महान।
बेमन से मत कीजिए, हिन्दी का गुणगान।।
दशकों से जो सह रही, अपनों के ही दंश।
पोषित कर दो देश में, अब हिन्दी का वंश।।
अब तो है इस देश में, भगवा की सरकार।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।२।

हिन्दी भाषा के लिए, बदलो अपनी सोच।
बोल-चाल में क्यों हमें, हिंग्लिश रही दबोच।।
निष्ठा से जब तक नहीं, होगा कोई काम।
कैसे तब तक देश का, होगा जग में नाम।।
अपनी भाषा का करो, दुनिया में विस्तार। 
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।३।

हिन्दी के सेवक कहाँ, राजनीति के सन्त।
अँगरेजी के रंग में, रँगे हुए गुणवन्त।।
हिन्दी भाषा का भला, कैसे हो उत्थान।
अमरीका-इंग्लैण्ड सा, लगता हिन्दुस्तान।।
देवनागरी पर करे, इंगलिश ससत् प्रहार। 
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।४।

हिन्दी का जब कर रहे, अपने लोग अनर्थ।
निजभाषा तब देश में, कैसे बने समर्थ।।
करते नौकरशाह हैं, हिन्दी पर आघात।
हिन्दीजन संघर्षरत, नित्य खा रहे मात।।
जनसेवक भी कर रहे, शब्दों का व्यापार।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।५।

हिन्दी का दिन बन गया, बस हिन्दी-डे आज।
गोरों के पदचिह्न पर, अब चल पड़ा समाज।।
जिस भाषा में माँगते, सबसे मत का दान।
उस भाषा का चाहिए, होना अब सम्मान।।
किन्तु सितम्बर मास तक, हिन्दी की जयकार।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।६।

देवनागरी में लिखे, गीता-वेद-पुराण।
अपनी हिन्दी नागरी, भारत माँ का प्राण।।
जिसके पुण्य-प्रताप से, देश हुआ स्वाधीन।
फिर किस कारण से हुई, अपनी हिन्दी क्षीण।।
हिन्दी है सबसे सरल, कहता है संसार।।
हिन्दी को दे दीजिए, अब उसका अधिकार।७।

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