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शोषण और कुपोषण से, खुद बचना और बचाना है।।
गैया-भैंसों का हमको लालन-पालन करना होगा,
अण्डे-मांस छोड़कर, हमको दूध-दही अपनाना है।
शोषण और कुपोषण से, खुद बचना और बचाना है।।
छाछ और लस्सी कलियुग में अमृततुल्य कहाते हैं,
पैप्सी, कोका-कोला को, भारत से हमें भगाना है।
शोषण और कुपोषण से, खुद बचना और बचाना है।।
दाड़िम और अमरूद आदि, फल जीवन देने वाले हैं,
आँगन और बगीचों में, फलवाले पेड़ लगाना है।
शोषण और कुपोषण से, खुद बचना और बचाना है।।
मानवता के हम संवाहक, ऋषियों के हम वंशज हैं,
दुनिया भर को फिर से, शाकाहारी हमें बनाना है।
शोषण और कुपोषण से, खुद बचना और बचाना है।।
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शनिवार, 25 मार्च 2017
"दूध-दही अपनाना है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 18 जुलाई 2016
दोहे "जीने का अंदाज, पियो घोटकर नीम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
तरल-सरल हों दिवस सब, पियो घोटकर नीम।
आयेंगे घर में नहीं, कोई वैद्य-हकीम।।
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जिनके आँगन में रहें, तुलसी-पीपल-नीम।
वहाँ वास करते सदा, नानक-राम-रहीम।।
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जब से आँगन के कटे, बरगद-पीपल-नीम।
तब से घर में आ गये, कितने रोग असीम।।
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पेड़ लगाकर सींचिए, प्रतिदिन सुबहो-शाम।
तरु की शीतल छाँव में, मिलता है आराम।।
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जल-जंगल, पावन पवन, होते प्राणाधार।
हरा-भरा परिवेश है, जीवन का आधार।।
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कुदरत के कानून को, भूल गया इंसान।
आपा-धापी में पड़ा, अब तो सकल जहान।।
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बदल गया इंसान का, जीने का अंदाज।
भौतिकता की होड़ में, चौपट हुआ समाज।।
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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011
‘‘बचा लो पर्यावरण’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() घटते वन, बढ़ता प्रदूषण, गाँव से पलायन शहरों का आकर्षण। जंगली जन्तु कहाँ जायें? कंकरीटों के जंगल में क्या खायें? मजबूरी में वे भी बस्तियों में घुस आये! -- क्या हाथी, क्या शेर? क्या चीतल, क्या वानर? त्रस्त हैं, सभी जानवर। खोज रहे हैं सब अपना आहार, हो रहे हैं नर अपनी भूलों का शिकार। -- ![]() अभी भी समय है, लगाओ पेड़, उगाओ वन, हो सके तो बचा लो, पर्यावरण! ○ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' खटीमा (उत्तराखण्ड) |
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
‘‘धरती का श्रंगार’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
हमको पेड़ लगाने होंगे। (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

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