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शनिवार, 30 मई 2015
मंगलवार, 15 मई 2012
"समय का कुटिल-चक्र" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज समय का, कुटिल-चक्र चल निकला है। संस्कार का दुनिया भर में, दर्जा सबसे निचला है।। नैतिकता के स्वर की लहरी, मंद हो गयी। इसीलिए नूतन पीढ़ी, स्वच्छन्द हो गयी।। अपनी ग़लती को कोई स्वीकार नहीं करता है। दोष स्वयं के, सदा दूसरों के माथे पर धरता है।। सबके अपने नियम और सबका अन्दाज़ निराला है। इसीलिए हर नेता के मुँह पर लटका इक ताला है।। पत्रकार का मतलब था, निष्पक्ष और विद्वान-सुभट। नये जमाने में इसकी, परिभाषाएँ सब गई पलट।। नटवर लाल मीडिया पर, छा रहे बलात्-बाहुबल से। गाँव शहर का छँटा हुआ, अब जुड़ा हुआ है चैनल से।। गन्दे नालों और नदियों की, बहती है अविरल धारा। न्हाने वाले पर निर्भर है, उसको क्या लगता प्यारा?? |
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