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व्यंग्य का प्रयास
जिसका
अस्तित्व
नही
मिटा पाई,
कभी
भी,
समय की आंधी ।
ऐसा
था,
हमारा
राष्ट्र-पिता,
महात्मा
गान्धी ।।
कितना
है कमजोर,
सेमल
के पेड़ सा-
भाषण के अतिरिक्त,
कुछ
नही देता ।।
दिया
सलाई का-
मजबूत
बक्सा,
सेंमल
द्वारा निर्मित,
एक
भवन ।
माचिस
दिखाओ
और
कर लो हवन ।
आग
ही तो लगानी है,
चाहे-तन, मन, धन
हो
या
वतन।।
यह
बहुत मोटा-ताजा
है,
परन्तु,
सूखे
साल रूपी,
गांधी
की तरह बलिष्ट नही,
इसे
तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी-
.........................।।
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016
व्यंग्य "आज का नेता-किसी को कुछ नही देता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
सोमवार, 3 दिसंबर 2012
"हास्य कवि गेंदालाल शर्मा 'निर्जन' का व्यंग्य" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
5 दिसम्बर को हमारी
40वीं वैवाहिक वर्षगाँठ है!
इसलिए आज पढिए!
हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर


बुधवार, 29 फ़रवरी 2012
"बुड्ढों को पाँव जमाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
अणु और परमाणु-बम भी, सफल नही हो पायेंगे।। सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को। सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।। शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही। छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।। फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा। उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा। नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें। युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।। शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से। इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।। रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों। लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।। सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे। सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे। गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे। तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।। मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा। भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।। सेना में इन वृद्धजनों को, निज जौहर दिखलाना है। युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों को पाँव जमाना है।। |
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
“गांधी की सन्तान कहते हुए भी... ..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| एक पादप साल का, जिसका अस्तित्व नही मिटा पाई, कभी भी,समय की आंधी । ऐसा था, हमारा राष्ट्र-पिता,महात्मा गान्धी ।। कितना है कमजोर, सेमल के पेड़ सा- आज का नेता । जो किसी को,कुछ नही देता ।। दिया सलाई का- मजबूत बक्सा, सेंमल द्वारा निर्मित,एक भवन । माचिस दिखाओ,और कर लो हवन । आग ही तो लगानी है, चाहे-तन, मन, धन हो या वतन।। यह बहुत मोटा, ताजा है, परन्तु, सूखे साल रूपी,गांधी की तरह बलिष्ट नही, इसे तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी- .........................।। |
रविवार, 25 जुलाई 2010
“यही समाजवाद है…” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
| समाजवाद से- कौन है अंजाना? लोगों ने भी यह जाना। समाजवाद आ गया है, क्या यह प्रयोग नया है? डाका, राहजनी, और चोरी, सुरसा के मुँह के समान- बढ़ रही है,रिश्वतखोरी। देख रहे हैं- गरीब और मजदूर, होता जा रहा है, चिकित्सा और न्याय- उनसे दूर। बढ़ता जा रहा है- भ्रष्टाचार, व्यभिचार और शोषण, नेतागण कर रहे हैं- अपना और अपने परिवार का पोषण। क्या समाजवाद- सबके हित की-आवाज है? क्या देश में दीन-दुखी, आम आदमी का राज है? पछता रहे हैं, गरीब और कमजोर, क्यों भेजा था उन्होंने संसद में- एक निकम्मा और चोर? आज केवल- नेता ही आबाद है, जनता आज भी बरबाद है। क्या यही समाजवाद है? यही लोकतंत्र है, हाँ यही समाजवाद है। |
बुधवार, 26 अगस्त 2009
‘‘हम तो नेता हैं फकत जूतें ही खाना जानते हैं’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
‘‘सावधान! जूते चप्पल बाहर ही उतार कर आयें।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
आज मेरे छोटे से शहर में एक बड़े नेता जी पधार रहे हैं।
उनके चमचे जोर-शोर से प्रचार करने में जुटे हैं।
रिक्शों व जीपों में लाउडस्पीकरों से उद्घोषणाएँ हो रही हैं-
‘‘भाइयों और बहनों!
आज आपके नगर में माननीय..........................पधार रहे हैं।
आपसे पुरजोर अपील है कि उनके विचारों को सुनने के लिए अवश्य पधारें।’’
उद्घोषणा का असार हुआ और लोग सभा-स्थल पर पहुँचने लगे।
प्रवेश-द्वार पर दोनों ओर जूते-चप्पल जमा करने के लिए स्टाल लगे थे।
स्टालों पर बड़े-बड़े शब्दों में लिखा हुआ था-
‘‘लोक-तन्त्र के देवता के दर्शन करने और
उनको सुनने के लिए- कृपया जूते चप्पल यहाँ जमा करायें।’’
‘सभा में जूते-चप्पल पहिन कर जाना सख्त मना है।’
सच ही कहा कि भैया! जूते का रौब गालिब है।
जूतों से सब भयभीत हैं।
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
"गप-शप" भैया! सब फैवीकोल का ही कमाल है। (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
आज राजनीति के बाजार में भी कई तरह के नेतारूपी फैवीकोल छाये हुए हैं। जिन्होंने असली को भी पीछे छोड़ दिया है। परन्तु गुणवत्ता और क्रेज में पुराने नेतारूपी फैवीकोल का आज भी कोई सानी नही है। अब जनता को ही अपना फैसला सुनाना हैं कि- वह असली को पसन्द करती है या नकली को। बहरहाल नये और पुराने सभी में से एक से एक अच्छा और नायाब फैवीकोल राजनीति के बाजार में छाया हुआ है। कुछ ने तो ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर इसे लगाना भी शुरू कर दिया है। जिससे कि वो मजबूती के साथ मन-माफिक कुर्सी से चिपक जायें। बेचारे चिदम्बरम ने तो इसके कारण जूते का स्वाद भी चख लिया है। उनके साथ जरनैल सिंह-जूतेवाला का नाम भी हमेशा के लिए अमर हो गया है। एक पत्रकार ने एक जूता उछालने पर माल व माया दोनों कमा ली हैं।मरता क्या न करता, करनी का फल तो भोगना ही पडता है। बेचारे चिदम्बरम ने भी फैवीकोल की महिमा को पहचान कर इसे माफ भी कर दिया है। भैया! सब फैवीकोल का ही कमाल है। |
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बुधवार, 18 मार्च 2009
चुनावी वायदा, कितना जनता का फायदा.... (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
एक नेता जी,
चुनाव में हो गये खड़े,
पहले करो कुछ वायदे,
लोग इस बात पर थे अड़े।
नेता जी ने गहराई से,
बहुत सोचा और विचारा,
उनके पास,
चुनाव जीतने के लिए,
नही था कोई चारा।
इसलिए,
जनता से करने चल पड़े,
कुछ वायदे,
क्योंकि,
सिर्फ कुर्सी ही पहुँचा सकती है,
उन्हें फायदे।
उन्होंने जनता से कहा
कि मैं हूँ हरिश्चन्द्र सत्यवादी,
तन-मन मैला है,
इसीलिए पहनता हूँ,शुद्ध खादी।
भाइयों,मैं वचन भरता हूँ,
चुनाव जीतने पर,
मेल ट्रेन को,
इस स्टेशन पर,
रुकवाने का वायदा करता हूँ।
नेता चुनाव में विजयी हो गया,
और उसका,
जनता से किया वायदा
भी पूरा हो गया।
अब मेल ट्रेन,
इस छोटे स्टेशन पर रुकने लगी है,
एक बड़ी उपलब्धि हो गयी है,
किराया ऐक्सप्रैस का और,
मेल ट्रेन पैसेन्जर हो गयी है।
अब जनता करती है,
किराया कम करने की फरियाद,
नेता जी, दिलाते हैं याद।
हमने अपने शासन में,
बहुत विकास किया है,
परन्तु,
विकास की गति को मन्द कर दिया है।
आजकल यही तो राजनीति है,
जनता की,
यही तो नियति है।
मंगलवार, 17 मार्च 2009
सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)
ए-के सैंतालीस, अस्त्र-शस्त्र, बेकार सभी हो जायेंगे।
अणु और परमाणु-बम भी, सफल नही हो पायेंगे।।
सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को।
सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।।
शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही।
छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।।
फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा।
उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा।
नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें।
युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।।
शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से।
इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।।
रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों।
लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।।
सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।
सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।
गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे।
तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।।
मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।
सेना में इन बुड्ढों को, जौहर दिखलाना भायेगा।
युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों का जमाना आयेगा।।
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