-- आ रहा मधुमास फिर से, साज मौसम ने बजाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- साल बीता, माह बीते, बीतते दिन-पल गये, बालपन-यौवन समय के साथ सारे ढल गये, फिर दरकते पत्थरों ने, ज़िन्दग़ी का गीत गाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- धार के विपरीत ही चलता रहा हूँ मैं हमेशा, वक्त की रफ्तार को छलता रहा हूँ मैं हमेशा, प्रतिकूल को अनुकूल करके, पथ अलग मैंने बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- गान कर भँवरे रिझाते हैं हमेशा ही सुमन को, सीख ली है देखकर मैंने परिन्दों की लगन को, बीन कर तृण-पात मैंने, नीड़ सपनों का बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- लोग मेरे जन्मदिन पर, रस्म की करते अदायी, कम हुआ है साल पर, स्वीकार करता हूँ बधायी, देखकर अपनत्व सबका, हर्ष है मन में समाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- |
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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
गीत "जन्मदिन फिर आज आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 11 जनवरी 2026
गीत "सूरज नभ में शर्माया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- सन-सन शीतल चला पवन, सरदी ने रंग जमाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू, कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू, दादा जी ने अपने तन पर, कम्बल है लिपटाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है, चन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है, धूप गुनगुनी पाने को, सबका मन है ललचाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- काजू और बादाम, स्वप्न जैसे लगते निर्धन को, मूँगफली खाकर देते हैं, सभी दिलासा मन को, गजक-रेवड़ी के दर्शन कर, दिल को समझाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- |
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
गीत "सभ्यता का रूप मैला हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- लाज कैसे अब बचायेगी की अहिंसा, पल रही चारों तरफ है आज हिंसा सत्य कहने में झमेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- अब किताबों में सजे हैं ढाई आखर, सिर्फ कहने को बचे हैं नाम के घर, आदमी कितना अकेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- इंसान के अब दाँत पैने हो गये हैं. मनुज के सिद्धान्त सारे खो गये हैं, बस्तियों का ढंग बनैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- प्रीत की अब आग ठण्डी हो गयी है, पीढ़ियों की सोच गन्दी हो गयी है, सभ्यता का रूप मैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- |
गुरुवार, 20 नवंबर 2025
"ग़ज़ल-फासले इतने तो मत पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
हौसला रख कर कदम आगे धरो। फासले इतने तो मत पैदा करो।। -- चाँद तारों से भरी इस रात में, मत अमावस से भरी बातें करो। -- जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी, मत इसे जज्बात में रौंदा करो। -- उलझनों का नाम ही है जिन्दगी, हारकर, थककर न यूँ बैठा करो। -- छोड़ दो शिकवों-गिलों की बात अब, मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो। -- ज़िन्दगी है चार दिन की चाँदनी, “रूप” पर इतना न तुम ऐंठा करो। -- |
मंगलवार, 11 नवंबर 2025
गीतिका "बर्फ सारा पिघल जायेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सुबह होगी तो सूरज निकल जायेगा वक्त के साथ सब कुछ बदल जायेगा जिन्दगी में कभी हार मत मानना धूप में बर्फ सारा पिघल जायेगा दिल की कोटर में भी तो जलाओ दिया देखकर रौशनी मन मचल जायेगा पोथियाँ तो जगत की पढ़ो प्यार से दम्भ का आशियाँ खुद दहल जायेगा जूझना मत कभी बे-वजहा आप से नेह का दीप जीवन में जल जायेगा अपने अशआर तो अंजुमन में कहो बात कहने से दिल भी बहल जायेगा इस जहाँ में अमर कोई होता नहीं एक दिन नगमगी 'रूप' ढल जायेगा |
बुधवार, 5 नवंबर 2025
दोहे "गंगास्नान मेला" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहे "गंगास्नान मेला"


सोमवार, 20 अक्टूबर 2025
गीत "नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
!! शुभ-दीपावली !! -- रोशनी का पर्व है, दीपक जलायें। नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।। -- बातियाँ नन्हें दियों की कह रहीं, इसलिए हम वेदना को सह रहीं, तम मिटाकर, हम उजाले को दिखायें। नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।। -- डूबते को एक तृण का है सहारा, जीवनों को अन्न के कण ने उबारा, धरा में धन-धान्य को जम कर उगायें। नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।। -- जेब में ज़र है नही तो क्या दिवाली, मालखाना माल बिन होता है खाली, किस तरह दावा उदर की वो बुझायें। नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।। -- आज सब मिल-बाँटकर खाना मिठाई, दीप घर-घर में जलाना आज भाई, रोज सब घर रोशनी में झिलमिलायें। नीड़ को नव-ज्योतियों से जगमगायें।। -- |
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