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बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

दोहे "पर्वों का परिवेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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सारे जग से भिन्न है, अपना भारत देश।
रहता बारह मास ही, पर्वों का परिवेश।।
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पर्व अहोई-अष्टमीदिन है कितना खास।
जिसमें बेटों के लिएहोते हैं उपवास।।
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दुनिया में दम तोड़तामानवता का वेद।
बेटा-बेटी में जहाँदुनिया करती भेद।।
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पुरुषप्रधान समाज मेंनारी का अपकर्ष।
अबला नारी का भलाकैसे हो उत्कर्ष।।
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बेटा-बेटी के लिएहों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार सेपार लगाओ नाव।।
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एक पर्व ऐसा रचोजो हो पुत्री पर्व।
व्रत-पूजन के साथ मेंकरो स्वयं पर गर्व।।
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बेटा-बेटी समझ लो, कुल के दीपक आज।
बदलो पुरुष प्रधान का, अब तो यहाँ रिवाज।।
 --

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021

गीत "रौशनी के वास्ते, जल रहा च़िराग है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सवाल पर सवाल हैंकुछ नहीं जवाब है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।

गीत भी डरे हुएताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुएशेष चन्द श्वास हैं,
दो नयन में पल रहानग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।

ज़िन्दगी है इक सफरपथ नहीं सरल यहाँ,
मंजिलों को खोजतापथिक यहाँ-कभी वहाँ,
रंग भिन्न-भिन्न हैंकिन्तु नहीं फाग है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।

बाट जोहती रहींडोलियाँ सजी हुई,
हाथ की हथेलियों मेंमेंहदी रची हुई,
हैं सिंगार साथ मेंपर नहीं सुहाग है।
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।

इस अँधेरी रात मेंजुगनुओं की भीड़ है,
अजनबी तलाशतासिर्फ एक नीड़ है,
रौशनी के वास्तेजल रहा च़िराग है। 
राख में दबी हुईहमारे दिल की आग है।।

सोमवार, 25 अक्तूबर 2021

गीत "टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी, हमें चिढ़ाया सा करती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मुझसे बतियाने को कोई,
चेली बन जाया करती है!
उसकी बातें सुनकर मुझको,
हँसी बहुत आया करती है!

जान और पहचान नही है,
देश-वेश का ज्ञान नही है,
टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी,
हमें चिढ़ाया सा करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

कोई बिटिया बन जाती है,
कोई भगिनी बन जाती है,
कोई-कोई तो बुड्ढे की,
साली कहलाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

आँख लगी तो सपना आया,
आँख खुली तो मैंने पाया,
बिन सिर पैरों की लिखने से,
सैंडिल पड़ जाया करती हैं!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

जाल-जगत की महिमा न्यारी,
वाह-वाही लगती है प्यारी,
जालजगत पर सबको अपनी,
श्लाघा मन-भाया करती है!
तब मुझको बातों-बातों में,
हँसी बहुत आया करती है!

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

गीत "मुझपे रखना पिया प्यार की भावना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

करवाचौथ विशेष
 
कर रही हूँ प्रभू से यही प्रार्थना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

चन्द्रमा की कला की तरह तुम बढ़ो,
उन्नति की सदा सीढ़ियाँ तुम चढ़ो,
आपकी सहचरी की यही कामना।
 
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
आभा-शोभा तुम्हारी दमकती रहे,
मेरे माथे पे बिन्दिया चमकती रहे,
मुझपे रखना पिया प्यार की भावना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।
 
तीर्थ और व्रत सभी हैं तुम्हारे लिए,
चाँद-करवा का पूजन तुम्हारे लिए,
मेरे प्रियतम तुम्ही मेरी आराधना।
ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना।।

शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

दोहे "करवाचौथ दिवस बहुत है खास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अपने पतियों पर करेंसभी नारियाँ गर्व।
करवाचौथ सुहाग काहोता पावन पर्व।।

सजनी करवाचौथ पररखती है उपवास।
साजन-सजनी के लिएदिवस बहुत ये खास।।

जन्म-जिन्दगीभर रहेसबका अटल सुहाग।
साजन-सजनी में सदाबना रहे अनुराग।।

जरा-जरा सी बात परकभी न हो तकरार।
पति-पत्नी के बीच मेंआये नहीं दरार।।

प्रीति सदा बढ़ती रहेआपस में हो प्यार।
पावन करवाचौथ हैनिष्ठा का त्यौहार।।

वंश-बेल चलती रहेहँसी-खुशी के साथ।
पति-पत्नी का उम्रभररहे सलामत साथ।।

परम्परा बदली बहुतबदल न पाया ढंग।
अब भी पर्वों का चलननहीं हुआ है भंग।।

माता करती कामनासुखी रहे परिवार।
छिने न करवाचौथ काबहुओं से अधिकार।।

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

दोहे "आँखें नश्वर देह का, बेशकीमती अंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कह देती हैं सहज ही, सुख-दुख-करुणा-प्यार।
कुदरत ने हमको दिया, आँखों का उपहार।।
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आँखें नश्वर देह का, बेशकीमती अंग।
बिना रौशनी के लगे, सारा जग बेरंग।।
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मिल जाती है आँख जब, तब आ जाता चैन।
गैरों को अपना करें, चंचल चितवन नैन।।
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दुनिया में होती अलग, दो आँखों की रीत।
होती आँखें चार तो, बढ़ जाती है प्रीत।।
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पोथी में जिनका नहीं, कोई भी उल्लेख।
आँखें पढ़ना जानती, वो सारे अभिलेख।।
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माता-पत्नी-बहन से, कैसा हो व्यवहार।
आँखें ही पहचानतीं, रिश्तों का आकार।।
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सम्बन्धों में हो रहा, कहाँ-कहाँ व्यापार।
आँखों से होता प्रकट, घृणा और सत्कार।।

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

गीत "जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

घर-आँगन वो बाग सलोने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

जब हम गर्मी में की छुट्टी में, रोज नुमाइश जाते थे
इस मेले को दूर-दूर से, लोग देखने आते थे
सर्कस की वो हँसी-ठिठोली, भूल नहीं पाये अब तक
जादू-टोने, जोकर-बौने, याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

शादी हो या छठी-जसूठन, मिलकर सभी मनाते थे
आस-पास के लोग प्रेम से, दावत खाने आते थे
अब कितना बदलाव हो गया, अपने रस्म-रिवाजो में
दावत के वो पत्तल-दोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

कभी-कभी हम जंगल से भी, सूखी लकड़ी लाते थे
उछल-कूद कर वन के प्राणी, निज करतब दिखलाते थे
वानर-हिरन-मोर की बोली, गूँज रही अब तक मन में
जंगल के निश्छल मृग-छौने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

लुका-छिपी और आँख-मिचौली, मन को बहुत लुभाते थे
कुश्ती और कबड्डी में, सब दाँव-पेंच दिखलाते थे
होले भून-भून कर खाते, खेत और खलिहानों में
घर-आँगन के कोने-कोने याद बहुत आते हैं
बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

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