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रविवार, 26 मई 2019

दोहे "हार गये सामन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेटा-बेटी और माँ, करते नाटक खूब।
काँगरेस की धरा पर, नहीं उगेगी दूब।।

टूटा कुनबेवाद से, जन-गण का विश्वास।
जनता को परिवार से, नहीं रही अब आस।।

गाँधी जी के स्वप्न को, किया नेस्त-नाबूद।
काँगरेस का अब नहीं, बाकी बचा वजूद।।

देख रहे दिग्गज सभी, लेकिन बैठे मौन।
अब बिल्ली के गले में, घण्टा बाँधे कौन।।

हालत बिगड़ी है बहुत, काँगरेस की आज।
मोदी जी के साथ में, अब चल पड़ा समाज।।

चालबाजियाँ अब सभी, समझ गयी मखलूक।
नरसिंहा के साथ में, कैसा किया सुलूक।।

करणी का फल आज तो, भुगत रहे युवराज।
हुई कोढ़ में खाज अब, जिसका नहीं इलाज।।

काँगरेस का हो गया, भारत से अब अन्त।
लोकतन्त्र के समर में, हार गये सामन्त।

शनिवार, 25 मई 2019

दोहे "मोदी की सरकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जनता ने युवराज को, फिर से दिया नकार।
जोर-शोर से आ गयी, मोदी की सरकार।।

काँगरेस के जब तलक, पप्पू हैं अध्यक्ष।
सबल नहीं होगा कभी, काँगरेस का पक्ष।।

जनता जिसको चाहती, उसको मिलता ताज।
जिसमें हो गम्भीरता, वो ही करता राज।।

जिसका होता देश में, पाक-साफ किरदार।
सत्ता-शासन का वही, होता है हकदार।।

नीयत में होता नहीं, जिसकी कोई खोट।
मिलते आम चुनाव में, उसको ज्यादा वोट।।

दशकों से दिल में रहा, जिनके भारी बैर।
जनता खूब समझ गयी, मतलब की यह सैर।।

लोकतन्त्र में हो गये, अब सम्पन्न चुनाव।
डूब गयी मझधार में, ठगबन्धन की नाव।।

शुक्रवार, 24 मई 2019

बालकविता "शिव-शंकर को प्यारी बेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो शिव-शंकर को भाती है 
बेल वही तो कहलाती है 
 
तापमान जब बढ़ता जाता 
पारा ऊपर चढ़ता जाता 

अनल भास्कर जब बरसाता 
लू से तन-मन जलता जाता 
 
तब पेड़ों पर पकती बेल 
गर्मी को कर देती फेल 

इस फल की है महिमा न्यारी 
गूदा इसका है गुणकारी 
 
पानी में कुछ देर भिगाओ 
घोटो-छानो और पी जाओ 

ये शर्बत सन्ताप हरेगा 
तन-मन में उल्लास भरेगा 

गुरुवार, 23 मई 2019

दोहे "बिकती नहीं तमीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।

वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में अब भी बहे, पतित-पावनी धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन नहीं विपक्ष की, नाव लग रही पार।।

कृपण बने खुद के लिए, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

रखना नहीं दिमाग में, राजनीति में मैल।
खटते रहना रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।

बुधवार, 22 मई 2019

ग़ज़ल "कवायद कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है

मंगलवार, 21 मई 2019

ग़ज़ल "आपस में सुर मिलाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन की हकीकत का, इतना सा है फसाना
खुद ही जुटाना पड़ता, दुनिया में आबोदाना

सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी
रोते हैं जब अकेले, हँसता है कुल जमाना

घर की तलाश में ही, दर-दर भटक रहे हैं
खानाबदोश का तो, होता नहीं ठिकाना

अपना नहीं बनाया, कोई भी आशियाना
लेकिन लगा रहे हैं, वो रोज शामियाना

मंजिल की चाह में ही, दर-दर भटक रहे हैं
बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना

 अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें नहीं मुकम्मल
दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना

हो हुनर पास में तो, भर लो तमाम झोली
मालिक का दोजहाँ में, भरपूर है खजाना

लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे
सीखो चमन में जाकर, आपस में सुर मिलाना

दिल की नजर से देखो, मत रूप-रंग परखो
रच कर नया तराना, महफिल में गुनगुनाना
  

सोमवार, 20 मई 2019

दोहे "आम दिलों में खास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


आम पिलपिले हो भले, देते हैं आनन्द।
उन्हें चूसने में मिले, लोगों को मकरन्द।।
--
निर्वाचन तक ही रहेंआम दिलों में खास।
लेकिन उसके बाद मेंआती पुनः खटास।।
--
डाल-पाल के आम में, जब तक भरी मिठास।
तब तक रहती आम सेनातेदारी खास।।
--
आम-खास के खेल में, आम गया है हार।
आम खास की कर रहा, सदियों से मनुहार।।
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खाते-खाते आम कोलोग बन गये खास।
मगर आम की बात काकरते सब उपहास।।
--
अमुआ अपने देश के, दुनिया में मशहूर।
लेकिन आज गरीब की, हुए पहुँच से दूर।।
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मीठा-मीठा आम में, भरा हुआ है माल।
इसीलिए तो आम को, कहते लोग रसाल।।

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