-- वासन्ती मौसम में उपवन, खुल करके मुस्काया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- नेह नीर की पावन सरिता, मेरे मन मॆं बहती है, बीससाल से पाँच मार्च की, प्रबल प्रतीक्षा रहती है, मार्च मास सूनी बगिया में, खुशियाँ लेकर आया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- जैसे मथुरा नगरी चहक रही है, कान्हा-कृष्ण-मुरारी से, वैसे ही गुंजित है मेरा, सदन सहज किलकारी से, सौम्य-सलौना और खिलौना, बालक मैंने पाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को, खुशबू से महकाया है।। -- बालक होते हैं जिस घर में, वो लगता गहवारा सा, दादा-दादी को तब मिलता, अभिनव एक सहारा सा, शिवजी ने भी इस अवसर पर, डमरू खूब बजाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को खुशबू से महकाया है।। -- कल के नन्हे पौधे पर, अब नूतन यौवन आया है, पथ पर जाने वालों को, वो देता अपनी छाया है, जन्मदिवस पर शुभ आशीषों का, यह गीत बनाया है। पौत्र प्रांजल ने आँगन को खुशबू से महकाया है।। -- |
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गुरुवार, 5 मार्च 2026
गीत "पौत्र डॉ. प्रांजल का 27वाँ जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
गीत "जन्मदिन फिर आज आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- आ रहा मधुमास फिर से, साज मौसम ने बजाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- साल बीता, माह बीते, बीतते दिन-पल गये, बालपन-यौवन समय के साथ सारे ढल गये, फिर दरकते पत्थरों ने, ज़िन्दग़ी का गीत गाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- धार के विपरीत ही चलता रहा हूँ मैं हमेशा, वक्त की रफ्तार को छलता रहा हूँ मैं हमेशा, प्रतिकूल को अनुकूल करके, पथ अलग मैंने बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- गान कर भँवरे रिझाते हैं हमेशा ही सुमन को, सीख ली है देखकर मैंने परिन्दों की लगन को, बीन कर तृण-पात मैंने, नीड़ सपनों का बनाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- लोग मेरे जन्मदिन पर, रस्म की करते अदायी, कम हुआ है साल पर, स्वीकार करता हूँ बधायी, देखकर अपनत्व सबका, हर्ष है मन में समाया। प्रीत की सौगात लेकर, जन्मदिन फिर आज आया।। -- |
रविवार, 11 जनवरी 2026
गीत "सूरज नभ में शर्माया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- सन-सन शीतल चला पवन, सरदी ने रंग जमाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- जलते कहीं अलाव, सेंकता बदन कहीं है कालू, कोई भूनता शकरकन्द को, कोई भूनता आलू, दादा जी ने अपने तन पर, कम्बल है लिपटाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- जितने वस्त्र लपेटो, उतना ही ठण्डा लगता है, चन्दा की क्या कहें, सूर्य भी शीत उगलता है, धूप गुनगुनी पाने को, सबका मन है ललचाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- काजू और बादाम, स्वप्न जैसे लगते निर्धन को, मूँगफली खाकर देते हैं, सभी दिलासा मन को, गजक-रेवड़ी के दर्शन कर, दिल को समझाया। ओढ़ चदरिया कुहरे की, सूरज नभ में शर्माया।। -- |
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
गीत "सभ्यता का रूप मैला हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- लाज कैसे अब बचायेगी की अहिंसा, पल रही चारों तरफ है आज हिंसा सत्य कहने में झमेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- अब किताबों में सजे हैं ढाई आखर, सिर्फ कहने को बचे हैं नाम के घर, आदमी कितना अकेला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- इंसान के अब दाँत पैने हो गये हैं. मनुज के सिद्धान्त सारे खो गये हैं, बस्तियों का ढंग बनैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- प्रीत की अब आग ठण्डी हो गयी है, पीढ़ियों की सोच गन्दी हो गयी है, सभ्यता का रूप मैला हो गया है। मधुर केला भी कसैला हो गया है।। -- |
गुरुवार, 20 नवंबर 2025
"ग़ज़ल-फासले इतने तो मत पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
हौसला रख कर कदम आगे धरो। फासले इतने तो मत पैदा करो।। -- चाँद तारों से भरी इस रात में, मत अमावस से भरी बातें करो। -- जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी, मत इसे जज्बात में रौंदा करो। -- उलझनों का नाम ही है जिन्दगी, हारकर, थककर न यूँ बैठा करो। -- छोड़ दो शिकवों-गिलों की बात अब, मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो। -- ज़िन्दगी है चार दिन की चाँदनी, “रूप” पर इतना न तुम ऐंठा करो। -- |
मंगलवार, 11 नवंबर 2025
गीतिका "बर्फ सारा पिघल जायेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सुबह होगी तो सूरज निकल जायेगा वक्त के साथ सब कुछ बदल जायेगा जिन्दगी में कभी हार मत मानना धूप में बर्फ सारा पिघल जायेगा दिल की कोटर में भी तो जलाओ दिया देखकर रौशनी मन मचल जायेगा पोथियाँ तो जगत की पढ़ो प्यार से दम्भ का आशियाँ खुद दहल जायेगा जूझना मत कभी बे-वजहा आप से नेह का दीप जीवन में जल जायेगा अपने अशआर तो अंजुमन में कहो बात कहने से दिल भी बहल जायेगा इस जहाँ में अमर कोई होता नहीं एक दिन नगमगी 'रूप' ढल जायेगा |
बुधवार, 5 नवंबर 2025
दोहे "गंगास्नान मेला" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहे "गंगास्नान मेला"


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आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल। श्वेत -श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन ...
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