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रविवार, 24 जनवरी 2021

गीत "घर भर का अभिमान बेटियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कुल का हैं सम्मान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
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किलकारी की गूँज सुनाती,
परिवारों को यही बसाती,
दोनों कुल का मान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
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लता-बेल सी बढ़ती जातीं,
सबके दुख-सुख पढ़ती जातीं,
मात पिता की जान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
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बेटी से रौशन है दुनिया।
ममता का आँगन है मुनिया।।
बेटों की हैं खान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।
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बिटिया की महिमा अनन्त है।
बिटिया से घर में बसन्त है।।
घर भर का अभिमान बेटियाँ।
आन-बान और शान बेटियाँ।।

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दोहे "खरपतवार अनन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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होगा कुहरे का नहीं, जब तक नभ से अन्त।
तब तक आयेगा नहीं, खिलता हुआ बसन्त।।
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निर्धन दुख को झेलते, सुख से हैं सामन्त।
कूड़ा-करकट बीनते, श्याम सलोने कन्त।।
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रुकता थकता है नहीं, चलता चक्र अनन्त।
जग में आवागमन का, होता कभी न अन्त।।
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खूब कमाई कर रहे, बाबा और महन्त।
थोड़े से ही हैं बचे, अब दुनिया में सन्त।।
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जन्मजात होते नहीं, सन्त और बलवन्त।
गुरु की हो जिस पर कृपा, वो बनता गुणवन्त।।
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दल के दल-दल में उगी, खरपतवार अनन्त।
गली-हाट में बिक रहे, राजनीति के सन्त।।
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गये नहीं जो बाग में, देखे नहीं बसन्त।
आज किसानों के वही, बन बैठे हैं सन्त।।

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शनिवार, 23 जनवरी 2021

दोहे "अब भी वीर सुभाष के, गूँज रहे सन्देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दुनिया के इतिहास में, दिवस आज का खास।
अपने भारत देश में, जन्मा वीर सुभास।।
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जीवित मृत घोषित किया, सबको हुआ मलाल।
सत्ता पाने के लिए, चली गयी थी चाल।।
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क्यों इतने भयभीत हैं, शासन में अधिराज।
नहीं उजागर हो सका, नेता जी का राज।।
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इस साजिश पर हो रहा, सबको पश्चाताप।
नेता जी को दे दिये, जीते जी सन्ताप।।
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सच्चाई से आज भी, क्यों इतना परहेज।
अब तो जग जाहिर करो, सारे दस्तावेज।।
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जिसके कारण है हुआ, यह उपवन आजाद।
उस नेता की आ रही, अब जन-गण को याद।।
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अर्पित श्रद्धा के सुमन, तुमको करता देश।
अब भी वीर सुभाष के, गूँज रहे सन्देश।।
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शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

गीत ''मकर का सूरज'' (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कुहासे का आवरण
, आकाश पर चढ़ने लगा।।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
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हाथ ठिठुरे-पाँव ठिठुरे, काँपता आँगन-सदन,
कोट,चस्टर और कम्बल से ढके सबके बदन,
आग का गोला शरद में पस्त सा  पड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
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सर्द मौसम को समेटे, जागता परिवेश है,
श्वेत चादर को लपेटे, झाँकता रजनीश है,
गगन के नयनों से शीतल अश्रुजल झड़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।
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आगमन ऋतुराज का लगता बहुत ही दूर है,
अभी तो हेमन्त यौवन से बहुत भरपूर है,
मकर का सूरज नये सन्देश को गढ़ने लगा।
चल रहीं शीतल हवाएँ, धुँधलका बढ़ने लगा।।

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

गीतिका "रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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फूल हो गये ज़ुदाशूल मीत बन गये
भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये
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काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं
वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये
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देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल
तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये
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सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में
मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये
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आइना कमाल है, 'रूप' इन्द्रज़ाल है
धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये

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बुधवार, 20 जनवरी 2021

नवगीत "पर्वत बन कर डटे रहेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

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अडिग रहे हैं, अडिग रहेंगे
सदा बढ़े हैं, सदा बढ़ेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
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कितनों ने सन्देशे भेजे
कितनों से भिजवाये गये
कितनों ने आकर धमकाया
कितनों ने जमकर फुसलाया
हम भारत के हैं बाशिन्दे
पर्वत बन कर डटे रहेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!
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हममें गहराई सागर की
चाह नही हमको गागर की
काँटों पर हम चलने वाले
हम अपनी धुन के मतवाले
हम जमकर के लोहा लेंगे
दुश्मन से हम नही डरेंगे!
हम तो दरिया का पानी है
रुककर हम तो नहीं सड़ेंगे!!

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मंगलवार, 19 जनवरी 2021

गीत "आज हा-हा कार सा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

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कल्पनाएँ डर गयी हैं
,
भावनाएँ मर गयीं हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
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पक्षियों का चह-चहाना ,
लग रहा चीत्कार सा है।
षट्पदों का गीत गाना ,
आज हा-हा कार सा है।
गीत उर में रो रहे हैं,
शब्द सारे सो रहे हैं,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
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एकता की गन्ध देता था,
सुमन हर एक प्यारा,
विश्व सारा एक स्वर से,
गीत गाता था हमारा,
कट गये सम्बन्ध प्यारे,
मिट गये अनुबन्ध सारे ,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
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आज क्यों पागल,
स्वदेशी हो गया है?
रक्त क्यों अपना,
विदेशी हो गया है?
पन्थ है कितना घिनौना,
हो गया इन्सान बौना,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??
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आज भी लोगों को,
पावस लग रही है,
चाँदनी फिर क्यों,
अमावस लग रही है?
शस्त्र लेकर सन्त आया,
प्रीत का बस अन्त आया,
देख कर परिवेश ऐसा।
हो गया क्यों देश ऐसा??

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