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रविवार, 24 मार्च 2019

दोहे "कुछ भी नहीं सफेद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

राज-काज में प्रजा को, रक्खा जाता दूर।
पाँच साल जनतन्त्र में, जन रहता मजबूर।।

विजय-पराजय का कब मिले, नहीं जानते लोग।
आ आता अच्छा समय, जब अच्छा हो योग।।

समीकरण जब बिगड़ते, होता जोड़-घटाव।
धन के बल पर जीतते, अब तो लोग चुनाव।।

योगदान की है नहीं, अब दल में औकात।
जब पैसा हो जेब में, तभी बना लो बात।।

काजल की है कोठरी, कुछ भी नहीं सफेद।
उगता है मतभेद में, सबके मन में भेद।।

शनिवार, 23 मार्च 2019

दोहे "लोग खोजते मंच" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आत्मप्रकाशन के लिए, लोग खोजते मंच।
भाँति-भाँति के रच रहे, ढोंगी यहाँ प्रपंच।।
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खान-पान दूषित हुआ, दूषित हुए विचार।
कूड़े-कचरे से हुई, दूषित जल की धार।।
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संस्कार दम तोड़ता, मन में भरे विकार।
कदम-कदम पर देश में, फैला भ्रष्टाचार।।
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नहीं रही है आजकल, प्रीत और मनुहार।
राजनीति में दम्भ से, खिसक रहा आधार।।
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चाहे कोई भी रहे, दल-बल का सरदार।
राजनीति में हो रही, चमचों की भरमार।।
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मनचाही मिलती रकम, हाट हुए गुलजार।
जनसेवक सब जगह हैं, बिकने को तैयार।।
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नामदार सब हो गये, अब तो चौकीदार।
राजनीति में आ गये, अब शातिर मक्कार।।

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

दोहे विश्व जल दिवस "पानी को लाचार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सीमित है संसार में, पानी का भण्डार।
व्यर्थ न नीर बहाइए, जल जीवन आधार।।
किया किसी ने भी अगर, पानी को बेकार।
हो जाओगे एक दिन, पानी को लाचार।।
ओस चाटने से बुझे, नहीं किसी की प्यास।
जीव-जन्तुओं के लिए, जल जीवन की आस।।

गन्धहीन-बिन रंग का, पानी का है अंग।
जिसके साथ मिलाइए, देता उसका रंग।।

जल अमोल है सम्पदा, मानव अब तो चेत।
निर्मल जल के पान से, सोना उगलें खेत।।

वृक्ष बचाते धरा को, देते सुखद समीर।
लहराते जब पेड़ हैं, घन बरसाते नीर।।

गुरुवार, 21 मार्च 2019

दोहे "होलक का शुभदान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

होली तो होली हुई, छोड़ गयी सन्देश।
भस्म बुराई हो गयी, बदल गया परिवेश।‍१।
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पावन होली खेलकर, चले गये हैं ढंग।
रंगों के त्यौहार के, अजब-ग़ज़ब थे रंग।२।
-- 
जली होलिका आग में, बचा भक्त प्रहलाद।
जीवन में सबके रहे, प्यार भरा उन्माद।३।
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दहीबड़े-पापड़ सजे, खाया था मिष्ठान।
रंग-गुलाल लगा लिया, गाया होली गान।४।
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मिला हुआ था भाँग में, अदरख-तुलसीपत्र।
बौराये से लोग थे, यत्र-तत्र-सर्वत्र।५।
--
देख खेत में धान्य को, हर्षित हुआ किसान।
होली में अर्पित किया, होलक का शुभदान।६।

दोहे "होली का उपहार"(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने अच्छे लग रहे, होली के ये रंग।
रंगों के त्यौहार में, नहीं मिलाना भंग।।
 
रंगों का अब आ गया, मनभावन त्यौहार।
रूठे सुजन मनाइए, करके यत्न हजार।।

होली के त्यौहार में, बाँटो सबको प्यार।
रंगों की बौछार से, निर्मल करो विकार।।

बच्चों-बूढ़ों के लिए, रहना सदा उदार।
रंग-अबीर-गुलाल है, होली का उपहार।।

हँसी-ठिठोली को करो, मर्यादा के संग।
जो लगवाये प्यार से, उसे लगाओ रंग।।

देख खेत में अन्न को, होता हर्ष अपार।
इसीलिए मधुमास में, आता ये त्यौहार।।

बुधवार, 20 मार्च 2019

दोहे "रंगों की बौछार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

-0-0-0-0-0-
होली में अच्छी लगे, रंगों की बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्यौहार।।

शीत विदा अब हो गया, चली बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली का त्यौहार।।

पाना चाहो मान तो, करो शिष्ट व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली का त्यौहार।।

रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।
भेद-भाव को मेटता, होली का त्यौहार।।

तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।।

भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।।

छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्यौहार।।

गीत "सबके मन को भाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जब-जब आती मस्त बयारें,
तब-तब हम लहराते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

हमसे ही अनुराग-प्यार है,
हमसे है मधुमास जुड़ा,
हम संवाहक सम्बन्धों के,
सबके मन को भाते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

स्वागत-अभिनन्दन हमसे है,
हमीं बधाई देते हैं,
कोमल सेज नयी दुल्हिन की,
आकर हमीं सजाते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

तितली और शहद की मक्खी,
को पराग हम देते हैं,
अपनी मोहक मुस्कानों से,
भँवरों को भरमाते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

खुश हो करके मिलो सभी से.
जीवन बहुत जरा सा है,
सुख-दुख में हँसते रहने का,
हम तो पाठ पढ़ाते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

तोड़ हमें उपवन का माली,
विजयमाल को गूँथ रहा,
हम गुलाब हैं रंग-बिरंगे,
अपनी गन्ध लुटाते हैं।।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

'रूप' हमारा देख-देखकर,
जग मोहित हो जाता है,
हम काँटों में पलने वाले,
सबको सुख पहुँचाते हैं।
काँटों की पहरेदारी में,
गीत खुशी के गाते हैं।।

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