-- व्रत-तप-पूजन के लिए, आते हैं नवरात। माँ को मत बिसराइए, बदलेंगे हालात।। नारी नर की खान है, सब देते सन्देश। सिर्फ सुनाने के लिए, उनके हैं उपदेश।। जागो अब तो नारियों, तुम हो दुर्गा रूप। तुम्हें बदलना चाहिए, मौसम के अनुरूप।। शक्ति स्वरूपा हो तुम्हीं, माता का अवतार। तुमको ही तो जगत का, करना है उद्धार।। माँ के चेहरे पर रहे, सहज-सरल मुसकान। माता से बढ़कर नहीं, कोई देव महान।। -- पूजन-अर्चन से मिले, माता का वरदान। प्रतिदिन करना चाहिए, माता का गुणगान।। -- जय दुर्गा नवरात में, बोल रहे थे लोग। बाकी पूरे सालभर, मुर्गा का उपभोग।। -- जीभ चटाखे ले रही, होठों पर हरिनाम। ऐसे लोगों से हुए, धर्म-कर्म नाकाम।। -- नहीं क्षमा के योग्य हैं, लोगों के ऐमाल। लोग कर रहे नित्य ही, झटका और हलाल।। -- कुछ को सूकर से घृणा, कुछ को गौ से प्यार। सामिष भोजन से बढ़े, आपस में तकरार।। -- सुधर जाय यदि देश के, लोगों का आहार। तब ही होगा वतन में, सब तबकों में प्यार।। -- |
"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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बुधवार, 29 मार्च 2023
दोहे "माता का वरदान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 28 मार्च 2023
गीत "आचरण-व्यवहार अब कैसे फलेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- रौशनी का सिलसिला कैसे चलेगा? आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा? -- भावनाओं का सबल आलाप ये कहने लगा, नेह का बिरुआ यहाँ कैसे पलेगा? आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा? -- लोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे, जो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे, आचरण-व्यवहार अब कैसे फलेगा? आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा? -- आँधियों का दौर है, क्यों खेलते हो आग से, मन-बदन शीतल बनाना, फाल्गुन की फाग से, रंग के बिन दिवस अब कैसे ढलेगा? आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा? -- |
सोमवार, 27 मार्च 2023
"मत परिवार बढ़ाना तुम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- कहाँ चले ओ बन्दर मामा, मामी जी को साथ लिए। इतने सुन्दर वस्त्र आपको, किसने हैं उपहार किये।। -- हमको ये आभास हो रहा, शादी आज बनाओगे। मामी जी के साथ, कहीं उपवन में मौज मनाओगे।। -- दो बच्चे होते हैं अच्छे, रीत यही अपनाना तुम। महँगाई की मार बहुत है, मत परिवार बढ़ाना तुम। -- चना-चबेना खाकर, अपनी गुजर-बसर कर लेना तुम। अपने दिल में प्यारे मामा, धीरजता धर लेना तुम।। -- छीन-झपट, चोरी-जारी से, सदा बचाना अपने को। माल पराया पा करके, मत रामनाम को जपना तुम।। -- कभी इलैक्शन मत लड़ना, संसद में मारा-मारी है। वहाँ तुम्हारे कितने भाई, बैठे भारी-भारी हैं।। -- बजरंगबली के वंशज हो तुम, ध्यान तुम्हारा हम धरते। सुखी रहो मामा-मामी तुम, यही कामना हम करते।। -- |
रविवार, 26 मार्च 2023
गीत "देवालय में बूढ़ा बरगद जिन्दा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- अभी गाँव के देवालय में बूढ़ा बरगद जिन्दा है। करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।। -- बाबू-अफसर-नेता करते, खुलेआम रिश्वतखोरी, जिनका खाते माल, उन्हीं से करते हैं सीनाजोरी, मक्कारी के जालों में, उलझा मासूम परिन्दा है। करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।। -- माँ-बहनों की लज्जा लुटती, गलियों में-बाजारों में, गुण्डागर्दी करने वाले, शामिल हैं सरकारों में, लालन-पालन करने वाला, परेशान कारिन्दा है। करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।। -- लोकतन्त्र में शासन करने के, सब ही अधिकारी हैं, कुटुम-कबीलों की इसमे, क्यों होती भागीदारी हैं, कब छोड़ोगे सिंहासन को कहता हर बाशिन्दा है। करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।। -- ओछी गगरी घनी छलकती, भरी हुई चुपचाप रहे, जिसकी दाढ़ी में तिनका है, वही ज्ञान की बात कहे, घोटाले करने वाला ही, करता चुगली-निन्दा है। करतूतों को देख हमारी होता वो शरमिन्दा है।। -- |
शनिवार, 25 मार्च 2023
पुस्तक समीक्षा "चंचल अठसई" दोहा संग्रह (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
समीक्षा "चंचल अठसई" --
अपने पिछत्तर साल के जीवन में मैंने यह देखा है कि गद्य-पद्य में
रचनाधर्मी बहुत लम्बे समय से सृजन कर रहे हैं। लेकिन ऐसे लोग भी हैं जो दोहों की
रचना में आज भी संलग्न हैं। "चंचल अठसई" मेरे विचार से कोई नया प्रयोग
तो नहीं है। किन्तु इसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं को दोहों की विशेषताओं का
संग-साथ लेकर कवि ओम् शरण आर्य ने अपने दोहा-संकलन में पिरोया है। जिसकी जितनी
प्रशंसा की जाये वो कम ही होगी।
यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक रचनाकार छिपा होता है, जो अपनी रुचियों
के अनुसार गद्य-पद्य की रचना करता है। किन्तु आज के छन्दहीन रचनाओं के परिवेश
में छन्दबद्ध काव्य की रचना करना स्वयं में सराहनीय कार्य है। काव्य रचना करनेवाले लोग कवियों और विधा
विशेष में छन्दबद्ध लिखने वालों की गिनती विशिष्ट कवियों की श्रेणी में आती है।
ऐसे लोग अक्सर समाज सुधारक ही होते हैं। जो अपने गृहस्थ जीवन का निर्वहन करते
हुए यह विलक्षण कार्य करते हैं। कई दिनों से मैंने इस कृति पर कुछ
लिखने का मन बनाया। परन्तु अपने निजी कार्यों और दैनिक उलझनों के कारण समय नहीं
निकाल पाया। भूमिका और समीक्षा के लिए मेरी बुकसैल्फ में कई पुस्तकें कतार में
थीं। अतः अपनी आदत के अनुसार "चंचल अठसई" दोहा-संग्रह के बारे में कुछ
शब्द लिखने के लिए मेरी अंगुलियाँ कम्प्यूटर के की बोर्ड पर चलनें लगी। कवि ओम् शरण आर्य चंचल अध्यापन
से अवकाशप्राप्त ग्राम-परोड़ा (हथपऊ) जिला- मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) के मूल
निवासी हैं और वर्तमान में नैनीताल जिले के पीरूमदारा (रामनगर) में आकर बस गये
हैं। आप अनेकों सम्मान से सम्मानित हैं और विभिन्न सामाजिक और राजकीय
प्रतिष्ठानों में काव्य पाठ कर चुके हैं। अब तक आपकी मुक्तिका (मुक्तक संग्रह),
दीप जलाओ (बाल काव्य), बाल दोहा शतक (दोहा संग्रह) नई रोशनी (महाकाव्य), सुनो
कहानी (कथा संग्रह), ऊँची भरो उड़ान (चंचल चतुष्पदी संग्रह), अच्छे बच्चे (बाल
कविता संग्रह) आदि आठ कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी लेखनी जीवनोपयोगी साहित्य लिखने में आज भी
गतिमान है। जिसका स्वतः प्रमाण उनकी सद्यः प्रकाशित कृति "चंचल अठसई" दोहा-संग्रह है। जो अपने
नाम के अनुरूप ही सकारात्मक और अर्थपूर्ण दोहों का एक कोश है। उदाहरण के लिए
यहाँ मैं कवि ओम् शरण आर्य चंचल जी के कुछ
दोहों को उद्धृत कर रहा हूँ-
इस संकलन की पहली रचना में माँ वीणा पाणि की वन्दना भावपूर्ण दोहों में
की गयी है - "दयामयी माँ शारदे! इतना कर उपकार। हिय में रहे न छल-कपट, बरसे पावन
प्यार।। माँ तेरे उपकार का, चुका न पाऊँ मोल। वीणा वादिनी ज्ञान के, चक्षु दिये हैं खोल।।" कवि ने माँ-बाप शीर्षक से बहुत ही
मार्मिक दोहे रचे हैं। देखिए- " दुख में दुखियाती सदा, सुख में
हर्षित होय। माँ जैसा संसार में, दिखा न मुझको कोय।।"
दोहरा चरित्र शीर्षक से कवि कवि
ने अपनी वेदना प्रकट करते हुए लिखा है- "बाहर अनुपम सादगी, भीतर भरा
गुमान। जाने कितने रंग अब, बदल रहा इंसान।।" नश्वरता पर भी आपके दोहे सुन्दर बन
पड़े हैं। देखिए- "अपने सुघड़ शरीर पर, करना नहीं
गुरूर। पलक झपकते स्वर्ण तन, हो जाता है धूर।।"
मेरे अपने अनुसार संकलन के
अधिकांश दोहे नीति के श्लोकों से कम नहीं हैं। देखिए- "पल-पल की लेते खबर, जो हैं
मालामाल। चंचल लोग गरीब का, नहीं पूथछते हाल।।"
सत्य के दर्शन को दर्शाता एक और दोहा भी देखिए- "कटुता से कटुता मिले, मिले प्यार
से प्यार। सच्चाई का फल मधुर, कर देखो व्यवहार।।"
वैसे तो इस संकलन के सभी दोहे एक से बढ़कर एक हैं किन्तु यह दोहा भी बहुत
उपयोगी है- "आये हैं लेकर सभी, अपना-अपना भाग। कष्ट उन्हें जिनमें नहीं, प्रेम तपस्या-त्याग।।"
इस संकलन की एक और सशक्त दोहा बहुत प्रभावित करता है- "आहट के घुँघरू बजे, खड़े हो गये कान। नाची चिन्ता रात भर, तन-मन भरी थकान।।" कुल मिलाकर कवि ओम् शरण आर्य चंचल ने अपनी
दोहा कृति “चंचल अठसई” में मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ सामाजिक और प्राकृतिक उपादानों को भी अपने दोहों का विषय बनाया है।
मुझे पूरा विश्वास है कि कवि के अनमोल मोतियों से सुसज्जित दोहों की कृति
“चंचल अठसई” को पढ़कर सभी वर्गों के पाठक
लाभान्वित होंगे तथा समीक्षकों की दृष्टि से भी यह कृति उपादेय सिद्ध होगी। इस
अनमोल संग्रह के लिए मैं कवि ओम् शरण आर्य चंचल को बधाई देता हूँ
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। दिनांक- 24 मार्च, 2023 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) कवि एवं साहित्यकार टनकपुर-रोड, खटीमा जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308 E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com Website.
http://uchcharan.blogspot.com/ मोबाइल-7906360576, 7906295141 |
शुक्रवार, 24 मार्च 2023
दोहे "सिखलाते रमजान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
नेकी और खुलूस है, मौला का फरमान। मौमिन को सन्देश ये, देते हैं रमजान।। -- पाँचों वक्त नमाज पढ़, कहता पाक कुरान। बुरा किसी का सोच मत, सिखलाते रमजान।। -- नाम इबादत के अलग, देश-काल अनुरूप। लेकिन मक़सद एक है, अलग भले हों “रूप”।। -- जर्रे-जर्रे में बसा, राम और रहमान। सिखलाते इंसानियत, पूजा और अजान।। -- मर्म बताते धर्म का, गीता और कुरान। सारे प्राणी धरा के, ईश्वर की सन्तान।। -- खुद जिसके आदेश पर, चलता सकल जहान। बन्धन में रहता नहीं, खुदा और भगवान।। -- सारी पोथी धर्म की, करती हैं ताक़ीद। जिसके मन में प्यार है, उसके सभी मुरीद।। -- मज़हब चाहे कोई हो, करना सबका मान। भाईचारे से बने, अपना देश महान।। -- |
गुरुवार, 23 मार्च 2023
दोहे "खान-पान में शुद्धता, सिखलाते नवरात्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- करिये नियम-विधान से, नौ दिन तक उपवास। जगदम्बा माँ आपकी, पूर्ण करेंगी आस।। -- शुद्ध आचरण में रहे, उज्जवल चित्र-चरित्र। प्रतिदिन तन के साथ में, मन को करो पवित्र।। -- शाकाहारी मनुज ही, पूजा के हैं पात्र। खान-पान में शुद्धता, सिखलाते नवरात्र।। -- माता के नवरात्र हों, या हो कोई पर्व। अपने-अपने पर्व पर, होता सबको गर्व।। -- त्यौहारों की शृंखला, बना सुखद संयोग। मस्ती में उल्लास में, झूम रहे हैं लोग।। -- मत-मजहब का भूल से, मत करना उपहास। होता इनके मूल में, छिपा हुआ इतिहास।। -- त्यौहारों के नाम पर, लोक-दिखावा मात्र। पाश्चात्य परिवेश में, गुम हो गये सुपात्र।। -- करते पाठन-पठन को, विद्यालय में छात्र।। सफल वही होते सदा, जो होते हैं पात्र।। -- |
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