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रविवार, 22 जुलाई 2018

दोहे "दुनिया में नाचीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बतलाते खुद को सभी, दुनिया में नाचीज।
लेकिन बिन मतलब नहीं, होते लोग अजीज।।

पहनो चाहे कण्ठ में, कितने ही ताबीज।
लेकिन अनुभव के बिना, आती नहीं तमीज।।

हद से ज्यादा चतुर तो, होता नहीं उदार।
उनसे मत करना कभी, जीवन में व्यापार।।

आज समझ में आ गयी, दुनिया की औकात।
मतलब के संसार में, है मतलब की बात।।

भोलेपन में मत कभी, करना कुछ उपकार।
कृतज्ञता को मानता, नहीं आज संसार।।

जो करते हद से अधिक, चिकनी-चुपड़ी बात।
अक्सर ऐसे लोग ही, पहुँचाते आघात।।

घर-घर जाकर खोजते, जो हैं नित्य शिकार।
उन लोगों की मित्रता, मत करना स्वीकार।।

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

संस्मरण "नीरज जी से अन्तिम भेंट" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
स्व. गोपालदास नीरज से जुड़ी एक स्मृति प्रस्तुत कर रहा हूँ। जब मैं अन्तिम बार “नीरज” जी से मिला था।
     दिनांक 27 मई, 2013 को खटीमा में एक आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसका उद्घाटन उत्तराखण्ड के महामहिम राज्यपाल श्री अजीज कुरैशी ने किया था। इस आयोजन में हिन्दोस्तां के नामचीह्न शायर और वयोवृद्ध गीतकार गोपालदास नीरज भी उपस्थित थे।
      इस अवसर पर मैं (डॉ,रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') ने श्री राज्यपाल एवं नीरज जी को अपनी चार पुस्तकें "सुख का सूरज", "धरा के रंग", हँसता-गाता बचपन" और "नन्हे सुमन" भी भेंट करते हुए अपना काव्यपाठ भी किया था।
     इस आयोजन में पद्मभूषण गोपाल दास नीरज, प्रो.वसीम बरेलवी, शशांक प्रभाकर अलीगढ़, सिकन्दर हयात गड़बड़, नदीम फारूख, कशिश वारसी, अफॉजॉल मंगलौरी, रुस्तम रामपुरी, एहसान वारसी, रुस्तम वारसी, आद शायरों और डॉ.सरिता शर्मा, तरन्नुम अनवर, नुजहत निगार, ममता सिंह देहरादून, खुशबू शर्मा मुजफ्फरनगर, शबीना अदीब कानपुरी आदि शायरात ने अपने-अपने कलाम से नवाजा।
        इस आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन के आयोजक हाजी वसीमं कुरैशी और एम.फहीम ताज थे। 

"गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्दादिल बनकर रहे, मन से सदा उदार।
गीतकार नीरज तुम्हें, नमन हजारों बार।।

स्वप्न झर गये फूल से, लुटा साज-शृंगार।
आँगन से वटवृक्ष का, मिटा आज आकार।।

दया नहीं करता कभी, क्रूर काल का पाश।
नीरज बिन सूना हुआ, हिन्दी का आकाश।।

आज शोक सन्तप्त है, हिन्दी का प्रासाद।
नीरज जी को कर रहे, हिन्दी प्रेमी याद।।

जीवनभर जिसने किया, हिन्दी का ही काम।
अमर रहेगा युगों तक, उस नीरज का नाम।।

गीत "गीत-छन्द लिखने का फैशन हुआ पुराना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गद्य अगर कविता होगी तो,
कविता का क्या नाम धरोगे?
सूर-कबीर और तुलसी को,
किस श्रेणी में आप धरोगे?
तुकबन्दी औ’ गेय पदों का,
कुछ कहते हैं गया जमाना।
गीत-छन्द लिखने का फैशन,
कुछ कहते हैं हुआ पुराना।
जिसमें लय-गति-यति होती है,
परिभाषा ये बतलाती है।
याद शीघ्र जो हो जाती है,
वो ही कविता कहलाती है।
अपनी कमजोरी की खातिर,
कब तक तर्क-कुतर्क करोगे?
सूर-कबीर और तुलसी को
किस श्रेणी में आप धरोगे?

लिख करके आलेख-लेख को,
अनुच्छेद में बाँट रहे क्यों?
लगा टाट के पैबन्दों को,
काव्य गलीचा गाँठ रहे क्यों?
नहीं जानते पद्य अगर तो,
गद्य लिखो, स्वीकार हमें है।
गद्यकार का रूप तुम्हारा,
दिल से अंगीकार हमें है।
गीतों-ग़ज़लों की नौका में,
कब तक तुम सन्ताप भरोगे?
सूर-कबीर और तुलसी को,
किस श्रेणी में आप धरोगे?

लाओ नूतन शब्द गद्य में,
पावन जल से भरो सरोवर।
शुक्ल-हजारीलाल सरीखे,
बन जाओ तुम गद्य धरोहर।
गद्यकार कहलाने में भी,
घट जाता सम्मान नहीं है।
क्या उपदेशों-सन्देशों में?
मिलता कोई ज्ञान नहीं है।
कड़वी औषध रोग मिटाती,
 पीने में कब तलक डरोगे?
सूर-कबीर और तुलसी को,
किस श्रेणी में आप धरोगे?

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

निन्दा प्रस्ताव "स्वामी अग्निवेश जी पर जानलेवा हमला"

आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान
स्वामी अग्निवेश जी पर जानलेवा हमला
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      झारखण्ड प्रदेश में जय श्री राम का नारा लगाने वाले कथित स्वयं सेवकों और भा.ज.पा. के कथित कार्यकर्ताओं ने भीड़ के साथ सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान स्वामी अग्निवेश जी पर जानलेवा हमला किया है। मैं इसकी भर्तस्ना करता हूँ।
      मैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत तथा भा.ज.पा. के  राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी से माँग करता हूँ कि वह अपनी नीति को स्पष्ट करें या जय श्री राम का नारा लगाने वाले इन कथित स्वयं सेवकों और भा.ज.पा. के कथित कार्यकर्ताओं को अपने संगठन से निकाल बाहर करें।
         इस प्रकार के ओछे और कायराना आचरण से आप हिन्दुत्व बदनाम बदनाम हो रहा है। इससे बढ़कर कायरता क्या होगी कि एक 80 साल के निहत्थे संन्यासी पर कोई भीड़ टूट पड़े ? उसे डंडे और पत्थरों से मारे ? उसके कपड़े फाड़ डाले, उसकी पगड़ी खोल दे, उसे जमीन पर पटक दे ?
       स्वामी अग्निवेश तेलुगुभाषी परिवार की संतान हैं और हिंदी के कट्टर समर्थक हैं। महर्षि दयानंद के वे अनन्य भक्त हैं और कट्टर आर्यसमाजी हैं। वे संन्यास लेने के पहले कलकत्ते में प्रोफेसर थे। वे एक अत्यंत सम्पन्न और सुशिक्षित परिवार के बेटे होने के बावजूद संन्यासी बने। उन्हें पाकिस्तान का एजेंट कहना और गोमांस-भक्षण का समर्थक कहना किसी पाप से कम नहीं है।
       उत्तराखण्ड के समस्त आर्य परिवारों की ओर से मैं इस घटना की निन्दा करता हूँ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक


ग़ज़ल "रूप हमें दिखलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो प्यासी धरती की, अपने जल से प्यास बुझाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।१।
जो मुद्दत से तरस से थे, जल के बिना अधूरे थे,
उन सूखे नदिया-नालों को, निर्मल नीर पिलाते हैं।
 आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।२।

चरैवेति का पाठ पढ़ाने, जो धरती पर आकर के,
पतित-पावनी गंगा को, जो सागर तक ले जाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।३।

जोर-शोर के साथ गरजकर, अपना नाद सुनाते हैं,
बंजर वसुन्धरा में जो, हरियाली लेकर आते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।४।

जिन्हें देखकर पागल-मधुकर, गुंजन करने को आते,
वीराने उपवन में भी, जो सुन्दर सुमन खिलाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।५।

आहट से बादल की, जन-जीवन में सुख भर जाता है,
मुरझाये चेहरे भी जिनको, देख-देख मुस्काते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।६।

पौध धान की तो बारिश के, इन्तजार में रहती है,
श्रमिक-किसानों के जीवन में, रोज़गार को लाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।७।

जल ही जिनका जीवन है, वो नभ को तकते रहते हैं,
दादुर-मोर-पपीहा के, जीवन में खुशियाँ लाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।८।

बादल से ही इन्द्रदेव का, नाम हमेशा जुड़ा हुआ,
इन्द्रधनुष का चौमासे में, “रूप” हमें दिखलाते हैं।
आसमान में जो उगते हैं, वो बादल कहलाते हैं।९।

बुधवार, 18 जुलाई 2018

दोहे "ढोंगी और कुसन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बने हुए बहुरूपिए, ढोंगी और कुसन्त।
जिनका बारहमास ही, होता रोज बसन्त।।

थोड़े से गद्दार हैं, थोड़े से मक्कार।
नैतिकता का देश में, खिसक रहा आधार।।

गंगा बहती झूठ की, गिरी सत्य पर गाज। 
बढ़ते जाते पाप हैं, दूषित हुआ समाज।।

समझो खारे नीर का, कुछ तो मोल-महत्व। 
सागर से कम है नहीं, आँसू का अस्तित्व।।

हारा है कर्तव्य से, दुनिया में अधिकार। 
श्रम-निष्ठा से ही सदा, बनता है आधार।।

विरह तभी है जागता, जब दिल में हो आग। 
विरह-मिलन के मूल में, होता है अनुराग।।

किया-धरा कुछ भी नहीं, बनते लोग नवाब। 
योगदान जिनका नहीं, पूछें वही हिसाब।।

प्यार-प्रीत की राह में, आया है व्यापार। 
महकेगा कैसे भला, नैसर्गिक शृंगार।।

क्यों बेटों की चाह में, रहे बेटियाँ मार। 
अगर न होती बेटियाँ, थम जाता संसार।।

संविधान में कीजिए, अब ऐसे बदलाव। 
माँ बहनों के साथ में, बुरा न हो वर्ताव।।

लुटे नहीं अब देश में, माँ-बहनों की लाज। 
बेटी को शिक्षित करो, उन्नत करो समाज।।

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