"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

दोहे "गुरुओं का ज्ञान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलब के हैं अब गुरू, मतलब के ही शिष्य।
दोनों इसी जुगाड़ में, कैसे बने भविष्य।।

सम्बन्धों की आज तो, हालत बड़ी विचित्र।
नहीं रहे गुरु-शिष्य अब, पावन और पवित्र।।

साथ बैठ गुरु-शिष्य जब, छलकाते हों जाम।
नवयुग की इस पौध का, क्या होगा अंजाम।।

बाजारों में बिक रहा, अब गुरुओं का ज्ञान।
हर ऊँची दूकान का, फीका है पकवान।।

दौलत के दरबार में, पैसे के हैं रंग।।
प्रतिभाएँ कुण्ठित हुई, देख अनोखे ढंग।।

सोमवार, 24 सितंबर 2018

गीत "नीर पावन बनाओ करो आचमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')




जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

कुछ भी दुर्लभ नहीं आदमी के लिए,
मान-सम्मान है संयमी के लिए,
सींचना नेह से अपना प्यारा चमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

रास्ते में मिलेंगे बहुत पेंचो-खम,
साथ में आओ मिलकर बढ़ायें कदम,
नीर पावन बनाओ करो आचमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

पेड़ जो दर्प में थे अकड़ कर खड़े,
एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े,
लोच वालो का होता नही है दमन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

सख्त चट्टान पल में दरकने लगी,
जल की धारा के संग में लुढ़कने लगी,
छोड़ देना पड़ा कंकड़ों को वतन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

घास कोमल है लहरा रही शान से,
सबको देती सलामी बड़े मान से,
आँधी तूफान में भी सलामत है तन।
जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

दोहे "पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

श्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
--
आदिकाल से चल रही, जग में जग की रीत।
वर्तमान ही बाद में, होता सदा अतीत।।
--
जीवन आता है नहीं, जब जाता है रूठ।
जर्जर सूखे पेड़ को, सब कहते हैं ठूठ।।
--
जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
--
वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ।
पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
--
जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
--
जीवित माता-पिता को, मत देना सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
--
अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक।
नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
--
बुरा कभी मत सोचिए, करना मत दुष्कर्म।
सेवा और सहायता, जीवन के हैं मर्म।।

रविवार, 23 सितंबर 2018

दोहे "गजल हो गयी पास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वजन भजन में कम हुआ, गजल हो गयी पास।
भजन कहाँ लव-लीन की, बुझा सकेंगे प्यास।।

कुछ को दौलत का नशा, कोई मद में चूर।
आशिक होते हैं सदा, लोकलाज से दूर।।

लुभा रहा जसलीन को, मखमल का कालीन।
दौलत पाने के लिए, आतुर लव में लीन।।

झूठा प्यार-दुलार है,मतलब का है खेल।
जीवन जीने के लिए, चढ़ी पेड़ पर बेल।।

चाहे राम-रहीम हो, या हो वृद्ध अनूप।
मन को आकर्षित करे, नरम-गुनगुनी धूप।।

वैसा ही पाताल है, जैसा क्षितिज अनन्त।
कामी गिरता गर्त में, ऊपर उठता सन्त।।

सदियों से ही जगत में, पुण्य रहा है हार।
इसीलिए तो बढ़ रहा, निश-दिन पापाचार।।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

दोहे "कर दो दूर गुरूर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बहुत घिनौनी कर रहा, हरकत पाकिस्तान।
सीना छप्पन इंच का, दिखला दो श्रीमान।।

सम्मुख पाकिस्तान के, क्यों होते मजबूर।
आतंकी नापाक का, कर दो दूर गुरूर।।

सम्बन्धों के तार जब, सभी गये हैं टूट।
बैरी पाकिस्तान को, फिर क्यों देते छूट।।

जितनी की थीं सन्धियाँ, सभी करो अब भंग।
दब्बू बनना है नहीं, कूटनीति का अंग।।

छोटे-मोटे वार से, अब न चलेगा काम।
अब तो पाकिस्तान का, कर दो काम तमाम।।

नक्शे पर से मेट दो, अब तो पाकिस्तान।
आज रियाया माँगती, पूरा हिन्दुस्तान।।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

गीत "एक रहो और नेक रहो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

त्यौहारों की धूम मची है,
पर्व नया-नित आता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

उत्सव हैं उल्लास जगाते,
सूने मन के उपवन में,
खिल जाते हैं सुमन बसन्ती,
उर के उजड़े मधुवन में,
जीवन जीने की अभिलाषा,
को फिर से पनपाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

भावनाओं की फुलवारी में
ममता नेह जगाती है
रिश्तों-नातों की दुनिया,
साकार-सजग हो जाती है,
बहना के हाथों से भाई,
रक्षासूत्र बँधाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

क्रिसमस, ईद-दिवाली हो,
या बोधगया बोधित्सव हो,
महावीर स्वामी, गांधी के,
जन्मदिवस का उत्सव हो,
एक रहो और नेक रहो का
शुभसन्देश सुनाता है।
परम्पराओं-मान्यताओं की,
हमको याद दिलाता है।।

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

दोहे "बुड्ढों के अनुबन्ध" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लटक रहे हैं कबर में, जिनके दोनों पाँव।
साठ साल के बाद वो, चले इश्क के दाँव।।

कल तक जो शागिर्द थी, रूपवती जसलीन।
पत्नी बनी अनूप की, होकर अब लवलीन।।

नहीं युवतियों से निभें, बुड्ढों के सम्बन्ध।
मतलब से होते यहाँ, दौलत के अनुबन्ध।।

हुआ कलेवर खोखला, झूठा सारा खेल।
बुड्ढे और जवान की, जोड़ी है बेमेल।।

शर्म-हया सब मर गयी, होकर पैंसठ पार।
किया नहीं है उमर का, बिल्कुल सोच-विचार।।

ओम नाम का जाप कर, पढ़ गीता के श्लोक।
इश्क-मुश्क से तो नहीं, सुधरेगा परलोक।।

गर लौकिक संसार में, चमकाना हो रूप।
ग़ज़ल गायकी छोड़कर, गाओ भजन अनूप।।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails