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सोमवार, 22 जुलाई 2019

ग़ज़ल "नजारा देख मौसम का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चमन के फूल सहमें हैं, नजारा देख मौसम का
हुए गमगीन भँवरे हैं, नजारा देख मौसम का

फलक में हैं बहुत बादल, नदारत है मगर बारिश
बड़ा हैरान है माली, नजारा देख मौसम का

करो जैसा-भरो वैसा, यही कानून कुदरत का
मियाँ हलकान क्यों होते, नजारा देख मौसम का

जफा करके मिलेगा क्या, यहाँ अहसान का बदला
नजर के सामने अपनी, नजारा देख मौसम का

मिला जितना उसी का, शुक्रिया करना नहीं आया
हकीकत तो हकीकत है, नजारा देख मौसम का

सितारों से नहीं होती, कभी भी रात रौशन है
अँधेरी रात में दिलवर, नजारा देख मौसम का

अदब की अंजुमन में, आज होती रूप की पूजा
सुनाते हैं ग़ज़ल जाहिल, नजारा देख मौसम का

रविवार, 21 जुलाई 2019

ग़ज़ल "वही बस पावमानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वही नदिता कहाती है, भरी जिसमें रवानी है
धरा की सब दरारों को, मिटाता सिर्फ पानी है

पनपती बुजदिली जिसमें, युवा वो हो नहीं सकता
उसी को नौजवां समझो, भरी जिसमें जवानी है

जहाँ ईमान बिकते हों, वहाँ सब बात बेमानी
शिकायत और शिकवों की, वहाँ झूठी कहानी है

इबादत तो जमाने में, सभी दिन-रात करते हैं
अगर दिल से इबादत हो, वही बस पावमानी है

मुनाफे के लिए ही लोग तो, करते तिजारत हैं
सियासत में तिजारत तो, यहाँ पर खानदानी है

भरी हों खामियाँ कितनी, बने फिर भी भले-चंगे
हमारी आज भी फितरत, मगर हिन्दोस्तानी है

बुलन्दी का का पतन होना, जमाने की रवायत है
छिपी है खण्डहरों में भी, इमारत की निशानी है

फकत मतलब में होती है, इनायत लोकशाही में
दिखावे की यहाँ पर रह गयी, अब मेजबानी है

भरी हैवानियत कितनी, मनुजता के लिबासों में
जहाँ में 'रूप' पर होना फिदा, आदत पुरानी है

आज एक पुरानी गज़ल "इक शामियाना चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सिर छिपाने के लिएइक शामियाना चाहिए
प्यार पलता हो जहाँवो आशियाना चाहिए

राजशाही महल हो, या झोंपड़ी हो घास की
सुख मिले सबको जहाँ, वो घर बनाना चाहिए

दाँव भी हैं-पेंच भी हैं, प्यार के इस खेल में
इस पतंग को, सावधानी से उड़ाना चाहिए

मुश्किलों से है भरी, ये ज़िन्दग़ानी की डगर
आखिरी लम्हात तक, रिश्ता निभाना चाहिए

जोड़ना मुश्किल बहुत है, तोड़ना आसान है
सभ्यता का आचरण, सबको दिखाना चाहिए

चार दिन की चाँदनी है, फिर अँधेरी रात है
घर सभी का रौशनी से, जगमगाना चाहिए

आइना दिल का मिला है, देख गर्दन को झुका
“रूप” के अभिमान को, अपने हटाना चाहिए

शनिवार, 20 जुलाई 2019

गीत "पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रंग भी रूप भी छाँव भी धूप भी,
देखते-देखते ही तो ढल जायेंगे।
देश भी भेष भी और परिवेश भी,
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

ढंग जीने के सबके ही होते अलग,
जग में आकर सभी हैं जगाते अलख,
प्रीत भी रीत भीशब्द भी गीत भी,
एक न एक दिन तो मचल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

आप चाहे भुला दो भले ही हमें,
याद रक्खेंगे हम तो सदा ही तुम्हें,
तंगदिल मत बनोसंगदिल मत बनो,
पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

हर समस्या का होता समाधान है,
याद आता दुखों में ही भगवान है,
दो कदम तुम बढ़ोदो कदम हम बढ़ें,
रास्ते मंजिलों से ही मिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

अब अँधेरों से बाहर भी निकलो जरा,
पथ बुलाता तुम्हें रोशनी से भरा,
हार को छोड़ दोजीत को ओढ़ लो,
फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे।
वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

दोहे "गोरी का शृंगार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अधरों को अच्छा लगे, अधरों का इकरार।
मन को बहुत लुभा रहा, गोरी का शृंगार।।
--
लाल रंग के अधर हैं, घुँघराले से बाल।
दाड़िम जैसे दहकते, उसके गोरे गाल।।
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कजरारे दो नैन हैं, चितवन करें कमाल।
कानों में झुमकी सजें, बिँदिया चमके भाल।।
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रत्न-जटित है करघनी, मोती की है माल।
मटक-मटक कर चल रही, हिरणी जैसी चाल।।
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सजनी साजन के लिए, सजा रही है थाल।
खाने में अच्छी लगे, सब्जी-रोटी-दाल।।
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चटनी-रोटी भी कभी, कर देती सन्तुष्ट।
जीवनभर होना नहीं, घरवाली से रुष्ट।।
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बात-बात पर मत करो, कभी रंग में भंग।
जीवन को जीते रहो, अमन-चैन के संग।
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दोहे "अखबारों में नाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वृक्षारोपण की लगी, आज सब जगह होड़।
सबने पौधे रोपकर, दिये अधर में छोड़।।
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गत वर्षों की पौध का, बचा न नाम-निशान।
अधिकारीगण आँकड़े, करते खूब बखान।।
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महज दिखावे के लिए, सब सरकारी काम।
यहाँ सभी को चाहिए, अखबारों में नाम।।
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रोपो पौधे कम भले, लेकिन करो रखाव।
लेकिन धरती के लिए, रखिए सेवा-भाव।।
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शाक-पात, फल-फूल-जल, देती हमें जमीन।
लेकिन सब भू-सम्पदा, के दोहन में लीन।।
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बहुत घिनौनी हो गयीं, लोगों की करतूत।
छल से लोग कमा रहे, धन-सम्पदा अकूत।।
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सबको अपनी ही पड़ी, जाय भाड़ में देश।
भारत माँ का कर रहे, ये दूषित परिवेश।।
--

बुधवार, 17 जुलाई 2019

दोहे "सद्गुरुओं को रंज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मतलब के हैं अब गुरू, मतलब के हैं शिष्य।
नेह बिना तब पौध का, कैसे बने भविष्य।।
--
लेखन-शोधन के लिए, चलकर आते द्वार।
चेले मतलब के लिए, करते हैं मनुहार।।
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नहीं छिपाये से छिपें, खिलते फूल कनेर।
मिलकर चेले राह में, लेते नजरें फेर।।
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हो जाये गुरु-शिष्य का, रिश्ता यदि निष्काम।
तभी सार्थक हो यहाँ, करना दुआ-सलाम।।
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यदि दैनिक व्यवहार में, बरतें शिष्टाचार।
होगा तब गुरुपूर्णिमा, दिवस यहाँ साकार।।
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बिकती है बाजार में, शिक्षा देकर मोल।
इसीलिए तो योग्यता, होती डाँवाडोल।।
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चाहे समझो सीख ये, चाहे समझो तंज।
होता है यह देखकर, सद्गुरुओं को रंज।।

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