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बुधवार, 8 दिसंबर 2021

दोहे "सुख देती है धूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुरनरमुनि के ज्ञान कीजब ढल जाती धूप।
छत्र-सिंहासन के बिनारंक कहाते भूप।।
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बिना धूप के खेत मेंफसल नहीं उग पाय।
बारिश-गरमी-शीत कोभुवनभास्कर लाय।।
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शैल शिखर उत्तुंग परजब पड़ती है धूप।
हिमजल ले सरिता बहेंले गंगा का रूप।।
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नष्ट करे दुर्गन्ध कोशीलन देय हटाय।
पूर्व दिशा के द्वार पररोग कभी ना आय।।
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खग-मृगकोयल-काग कोसुख देती है धूप।
उपवन और बसन्त कायह सवाँरती रूप।।
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गेहूँ उगता ग़ज़ल सासरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट मेंढकी ढोल की पोल।।
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मौसम आकर्षित करेहमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करेहोकर भावविभोर।।
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कड़क नहीं माँझा रहानाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चलाबिन बाँधे ही छोर।।
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पत्रक जब पीला हुआहरियाली नहीं पाय।
जाने कब शाखाओं सेपके पान झड़ जाय।।
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मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

ग़ज़ल "अब कैसे सुधरें हाल सुनो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भाषण से बहलाने वालों, वचनों के कंगाल सुनो
माल मुफ्त का खाने वालों, जंगल के शृंगाल सुनो

बिना खाद-पानी के कैसे, खेतों में बिरुए पनपें
ठेकेदारों ने उन सबका, हड़प लिया है माल सुनो

प्राण निछावर किये जिन्होंने, आजादी दिलवाई थी
उन सबके वंशज गुलशन में, आज हुए बेहाल सुनो

घेर लिये हैं चाँद-सितारे, धरती के खद्योतों ने
पावस में खामोश हो गये, कोकिल और मराल सुनो

भोली सोनचिरैय्यों के, चीलों ने गहने झपट लिए
अवश-विवश गौरय्या के, अब कैसे सुधरें हाल सुनो

सीधे-सादे श्रम करते, मक्कारों की पौबारह है
अत्याचारों की चक्की में, पिसते माँ के लाल सुनो

दुनिया में बदनाम आजकल, लोकतन्त्र का “रूप” हुआ
जाल बुन रहे हैं जनसेवक, हो करके वाचाल सुनो
  

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

दोहे "अब इस ओमीक्रोन से, कैसे पायें पार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कोरोना फिर आ गया, लेकर नूतन रूप।

देश और परदेश में, रोग हुआ विद्रूप।।

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आया ओमीक्रोन का, चर्चा में अब नाम।

होकर बहुत सतर्क ही, करना अपने काम।।

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पूरी दुनिया के लिए, चिन्ता की है बात।

इसका अभी इलाज भी, नहीं किसी को ज्ञात।।

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जड़-जंगल है संक्रमित, दूषित गंगा धार।

अब इस ओमीक्रोन से, कैसे पायें पार।।

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जीवन में दुर्लभ हुई, अब तो सुख की भोर।

फैल रहा है संक्रमण, दुनिया में चहुँ ओर।।

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आया समय चुनाव का, होगी भारी भीड़।

कितनों के इस रोग से, उजड़ेंगे अब नीड़।।

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ऐसे करो उपाय अब, घटे रोग फैलाव।

करो स्थगित देश में, थोड़े समय चुनाव।।

--


रविवार, 5 दिसंबर 2021

गीत "तुमसे ही मेरा घर-घर है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"वैवाहिक जीवन की 48वीं वर्षगाँठ"
(5 दिसम्बर, 1973)
कलिका हो मन के उपवन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

तुमसे ही मेरा घर-घर है,
सपनों का आबाद नगर है,
सुख-दुख में हो साथ निभाती,
तुलसी हो मेरे आँगन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

कोयल सी तुम चहक रही हो,
जूही सी तुम महक रही हो,
नेह सुधा सरसाने वाली,
घन चपला हो तुम सावन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

तुम शीतल बयार मतवाली,
तुम हो नैसर्गिक हरियाली,
जंगल चमन बनाया तुमने,
तुम आभा-शोभा कानन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

तुम हो प्यारे मीत हमारे,
तुम पर गीत रचे हैं सारे,
नाती-पोतों की किलकारी,
याद दिलाती है बचपन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

युग बीता चालिस सालों का,
अब चाँदी सा रँग बालों का,
प्रणयदिवस के महापर्व पर,
यादें वाबस्ता यौवन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

अमर भारती नाम तुम्हारा,
“रूप” बहुत लगता है प्यारा,
मैं मन का मतवाला पंछी,
तुम अब भी हो भोले मन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

गीत "48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-5 दिसम्बर, 2021" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ
(5 दिसम्बर, 2021)
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बस इतना उपहार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

जीवन जीने की है आशा,
चलता रहता खेल-तमाशा,
सुर की मृदु झनकार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

वाद-विवाद भले फैले हों,
अन्तस कभी नहीं मैले हों,
आपस में मनुहार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

सबकी सुननाअपनी कहना,
बच्चों की बातों को सहना,
हरा-भरा परिवार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

पहले जैसा 'रूप' नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

साथी साथ निभाते रहना,
उपवन को महकाते रहना,
हँसी-खुशी संसार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

दोहे "चरैवेति का मन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन प्रहसन के सभी, इस दुनिया में पात्र।

सबका जीवन है यहाँ, चार दिनों का मात्र।।

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चाहे जीवन में रहें, झंझट और बवाल।

जीना सब ही चाहते, हो कैसा भी हाल।।

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जीवन के इस खेल में, पग-पग पर हैं पाश।

मकड़ी से लेकर सबक, होना नहीं निराश।।

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जीवन के दो चक्र हैं, सुख-दुख जिनके नाम।

दोनों ही हालात में, धीरज से लो काम।।

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चंचल मन की हाथ में, रखना खींच लगाम।

इसके हाथों तुम कभी, बनना नहीं गुलाम।।

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जिसने मन पर कर लिया, स्वामी बन अधिकार।

मानवता का मिल गया, उसको ही उपहार।।

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सरल सुभाव अगर नहीं, धर्म-कर्म सब व्यर्थ।

छल-बल कपट मनुष्य का, करता सदा अनर्थ।।

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चरैवेति के मन्त्र को, सरिताओं से सीख।

सागर भी जल के लिए, जिनसे माँगे भीख।।

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गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

ग़ज़ल "सुनानी पड़ेगी ग़ज़ल धीरे-धीरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुजरने लगा है, सफर धीरे-धीरे

कठिन धीरे-धीरे, सरल धीरे-धीरे

 

किये हैं जो करतब भुगतने पड़ेंगे

पीना पड़ेगा गरल धीरे-धीरे

 

यहाँ पाप और पुण्य दोनों खड़े हैं

करनी पड़ेगी पहल धीरे-धीरे

 

जीवन  हिस्सा सभी हैं हमारे

सुनानी पड़ेगी ग़ज़ल धीरे-धीरे

 

मेहनत से अपना नहीं जी चुराना

बनाना पड़ेगा महल धीरे-धीरे

 

इंसाफ की थाम करके तराजू

देना पड़ेगा दखल धीरे-धीरे

 

सलामत न रहता कभी "रूप" कोई

दिखाना पड़ेगा शगल धीरे-धीरे

 

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