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रविवार, 15 सितंबर 2019

दोहे "उलटी गिनती पाक की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हो जायेंगे पाक के, अब तो टुकड़े पाँच।
झूठ सदा ही जीतता, और हारता साँच।।
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पीओके बन जायगा, भारत का फिर अंग।
होंगें तब कशमीर के, बन्धु-बान्धव संग।।
-- 
सोच-समझकर फैसला, करती है सरकार।
पूरे ही कशमीर पर, होगा अब अधिकार।।
-- 
झेलेंगे अब हम नहीं, सीमा पर आतंक।
धो देंगे इतिहास का, सारा आज कलंक।।
-- 
नेहरू-जिन्ना ने दिया, साजिस को अनजाम।
दो भाग में बँट गया, तब से एक निजाम।।
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अब तो पाकिस्तान पर, लटक रही तलवार।
लिया कृष्ण भगवान ने, मोदी का अवतार।।
-- 
उलटी गिनती पाक की, शुरू हो गयी आज।
अब जल्दी इमरान का, छिन जायेगा ताज।।
--  

शनिवार, 14 सितंबर 2019

दोहे "हिन्दी है परतन्त्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रटे-रटाये शब्द हैं, घिसे-पिटे हैं वाक्य।
अँगरेजी करने लगी, हिन्दी का शालाक्य।।
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कहने को स्वतन्त्र हैं, लेकिन स्व स्वर्गीय।
देवनागरी रह गयी, पुस्तक में पठनीय।।
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अँगरेजी की कैद में, हिन्दी है परतन्त्र।
अपनी भाषा के लिए, तरस रहा जनतन्त्र।।
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बिगड़ गयी है वर्तनी, नहीं लिखाई ठीक।
भटक रही है देश में, हिन्दी की तकनीक।।
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मास सितम्बर में रहे, हिन्दी का उजियार।
बाकी पूरे सालभर, रहता है अँधियार।।
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नहीं सार्थक है अभी, आजादी का मन्त्र।
मीलों-कोसों दूर है, जनता से जनतन्त्र।।
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ऋषि-मुनियों के देश में, हिन्दी को वनवास।
अपनी भाषा के बिना, भारत देश उदास।।
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दोहे "श्रद्धा और श्राद्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबके अपने ढंग हैं, सबके अलग रिवाज।
श्राद्ध पक्ष में कीजिए, विधि-विधान से काज।।
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श्रद्धा से ही कीजिए, निज पुरुखों को याद।
श्रद्धा ही तो श्राद्ध की, होती है बुनियाद।।
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मात-पिता को मत कभी, देना तुम सन्ताप।
पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।।
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जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास।
उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।।
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वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ।
पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।।
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अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास।
पूरे श्रद्धाभाव से, रक्खो व्रत-उपवास।।
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जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र।
अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।।
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अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक।
नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।।
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शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

दोहे हिन्दीदिवस "दिखने लगा उजाड़" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भाषा के आकाश पर, बादल हैं घनघोर।
अँगरेजी भी है लचर, हिन्दी भी कमजोर।।
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अँगरेजी का हो रहा, भारत में परित्राण।
नौकरशाहों के चले. निज भाषा पर बाण।।
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शब्दों का अम्बार है, लेकिन है उलझाव।
आते मस्तक में नहीं, अब तो नूतन भाव।।
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लिखता कविता-दोहरे, रचता रहता गीत।
चौथेपन में कर रहा, अपना समय व्यतीत।।
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लोगों ने अब कर दिये, नंगे सभी पहाड़।
देवभूमि के चमन में, दिखने लगा उजाड़।।
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पर्वत का वातावरण, अब तो हुआ खराब।
 लोग धड़ल्ले से यहाँ, पीने लगे शराब।।
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अब भाषा के नाम पर, होने लगा मखौल।
शोर-शराबे से हुआ, दूषित अब माहौल।। 
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गुरुवार, 12 सितंबर 2019

दोहे "चतुर्दशी का पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आदिदेव के नाम से, करना सब शुभ-कार्य।
गणपति की पूजा करो, कहते धर्माचार्य।।
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भर देता नवऊर्जा, चतुर्दशी का पर्व।
गणपति के त्यौहार पर, भक्तों को है गर्व।।
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हुआ चतुर्थी से शुरू, गणपति जी का पर्व।
हर्षित होते दस दिवस, सुर-नर, मुनि गन्धर्व।।
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वन्दन-पूजन से किया, सबने विदा गणेश।
विघ्नविनाशक आप ही, सबके हो प्राणेश।।
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बाधाओं का शमन हो, मिट जायेंगे रोग।
मोदक से विध्नेश को, आप लगायें भोग।।
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रमा और माँ शारदे, रहें आपके साथ।
रखना मेरे शीश पर, गणनायक जी हाथ।।
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मूषक ढोता आपका, भारी-भरकम भार।
गणपति मेरे सदन में, आओ बारम्बार।।
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गीत "13 सितम्बर-ज्येष्ठ पुत्र नितिन का जन्मदिन"

मित्रों!
13 सितम्बर को मेरे ज्येष्ठ पुत्र नितिन का जन्मदिन है।
शुभकामनास्वरूप प्रस्तुत हैं मेरे कुछ उद्गार...!
जीवन के क्रीड़ांगन मेंतुम बनकर रहो विजेता।
जन्मदिवस की बेला परआशीष तुम्हें मैं देता।
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आदर्शों की नींव हमेशाअपने बच्चों में डालो,
जैसे मैंने पाला तुमकोवैसे ही तुम भी पालो,
लालन-पालन करो सभी का बनकर प्रवण-प्रणेता।
जन्मदिवस की बेला पर, आशीष तुम्हें में देता।।
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जीवनसाथी के संग में तुमवाद-विवाद न करना,
आदर्शो की बेल सींचनाबनकर जल का झरना,
आते-जाते ही रहते हैं, कलयुग, सतयुग-त्रेता।
जन्मदिवस की बेला पर, आशीष तुम्हें मैं देता।।
--
मात-पिता अभ्यागत की तुम, की सेवा करना मन से,
कभी अनुज को अलग न करनाजीवनभर जीवन से,
मंजिल चलकर ही मिलती है, मत बनना अभिनेता।
जन्मदिवस की बेला पर, आशीष तुम्हें में देता।।
--
सच्चाई के साथ हमेशा निष्ठा से तुम काम करो,
लम्बा जीवन जियोऔर दुनिया में अपना नाम करो,
जो करता है प्यार सभी कोबनता वही चहेता।
जन्मदिवस की बेला पर, आशीष तुम्हें मैं देता
--

बुधवार, 11 सितंबर 2019

दोहे "अँगरेजी का रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अँगरेजी से कीजिए, भारत में वैराग्य।
हिन्दी-हिन्दुस्तान का, होगा तब सौभाग्य।।
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भाषा होनी चाहिए, एक देश में एक।
संविधान कहता यही, नीयत रक्खो नेक।।
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किस कारण से आज भी, इँगलिश रहे सहेज।
अँगरेजी भी छोड़ दो, चले गये अँगरेज।।
-- 
अपनी भाषा में करो, अपने सारे काज।
अँगरेजी का देश से, दूर करो अब राज।।
-- 
हिन्दी के परिवेश में, छिड़ी हुई है जंग।
आज सियासत में चढ़ा, अँगरेजी का रंग।।
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देवनागरी कर रही, अब भी यही गुहार।
अँगरेजी को आज भी, ढोती क्यों सरकार।।
 --
बहुमत मिला प्रचण्ड जब, फिर क्यों हो मजबूर।
अँगरेजी को कीजिए, भारत से अब दूर।।
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