![]() ![]() ![]() ![]() | ![]() आलोकित हो वतन हमारा। हो सारे जग में उजियारा।। कंचन जैसा तन चमका हो, उल्लासों से मन दमका हो, खुशियों से महके चौबारा। हो सारे जग में उजियारा।। आओ अल्पना आज सजाएँ, माता से धन का वर पाएँ, आओ दूर करें अँधियारा। हो सारे जग में उजियारा।। घर-घर बँधी हुई हो गैया, तब आयेगी सोन चिरैया, सुख का सरसेगा फव्वारा। होगा तब जग में उजियारा।। आलोकित हो वतन हमारा। हो सारे जग में उजियारा।। ♥♥♥ पर्वों की शृंखला में आप सभी को धनतेरस, नर्क चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की हार्दिक शुभकामनाएँ! ♥ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”♥ |
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रविवार, 19 अक्टूबर 2025
"धनतेरस, नर्क चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 12 नवंबर 2023
गीत "दीपावली-नेह के दीपक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- दीप खुशियों के जलाओ, आ रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- क्या करेगा तम वहाँ, होंगे अगर नन्हें दिए, रात झिल-मिल कर रही नभ में सितारों को लिए, दीन की कुटिया में खाना, खा रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- नेह के दीपक सभी को अब जलाना चाहिए, प्यार से उल्लास से, उत्सव मनाना चाहिए, उन्नति का पथ हमें, दिखला रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- शायरों-कवियों के मन में उमड़ते उद्गार हैं, बाँटते हैं लोग अपनों को यहाँ उपहार हैं, गीत-ग़ज़लों के तराने, गा रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- गजानन के साथ, लक्ष्मी-शारदा की वन्दना, देवताओं के लिए अब, द्वार करना बन्द ना, मन्त्र को उत्कर्ष के, सिखला रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- |
रविवार, 23 अक्टूबर 2022
दोहे "दीपावली-पंच पर्वों की शुभकामनाएँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
झिलमिल-झिलमिल जल रहे, ये माटी के दीप। देवताओं के चित्र के, रखना इन्हें समीप।। -- दीपों की दीपावली, देती है सन्देश। घर-आँगन के साथ में, रौशन हो परिवेश।। -- पाकर बाती-नेह को, लुटा रहा है नूर। नन्हा दीपक कर रहा, अन्धकार को दूर।। -- लछमी और गणेश के, रहें शारदा साथ। चरणों में इनके सदा, रोज झुकाओ माथ।। -- कभी विदेशी माल का, करना मत उपयोग। सदा स्वदेशी का करो, जीवन में उपभोग।। -- मेरे भारतवासियों, ऐसा करो चरित्र। दौलत अपने देश की, रखो देश में मित्र।। -- |
गुरुवार, 12 नवंबर 2020
गीत "आ रही दीपावली" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दीप खुशियों के जलाओ, आ रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- क्या करेगा तम वहाँ, होंगे अगर नन्हें दिये, चाँद-तारों को करीने से, अगर रौशन किये, हार जायेगी अमावस, छा गई दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- नित्य घर में नेह के, दीपक जलाना चाहिए, उत्सवों को हर्ष से, हमको मनाना चाहिए, पथ हमें प्रकाश का, दिखला रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- शायरों को शम्मा से, कवियों को दीपक से लगाव, महकते मिष्ठान से, होता सभी को है लगाव, गीत-ग़ज़लों का तराना, गा रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- गजानन के साथ, लक्ष्मी-शारदा की वन्दना, देवताओं के लिए अब, द्वार करना बन्द ना, मन्त्र को उत्कर्ष के, सिखला रही दीपावली। रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।। -- |
शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019
गीत "नेह के दीपक" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
--
दीप खुशियों के जलाओ, आ रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।
--
क्या करेगा तम वहाँ, होंगे अगर नन्हें दिए,
रात झिल-मिल कर रही, नभ में सितारों को लिए,
दीन की कुटिया में खाना, खा रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।
--
नेह के दीपक सभी को, अब जलाना चाहिए,
प्यार से उल्लास से, उत्सव मनाना चाहिए,
उन्नति का पथ हमें, दिखला रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।
--
शायरों-कवियों के मन में उमड़ते उद्गार हैं,
बाँटते हैं लोग अपनों को यहाँ उपहार हैं,
गीत-ग़ज़लों के तराने, गा रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।
--
गजानन के साथ, लक्ष्मी-शारदा की वन्दना,
देवताओं के लिए अब, द्वार करना बन्द ना,
मन्त्र को उत्कर्ष के, सिखला रही दीपावली।
रौशनी से जगमगाती, भा रही दीपावली।।
--
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सोमवार, 5 नवंबर 2018
गीत "इस धरा को रौशनी से जगमगायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
एक दीपक तुम जलाओ, एक दीपक हम जलायें।
आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
आज दूषित सभ्यता की, चल रहीं हैं आँधियाँ,
आग में अलगाव की तो, जल रही हैं वादियाँ,
नफरतों को दूर करके, एकता की धुन बजायें।
आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
वतन में गन्दी सियासत, सेंकती हैं रोटियाँ,
स्वप्न ज़न्नत के दिखाकर, नोचती हैं बोटियाँ,
सूखते परिवेश में हम, नेह की फसलें उगायें।
आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
अन्न-जल खा जिस चमन में, हम पले हैं,
थामकर अँगुली वतन की हम चले हैं,
आओ श्रद्धा-भाव से उस मातृभू को सिर नवायें।
आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
जगत में अस्तित्व है जिससे हमारा,
सभी का होता जहाँ पर है गुजारा,
शौर्य के, अभिमान के हम गीत आओ गुनगुनायें।
आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
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बुधवार, 18 अक्टूबर 2017
"धनतेरस, नर्क चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ"
![]() ![]() ![]() ![]() | ![]()
आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
कंचन जैसा तन चमका हो,
उल्लासों से मन दमका हो,
खुशियों से महके चौबारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
आओ अल्पना आज सजाएँ,
माता से धन का वर पाएँ,
आओ दूर करें अँधियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
घर-घर बँधी हुई हो गैया,
तब आयेगी सोन चिरैया,
सुख का सरसेगा फव्वारा।
होगा तब जग में उजियारा।।
आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
♥♥♥
पर्वों की शृंखला में
आप सभी को
धनतेरस,
नर्क चतुर्दशी,
दीपावली,
गोवर्धनपूजा
और
भइयादूज की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
♥ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”♥
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गीत "मधुर वाणी बनाएँ हम" (दीपावली की शुभकामनाएँ)
हुआ मौसम गुलाबी अब,
चलो दीपक जलाएँ हम।
घरों में धान आये हैं,
दिवाली को मनाएँ हम।
बढ़ी है हाट में रौनक,
सजी फिर से दुकानें हैं,
मधुर मिष्ठान को खाकर,
मधुर वाणी बनाएँ हम।
मनो-मालिन्य को अपने,
मिटाने का समय है अब,
घरों के साथ आँगन को,
करीने से सजाएँ हम।
छँटें बादल गगन से हैं,
हुए निर्मल सरोवर हैं,
चलो तालाब में अपने,
कमल मोहक खिलाएँ हम।
सुमन आवाज देते हैं,
चलो सींचे बगीचों को,
चमन मैं आज फिर से,
कुछ नये पौधे उगाएँ हम।
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रविवार, 30 अक्टूबर 2016
दोहे "सबको दो उपहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
दोहे "नहीं जेब में दाम" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
मनमोहक सबको लगें, झालर-बन्दनवार।
जगमग करती रौशनी, सजे हुए बाजार।।
--
मन सबका ललचा रहे, काजू औ’ बादाम।
लेकिन श्रमिक-किसान की, नहीं जेब में दाम।।
--
धनवानों के है लिए, दीपों का त्यौहार।
जुआ खेलते शान से, जीत रहे या हार।।
--
बाजारों में धान का, गिरा हुआ है भाव।
धरती के भगवान के, घर में बहुत अभाव।।
--
जो दुनिया को पालता, बदतर उसका हाल।
औने-पौने दाम में, उसका बिकता माल।।
--
चाहे अपने देश में, कोई हो सरदार।
नहीं किसानों का बना, अब तक पैरोकार।।
--
जितने जनसेवक हुए, निकले सब मक्कार।
करते हैं मत के लिए, भाषण लच्छेदार।।
--
उनकी है दीपावली, उनके सब त्योहार।
लेकिन जनता झेलती, महँगाई की मार।।
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मंगलवार, 10 नवंबर 2015
"नरकचतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ!" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
कंचन जैसा तन चमका हो,
उल्लासों से मन दमका हो,
खुशियों से महके चौबारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
आओ अल्पना आज सजाएँ,
माता से धन का वर पाएँ,
आओ दूर करें अँधियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
घर-घर बँधी हुई हो गैया,
तब आयेगी सोन चिरैया,
सुख का सरसेगा फव्वारा।
होगा तब जग में उजियारा।।
आलोकित हो वतन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।
♥♥♥
पर्वों की शृंखला में
आप सभी को
धनतेरस,
नर्क चतुर्दशी,
दीपावली,
गोवर्धनपूजा
और
भइयादूज की
हार्दिक शुभकामनाएँ!
♥ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”♥
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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013
"रौशनी की हम कतारें ला रहे हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
अब धरा पर रह न जाये तम कहीं,
रौशनी की हम कतारें ला रहे हैं।
इस दिवाली पर दियों के रूप में,
चाँद-सूरज और सितारे आ रहे हैं।।
दीपकों की बातियों
को तेल का अवलेह दो,
जगमगाने के लिए भरपूर
इनको नेह दो।
चहकती दीपावली हर
द्वार पर हों
महकती लड़ियाँ सजीं
दीवार पर हों।
शारदा-लक्ष्मी-गजानन
देव को,
स्वच्छ-सुन्दर
नीड़ ज्यादा भा रहे हैं।
धूप-चन्दन, दीप और
अनुराग से,
भक्ति के रँग में
रंगे शुभराग से,
देवगण की नित्य
होनी चाहिए आराधना,
वन्दना से ही सफल
होगी हमारी साधना,
हे प्रभो! आकाश
को निर्मल करो,
दुःख के बादल
घनेरे छा रहे हैं।
कर्तव्य की करता
न कोई होड़ है,
अब मची अधिकार की
ही दौड़ है।
सभ्यता का भाव बौना
हो गया.
आवरण कितना घिनौना
हो गया।
संक्रमण के इस भयानक
दौर में,
दम्भ-लालच आदमी
को खा रहे हैं।
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