यौवन गया, बुढ़ापा आया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। पुतली के परदे पर सारे घूम रहे हैं चित्र सलोने, जीवित होकर झूम रहे हैं जीवन के सब खेल-खिलौने, सारे झंझावातों से मैंने जमकर संघर्ष किया, हार नहीं मानूँगा, मैंने ऐसा शिवसंकल्प लिया, खट्टा-मीठा अनुभव पाया, नहीं कभी मन को भटकाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। लहरों से में लड़ा हमेशा, हिम्मत को पतवार बनाया, सागर के भँवरों में मैंने, चप्पू को हथियार बनाया, जो छलनी में दूध दूहता, खाली हाथ लौट आता है, जो चिड़िया की आँख देखता, वो ही लक्ष्य बेध पाता है, निर्बल पर नहीं हाथ उठाया, बलवानों पर दाँव चलाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। चीर पर्वतों की छाती को, बहता कल-कल जल का धारा, जीते-जी तुम हार न मानों, जीवन मिलना कठिन दुबारा, आये हो तो कुछ कर जाओ, दुनिया में कुछ नाम कमाओ, समय बहुत ही मूल्यवान है, आलस में मत समय गँवाओ, जिसने माँ का मान बढ़ाया, वो ही है माता का जाया। जो ठाना वो कर दिखलाया।। |
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गुरुवार, 13 सितंबर 2012
"जो ठाना वो कर दिखलाया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
"उच्चारण भी थम जाता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रिश्तों-नातों को ठुकरा कर, पंछी इक दिन उड़ जाता है।। जब धड़कन रुकने लगती है, उच्चारण भी थम जाता है।। लाख लगाओ कितने पहरे, सब सम्बन्ध धरे रह जाते। जलप्लावन के साथ-साथ ही, सब अनुबन्ध यहाँ बह जाते। आवा-जाही के नियमों से, कोई बशर न बच पाता है। जब धड़कन रुकने लगती है, उच्चारण भी थम जाता है।। वक्त सदा बलवान रहा है, रह जाते हैं कोरे वादे। धूल-धूसरित हो जाते हैं, सब मंसूबे और इरादे। शव को सीढ़ी पर ले जाकर, बेटा चिता जला आता हैं। जब धड़कन रुकने लगती है, उच्चारण भी थम जाता है।। जीवन चला-चली का मेला, थोडे ही दिन का है खेला। कोई साथ न दे पाता है, जाना पड़ता फ़कत अकेला। चिड़ियाघर में आकर प्राणी, दुनिया का मन बहलाता है। जब धड़कन रुकने लगती है, उच्चारण भी थम जाता है।। |
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