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गुरुवार, 20 जनवरी 2022

नवगीत "खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जी रहे पेड़-पौधे हमारे लिए
दे रहे हैं हमें शुद्ध-शीतल पवन! 
खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन!! 
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आदमी के सितम-जुल्म को सह रहे
परकटे से शज़र निज कथा कह रहे
रत्न अनमोल हैं ये हमारे लिए
कर रहे हम इन्हीं का हमेशा दमन! 
खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन!! 
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ये हमारे लिए मुफ्त उपहार हैं
कर रहे देश-दुनिया पे उपकार हैं
ये बचाते धरा को हमारे लिए
रोग और शोक का होता इनसे शमन! 
खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन!! 
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ये हमारी प्रदूषित हवा पी रहे
घोटकर हम इन्हीं को दवा पी रहे
तन हवन कर रहे ये हमारे लिए
इनके तप-त्याग को है हमारा नमन!
खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन!! 
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बुधवार, 19 जनवरी 2022

गीत "माँग रहे हैं ये वोटों का दान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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सज्जनता का ओढ़ लबादा,
घूम रहे शैतान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!
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द्वारे-द्वारे देते दस्तक,
टेक रहे हैं अपना मस्तक,
याचक बनकर माँग रहे हैं,
ये वोटों का दान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!
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कोई अपना हाथ दिखाता,
कोई हाथी के गुण गाता,
साइकिल कोई यहाँ चलाता,
कोई घड़ी का समय बताता,
लेकिन झाड़ू भय खाते,
ये प्राचीन निशान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!
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जीवन भर गद्दारी करते,
भोली जनता का मन हरते,
मक्कारी से कभी न डरते,
फर्जी गणनाओं को भरते,
खर्च करोड़ों का करते हैं,
गिरवीं रख ईमान।
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!!
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सोच-समझकर बटन दबाना,
झाँसे में बिल्कुल मत आना,
घोटाले करने वालों को,
कभी न कुर्सी पर बैठाना,
मत देने से पहले,
लेना सही-ग़लत पहचान!
संकट में है हिन्दुस्तान!
संकट में है हिन्दुस्तान!! 
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मंगलवार, 18 जनवरी 2022

दोहे "कुहरे का है क्लेश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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नहीं हुआ है देश में, अभी शीत का अन्त।
कुहरे से इस साल तो, शीतल हुआ बसन्त।।
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कुहरे-सरदी ने किये, कीर्तिमान सब ध्वस्त।
सूरज की गति देखकर, हुए हौसले पस्त।।
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नहीं दिखाई दे रहा, वासन्ती संगीत।
कुहरे से इस साल तो, है सूरज भयभीत।।
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सरदी हाड़ कँपा रही, बिगड़ गया परिवेश।
उत्तर भारत में अभी, कुहरे का है क्लेश।।
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शीतलता की मार को, लोग रहे हैं झेल।
नहीं समझ में आ रहा, मौसम का ये खेल।।
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सोमवार, 17 जनवरी 2022

दोहे "अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अमल-धवल होता नहीं, सबका चित्त-चरित्र।
जाँच-परख के बाद ही, यहाँ बनाना मित्र।।।
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रखना नहीं घनिष्ठता, उन लोगों के संग।
जो अपने बनकर करें, गोपनीयता भंग।।
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जिसमें हो सन्देश कुछ, रचना ऐसा गीत।
सात सुरों के मेल से, बनता है संगीत।।
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जो समाज को दे दिशा, कहलाता साहित्य।
जीवन दे जो जगत को, वो होता आदित्य।।
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महादेव बन जाइए, करके विष का पान।
धरा और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।
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रविवार, 16 जनवरी 2022

दोहे "शीतल हुई दुपहरी, शीतल ही है भोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जब से लोगों को मिला, नया-नवेला साल।
तब से सरदी बढ़ गयी, बिगड़ गये हैं हाल।।
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सूरज है शरमा रहा, कुहरा चारों ओर।
शीतल हुई दुपहरी, शीतल ही है भोर।।
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लोग लगाकर टकटकी, तकते हैं आकाश।
शहर और देहात में, सब हो रहे निराश।।
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बीत गयी है लोहड़ी, छाया है उल्लास।
बढ़े हुए दिनमान का, अभी नहीं आभास।।
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मकर लग्न में आ गये, अब सूरज भगवान।
धीरे-धीरे बढ़ रहा, भारत में दिनमान।।
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आने वाला देश में, अब फिर से ऋतुराज।
होता है सबसे सुखद, वासन्ती अन्दाज।।
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लगं चहकने बाग में, अब तो कलियाँ-फूल।
जंगल में हँसने लगे, कण्टक वृक्ष बबूल।।
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शनिवार, 15 जनवरी 2022

गीत "धूप गुनगुनी पाने को, सबका मन है ललचाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
सन-सन शीतल चला पवन,
सरदी ने रंग जमाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शरमाया।।

जलते कहीं अलावसेंकता बदन कहीं है कालू,
कोई भूनता शकरकन्द कोकोई भूनता आलू,
दादा जी ने अपने तन पर,
कम्बल है लिपटाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शरमाया।।

जितने वस्त्र लपेटोउतना ही ठण्डा लगता है,
चन्दा की क्या कहेंसूर्य भी शीत उगलता है,
धूप गुनगुनी पाने को,
सबका मन है ललचाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शरमाया।।

काजू और बादाम, स्वप्न जैसे लगते निर्धन को,
मूँगफली खाकर देते हैं, सभी दिलासा मन को,
गजक-रेवड़ी के दर्शन कर,
दिल को समझाया।
ओढ़ चदरिया कुहरे की,
सूरज नभ में शरमाया।।

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

दोहे, "मकर संक्रान्ति-विविधताओं में एकता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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उत्तरायणी पर्व को, ले आया नववर्ष।
तन-मन में सबके भरा, कितना नूतन हर्ष।।
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मकर राशि में आ गये, अब सूरज भगवान।
नदिया में स्नान कर, करना रवि का ध्यान।‍।
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भारत में इस पर्व के, अलग-अलग हैं नाम।
विविधताओं में एकता, सुन्दर-सुखद-ललाम।।
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चारों ओर भरा हुआ, लोगों में उल्लास।
सुधरेगा परिवेश अब, सबको यह विश्वास।।
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घट जायेगी देश में, अब सर्दी की मार।
उपवन में आ जायेगा, नैसर्गिक सिंगार।।
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कलाबाजियाँ कर रहीं, उड़तीं हुई पतंग।
बिखराती आकाश में, भाँति-भाँति के रंग।।
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वसुन्धरा सजने लगी, कर सोलह सिंगार।
भारतमाता को करो, सच्चा-सच्चा प्यार।।
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तन को भी निर्मल करो, मन के हरो विकार।
गंगासागर दे रहा, पूजा का अधिकार।।
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अब भँवरे करने लगे, उपवन में गुंजार।
कलियों में होने लगा, यौवन का संचार।।
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पीताम्बर को ओढ़कर, घूम रहा है सन्त।
बासन्ती परिवेश में, सजने लगा बसन्त।।
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शंकर जी भी चल दिये, मैदानों की ओर।
निर्मल हो मन्दाकिनी, कल-कल करती शोर।।
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माता-पिता बुजुर्ग का, हरदम करना मान।
ज्ञानसिन्धु आचार्य का, करना मत अपमान।।
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नहीं बड़ा है देश से, भाषा-धर्म-प्रदेश।
भेद-भाव की भावना, पैदा करती क्लेश।।

गुरुवार, 13 जनवरी 2022

दोहे "लोहिड़ी-लोगों में उल्लास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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पर्व लोहिड़ी का हमें, देता है सन्देश।

मानवता अपनाइए, सुधरेगा परिवेश।१।

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प्रेम और सद्भाव से, बनते बिगड़े काज।

मूँगफली के साथ में, बाँटो लड्डू आज।२।

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गुड़ में भरी मिठास है, तिल में होता स्नेह।

खाकर मीठा बोलिए, बना रहेगा नेह।३।

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चारों ओर भरा हुआ, लोगों में उल्लास।

सुधरेगा परिवेश अब, सबको यह विश्वास।४।

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सरसों फूली खेत में, गेहूँ करते नृत्य।

अपने रीति-रिवाज से, हम सब करते कृत्य।५।

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बेटी रत्न अमोल है, कुदरत का उपहार।

बेटा-बेटी में करो, समता का व्यवहार।६।

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दो पहियों के बिन नहीं, गाड़ी का आधार।

नर का नारी के बिना, सूना है संसार।७।


बुधवार, 12 जनवरी 2022

गीत "गाओ फिर से नया तराना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गुजर गया है साल पुराना।
गाओ फिर से नया तराना।।
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सब कुछ तो पहले जैसा है,
लक्ष्य आज भी तो पैसा है,
सिर्फ कलेण्डर ही तो बदला,
वही ठौर है, वही ठिकाना।
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नित्य नये अनुभव होते हैं,
कुछ हँसते हैं, कुछ रोते हैं,
जीवन तो बस एक सफर है,
सबको पड़ता आना-जाना।
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पीना पड़ा यहाँ गरल है,
शंकर बनना नहीं सरल है,
कैसे महादेव बन जायें?
मुश्किल गंगा धार बहाना।
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आपाधापी, भाग-दौड़ है,
गुणा-भाग है और जोड़ है,
इक आता है, इक जाता है,
जग है एक मुसाफिरखाना।
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लोग मील के पत्थर जैसे,
अपनी मंजिल पायें कैसे?
औरों को पथ बतलाते हैं,
ये क्या जानें कदम बढ़ाना।
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मंगलवार, 11 जनवरी 2022

दोहे, जन्म दिवस पर विशेष "सन्त विवेकानन्द" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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ऋषियों का आवागमन, जहाँ न होता बन्द।

मेरे भारत देश में, हुए विवेकानन्द।।

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रामकृष्ण गुरुदेव के, शिष्य विवेकानन्द।

हुए अवतरित भूमि पर, बनकर करुणाकन्द।।

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जिनके धर्म प्रचार का, अमरीका था केन्द्र।

धुरी सनातन धर्म की, अपने दत्त नरेन्द्र।।

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दिव्य शक्ति के पुंज थे, थे सुभाव के शान्त।

दिया बता सब जगत को, क्या होता वेदान्त।।

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हिन्दी-हिन्दुस्थान का, रखा साथ परिवेश।

वैदिक दर्शन का दिया, दुनिया को सन्देश।।

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जाकर देश-विदेश में, बाँटा सबको ज्ञान।

भारत माता का बढ़ा, युवा सन्त से मान।।

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दूर किये परिवेश से, भ्रम के झंझावात।

है अब बारह जनवरी, युवा दिवस विख्यात।।

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सोमवार, 10 जनवरी 2022

दोहे "आज विश्व हिन्दी दिवस, मना रहा संसार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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दो हजार छः से मिला, हिन्दी को उपहार।
आज विश्व हिन्दी दिवस, मना रहा संसार।।
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हिन्दी है सबसे सरल, मान गया संसार।
वैज्ञानिकता से भरा, हिन्दी का भण्डार।।
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दुनिया में हिन्दीदिवस, भारत की है शान।
सारे जग में बन गयी, हिन्दी की पहचान।।
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चारों तरफ मची हुई, अब हिन्दी की धूम।
भारतवासी शान से, रहे खुशी में झूम।।
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युगों-युगों से चल रहे, काल-खण्ड औ’ कल्प।
देवनागरी का नहीं, दूजा बना विकल्प।।
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गद्य-पद्य से युक्त है, हिन्दी का साहित्य।
भाषा के परिवेश में, भरा हुआ लालित्य।।
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अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज।
अपनी भाषा में करे, जब हम अपने काज।।
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हिन्दी के अस्तित्व को, जग करता मंजूर।
भारतवासी जा रहे, लेकिन इससे दूर।।
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जैसा लिक्खा जायगा, वैसा बोला जाय।
भाषाओं में दूसरी, यह गुण नजर न आय।।
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अँगरेजी का मित्रवर, छोड़ो अब व्यामोह।
अपनी भाषा के लिए, करो न ऊहा-पोह।।
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गीत "हर रोज रंग अपना, गुलशन बदल रहा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

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हर रोज रंग अपना, गुलशन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।
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सूरज नियम से उगता,
चन्दा नियम से आता।
कल-कल निनाद करता,
झरना ग़ज़ल सुनाता।
पतझड़ के बाद अपना, उपवन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।
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उड़ उड़के आ रहे हैं,
पंछी खुले गगन में।
परदेशियों ने डेरा,
डाला हुआ चमन में।
आसन वही पुराना, शासन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।
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महफिल में आ गये हैं,
नर्तक नये-नवेले।
बेजान हैं तराने,
शब्दों के हैं झमेले।
हैरत में है ज़माना, दामन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।
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