"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

समर्थक

शनिवार, 28 मार्च 2020

गीत "मानवता से प्यार किया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
सेवा का व्रत धार लिया है।
मानवता से प्यार किया है।। 
--
रंग बहुत थे ढंग बहुत थे,
कभी न उल्टा पथ अपनाया,
जिसको अपना मीत बनाया,
उसका पूरा साथ निभाया,
हमने सूई-धागा लेकर,
बैरी का भी वक्ष सिया है।
मानवता से प्यार किया है।। 
--
झंझावातों के दलदल में,
कभी किसी का हाथ न छोड़ा,
शरणागत को गले लगाया,
मर्यादा का साथ न तोड़ा,
अमृत रहे बाँटते जग को,
हमने केवल गरल पिया है।
मानवता से प्यार किया है।।
--
अपनी झोली में से हम तो,
सच्चे मोती बाँट रहे है,
बैर-भाव की खाई को हम,
प्रेम-प्रीत से पाट रहे हैं,
सन्तो ने जो सिखलाया है,
जग को वो उपहार दिया है।
मानवता से प्यार किया है।।
--

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

दोहे "कोरोना के रोग से, जूझ रहा है देश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
कोरोना के रोग से, जूझ रहा है देश।
अगर सुरक्षित आप हैं, बचा रहेगा देश।।
--
आवश्यकता से अधिक. करना नहीं निवेश।
हम सबके सहयोग से, सुधरेगा परिवेश।।
--
कमी नहीं कुछ देश में, सुलभ सभी हैं चीज।
मगर नहीं लाँघो अभी, निज घर की दहलीज।।
--
विपदा के इस काल में, शासन है तैयार।
हर घर पर सामान को, भेजेगी सरकार।।
--
साबुन से धो लीजिए, हर घण्टे निज हाथ।
तुलसी और गिलोय का, पीना प्रतिदिन क्वाथ।।
--
साथ-साथ मिलकर नहीं, करना क्रिया कलाप।
कोरोना के दैत्य को, हरा दीजिए आप।।
--
नकारात्मक सोच से, नहीं चलेगा काम।
अफवाहों को दीजिए, पूरा आज विराम।।
--
अपने भारत में रहें, सारे लोग निरोग।
हर हालत में कीजिए, शासन का सहयोग।।
-- 

गुरुवार, 26 मार्च 2020

गीत "नियमों को अपनाओगे कब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


--
अपना धर्म निभाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब
--
करना है उपकार वतन पर
संयम रखना अपने मन पर
कभी मैल मत रखना तन पर
संकट दूर भगाओगे कब

नियमों को अपनाओगे कब
--
अभिनव कोई गीत बनाओ,
सारी दुनिया को समझाओ
स्नेह-सुधा की धार बहाओ
वसुधा को सरसाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब
--
सुस्ती-आलस दूर भगा दो
देशप्रेम की अलख जगा दो
श्रम करने की ललक लगा दो
नवअंकुर उपजाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब
--
देवताओं के परिवारों से
ऊबड़-खाबड़ गलियारों से
पर्वत के शीतल धारों से
नूतन गंगा लाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब
--
सही दिशा दुनिया को देना
अपनी कलम न रुकने देना
भाल न अपना झुकने देना
सच्चे कवि कहलाओगे कब
जग को राह दिखाओगे तब
--

बुधवार, 25 मार्च 2020

दोहे "समय बड़ा विकराल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
जीवन संकट में पड़ा, समय बड़ा विकराल।
घूम रहा है जगत में, कोरोना बन काल।।
--
आवाजाही बन्द है, सड़कें हैं सुनसान।
कोरोना का हो गया, लोगों को अनुमान।।
--
हालत की गम्भीरता, समझ गये हैं लोग।
जनता अब करने लगी, शासन का सहयोग।।
--
घर में बैठे कीजिए, पाठन-पठन विचार।
मोदी के आह्वान पर, बन्द हुए बाजार।।
--
सामूहिक सहयोग से, रोग जायगा हार।
भारत की इस पहल को, मान गया संसार।।
--
धरने के अस्तित्व का, अब थम गया उबाल।
आज बाग शाहीन का, मिट ही गया बवाल।। 
--
साबुन से धो हाथ को, मुख पर रखो रुमाल।
हटा दीजिए ताल से, अब सारे शैवाल।।
-- 

मंगलवार, 24 मार्च 2020

दोहे "नवसम्वतसर-२०७७" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
मर्यादा के साथ में, खूब मनाओ हर्ष।
स्वच्छ रहे परिवेश तो, होगा मंगल वर्ष।।
--
नवसम्वतसर में हुए, चौपट कारोबार।
कोरोना के रोग से, जूझ रहा संसार।।
--
माता के नवरात्र में, करो नियम से काम।
घर को मन्दिर समझकर, जपो ओम का नाम।।
--
बाधाएँ सब दूर हों, करो न मेल मिलाप।
अपने घर में बैठकर, करना पूजा-जाप।।
--
रोग-शोक सब दूर हों, इस पर करें विचार।
पालन कर कानून का, सबके हरो विकार।।
--
जग को राह दिखा रहा, अपना भारतवर्ष।
कोरोना के रोग का, होगा अब अपकर्ष।।
--
तन मन का शोधन करो, भली करेंगे नाथ।
साबुन सेधो लीजिए, बार-बार निज हाथ।।
--

सोमवार, 23 मार्च 2020

दोहे "जनहित के कानून को, कभी न करना भंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


--
कोरोना को देख कर, बना रहे जो बात।
वो ही देश-समाज को, पहुँचाते आघात।।
--
अच्छे कामों का जहाँ, होने लगे विरोध।
आता देश समाज को, ऐसे दल पर क्रोध।।
--
मुखिया जिस घर में नहीं, होता है दमदार।
समझो उस परिवार का, निश्चित बण्टाधार।। 
--
मुखिया ने मझधार में, छोड़ी जब पतवार।
तब से ही वो समर में, झेल रहा है हार।।
--
देशभक्ति के मत करो, रंग आज बदरंग।
जनहित के कानून को, कभी न करना भंग।।
--
अपने स्वारथ के लिए, करो न ओछे काम। 
रात हमेशा भोर का, लाती है पैगाम।।
--
करो बाग शाहीन में, धरना अब तो बन्द।
अपने ही घर में रहो, होकर सब सानन्द।।
--

शनिवार, 21 मार्च 2020

दोहे "घोर संक्रमित काल में, मुँह पर ढको नकाब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--
कोरोना से मच रहा, जग में हाहाकार।
एतिहात सबसे बड़ा, ऐसे में उपचार।।
--
सेनीटाइज से करो, स्वच्छ सभी घर-बार।
बन्द कीजिए कुछ दिवस, अपने कारोबार।।
--
नहीं आ सका है अभी, कोरोना का तोड़।
अपने घर में ही रहो, भीड़-भाड़ को छोड़।।
--
खाना अब तो छोड़ दो, मछली गोश्त-कबाब।
घर से निकलो जब कभी, मुँह पर ढको नकाब।।
--
कोरोना से देश में, पसरा है अवसाद।
भूल जाइए आज सब, धरने और फसाद।।
--
जन-जीवन से खेलते, अभिमानी मुल्लाह।
हुआ बाग शाहीन है, कितना लापरवाह।।
--
घोर संक्रमित काल में, मत कर टाल-मटोल।
बार-बार मिलता नहीं, ये जीवन अनमोल। 
--

ग़ज़ल "साँस की सरगम सुनाता जा रहा हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


--
जिन्दगी के गीत गाता जा रहा हूँ
साँस की सरगम सुनाता जा रहा हूँ
--
पाँव बोझिल हैं थकी है पीठ भी
बोझ जीवन का उठाता जा रहा हूँ
--
मिल गया जो भी नजराना मुझे
शान से उसको लुटाता जा रहा हूँ
--
उम्र अब कितनी बची है क्या पता
घोंसला फिर भी बनाता जा रहा हूँ
--
कुछ पुराने साज दामन में समेटे
सादगी से सुर सजाता जा रहा हूँ
--
है अमावस ज्ञान का पसरा अँधेरा
आस का दीपक जलाता जा रहा हूँ
--
मैं उजड़ते बाग का बूढ़ा शजर हूँ
फर्ज को अपने निभाता जा रहा हूँ
--
उस बुलन्दी के बचे जो भी निशां
खैर मैं उनकी मनाता जा रहा हूँ
--
जिन्दगी के जलजलों की उलझनों में
'रूप' की शतरँज बिछाता जा रहा हूँ
--

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

दोहे "विश्व गौरैया दिवस" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

--
खेत और खलिहान में, दूषित हुआ अनाज।
लुप्तप्राय सी हो गयी, गौरैया है आज।।
--
शहरी जीवन में नहीं, रहा आज आनन्द।
गौरैया को है नहीं, वातावरण पसन्द।।
--
मौसम मेरे देश के, हुए आज विकराल।
गौरैया का गाँव में, पड़ने लगा अकाल।।
--
लगे डालने खेत में, खाद विषैली लोग।
इसीलिए फैले हुए, भाँति-भाँति का रोग।।
--
जहरीला खाना हुआ, जहरीला है नीर।
देश और परिवेश की, हालत है गम्भीर।।
--
पेड़ काटता जा रहा, धरती का इंसान।
इसीलिए आने लगे, चक्रवात-तूफान।।
--
नंगे होते जा रहे, हरे-भरे अब शैल।
पावन गंगा नीर में, बहता है अब मैल।।
--
आबादी बढ़ने लगी, सीमित हुई जमीन।
रोजगार कैसे मिलें, करती काम मशीन।।
--

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails