बादल
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धरती का आँचल धोते हैं।
बादल तो बादल होते हैं।।
नभ में हमें दिखाई देते,
निर्मल जल का सिन्धु समेटे,
लेकिन धुआँ-धुआँ होते हैं।
बादल तो बादल होते हैं।।
बल के साथ गरजते रहते,
दल के साथ लरजते रहते,
यो तो यहाँ-वहाँ होते हैं।
बादल तो बादल होते हैं।।
चन्द्र-सूर्य का तेज घटाते,
इनसे तारागण ढक जाते,
बादल जहाँ-जहाँ होते हैं।
बादल तो बादल होते हैं।।
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017
बालगीत "इसे मैंने पचास साल पहले लिखा था" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 29 अप्रैल 2012
"बेमौसम का गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों! आज प्रस्तुत है बेमौसम का गीत ताप धरा का कम करने को, नभ में काले बादल छाए। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। मनभावन मौसम हो आया, लू-गर्मी का हुआ सफाया, ठण्डी-ठण्डी हवा चली है, धान खेत में हैं लहराये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। उमड़-घुमड़कर गरज रहे हैं, झूम-झूमकर लरज रहे हैं, लाल-लाल लीची फूली हैं, आम रसीले मन को भाये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। आँगन-चौबारों में पानी, नदियों में आ गई रवानी, मेढक टर्र-टर्र टर्राते, हरे सिंघाड़े बिकने आये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। सात रंग से सजा रूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, बच्चे गलियों के गड्ढों में कागज वाली नाव चलायें। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। |
मंगलवार, 3 जनवरी 2012
"आकाश में बादल घने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कभी कुहरा, कभी सूरज, कभी आकाश में बादल घने हैं। दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।। आसमां पर चल रहे हैं, पाँव के नीचे धरा है, कल्पना में पल रहे हैं, सामने भोजन धरा है, पा लिया सब कुछ मगर, फिर भी बने हम अनमने हैं। दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।। आयेंगे तो जायेंगे भी, ज़िन्दगी में खायेंगें भी, हाट मे सब कुछ सजा है, लायेंगे तो पायेंगे भी, धार निर्मल सामने है, किन्तु हम मल में सने हैं। दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।। देख कर करतूत अपनी, चाँद-सूरज हँस रहे हैं, आदमी को बस्तियों में, लोभ-लालच डस रहे हैं, काल की गोदी में, बैठे ही हुए सारे चने हैं। दुःख और सुख भोगने को, जीव के तन-मन बने हैं।। |
सोमवार, 11 जुलाई 2011
"रिम-झिम करता सावन आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शीतल पवन सभी को भाया। रिम-झिम करता सावन आया।। उगे गगन में गहरे बादल, भरा हुआ जिनमें निर्मल जल, इन्द्रधनुष ने रूप दिखाया। श्वेत-श्याम घन बहुत निराले, आसमान पर डेरा डाले, कौआ काँव-काँव चिल्लाया। जोर-शोर से बिजली कड़की, सहम उठे हैं लड़का-लड़की, देख चमक सूरज शर्माया। खेत धान से धानी-धानी, घर मे पानी बाहर पानी, मेघों ने पानी बरसाया। लहरों का स्वरूप है चंगा, मचल रहीं हैं यमुना-गंगा, पेड़ों ने नवजीवन पाया। झूले पड़े हुए घर-घर में, चहल-पहल है प्रांत-नगर में, झूल रही हैं ललिता-माया। मोहन ने महफिल है जोड़ी, मजा दे रही चाय-पकौड़ी, मानसून ने मन भरमाया। |
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