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गुरुवार, 8 नवंबर 2012
रविवार, 2 मई 2010
"दुनिया:दो शेर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
सफर करते हैं तो लगता है, दुनिया है बहुत फैली! मगर जब ग्लोब को देखा तो, दुनिया बहुत छोटी है! बढ़ा जबसे चलन, मोबाइलों का देश में मेरे! सिमटकर आ गया, संसार सबकी जेब में अब तो! |
रविवार, 12 अप्रैल 2009
"गुरूसहाय भटनागर "बदनाम" का एक शेर" प्रस्तुति-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’
आ के ख्वाबों में मेरे दिल को दुखा जाती है,
दूर से हँस-हँस के मेरी नींद उड़ा जाती है।
मैं रात भर तेरी यादों में खोया रहता हॅू,
दिन के उजाले में दिल का दर्द बढ़ा जाती है।
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