-- छल-बल की भरमार है, नहीं इरादे नेक। दूषित गंगानीर से, देवों का अभिषेक।। -- नवयुग में लगता मुझे, बदला हुआ समाज। सागर को धमका रहीं, मिलकर बूँदें आज।। चिड़िया तिनके जोड़कर, कहाँ बनाये नीड़। घटते जाते भूमि पर, पीपल-बरगद-चीड़।। हरियाली के बीच में, खिला चमन में फूल। आँखों को सुख दे रहा, मौसम के अनुकूल।। जीवन के इस समर में, विजय नहीं आसान। महज दिखाने के लिए, होठों पर मुस्कान।। गुणा-भाग भी आजकल, दुनिया रही मरोड़। दूषित वातावरण में, ज्ञान रहा दम तोड़।। पहले जैसा कुछ नहीं, बदल गया परिवेश। शब्दों से ही चल रहा, अपना प्यारा देश।। |
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