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सत्ता पाने के लिए, छत्रप
आये पास।।
छत्रप आये पास मिलाकर सुर
में सुर को।
नये खिलाड़ी को सिखलाते
सारे गुर वो।।
कह मयंक कविराय, सुधारी
बाजी बिगड़ी।
देखें कब तक रहे साथ, दल-बल
की तिगड़ी।।
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कभी जुदायी हो जहाँ, कभी
जहाँ हो मेल।
होता है शह-मात का,
राजनीति का खेल।।
राजनीति का खेल खेलते
निपट अनाड़ी।
जो जीता वो ही कहलाता
बड़ा खिलाड़ी।।
कह मयंक कविराय सियासत है
दुखदायी।
कभी मिलन की घड़ी और है कभी
जुदायी।।
--
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गुरुवार, 28 नवंबर 2019
कुण्डलियाँ "तिगड़ी की खिचड़ी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 1 फ़रवरी 2015
"दो कुण्डलिया-नहीं घटे क्यों दाम?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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-१-
पूरी दुनिया में
हुआ, सस्ता तेल तमाम।
लेकिन उस अनुपात
में, नहीं घटे क्यों दाम।।
नहीं घटे क्यों
दाम, मुनाफा कहाँ जा रहा।
बतलाओ सरकार,
दलाली कौन खा रहा।।
कह मयंक कविराय,
पूछना है मजबूरी।
कौन करेगा आस,
यहाँ जनता की पूरी।।
-२-
सस्ता पहले से हुआ,
आज वतन में तेल।
फिर भी भाड़ा बढ़
रहा, कैसा है यह खेल।।
कैसा है यह खेल, कहाँ
खोया अनुशासन।
महँगाई से मुक्त,
यहाँ कब होगा राशन।।
कह मयंक कविराय, हो
गयी हालत खस्ता।
मँहगी है अब मौत,
और जीवन है सस्ता।।
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बुधवार, 11 दिसंबर 2013
"कुण्डलिया-बिल्ली और बिलौटना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक')
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बिल्ली और बिलौटना, सदमें में हैं आज।
उज़ड़ गयी है अंजुमन. उतर गया है ताज।।
उतर गया है ताज, खत्म हो गयी कहानी।
विफल हो गयी चाल, देखकर है खिसियानी।।
कह मयंक कविराय, उड़ाते है सब खिल्ली।
नौ सौ चूहे खाय, आज सहमी है बिल्ली।।
--
जनता कब तक झेलती, महँगाई की मार।
इस ज़ालिम सरकार को, कैसे करती प्यार।।
कैसे करती प्यार, दुबारा क्योंकर चुनती।
चुप हो करके राग, पुराना कब तक सुनती।।
कह मयंक कविराय, राज जनमत से बनता।
महँगाई को सहती, आखिर कब तक जनता।।
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बुधवार, 8 अगस्त 2012
"विचार साफ-सुथरे हों" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
(1) बेटे-बेटी में करो, समता का व्यवहार। बेटी ही संसार की, होती सिरजनहार।। होती सिरजनहार, स्रजन को सदा सँवारा। जिसने ममता को उर में, जीवन भर धारा।। कह 'मयंक' दामन में, कँटक रही समेटे। बेटी माता बनकर, जनती बेटी-बेटे।। (2) हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर। उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।। सबको करें विभोर, प्रदूषण हर लेते हैं। कंकड़-पत्थर खाकर, मीठे फल देते हैं।। कह 'मयंक' आचरण, विचार साफ-सुथरे हों। उपवन के सारे, पादप नित हरे-भरे हों।। |
सोमवार, 7 मार्च 2011
" कुण्डलिया छन्द की शुरूआत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मित्रों! आज से कुण्डलिया छन्द की शुरूआत कर रहा हूँ! देखिए मेरे दो दोहों पर रची हुई ये दो कुण्डलियाँ! (1) ज्ञान बाँटने से कोई, होता नहीं विपन्न। विद्या धन का दानकर, बन जाओ सम्पन्न।। बन जाओ सम्पन्न, करो कल्याण सभी का। पावन-पावन कर्म, हमेशा लगता नीका।। अब 'मयंक' चल पड़ा, झाड़-झंकाड़ काटने। निकला हूँ निष्काम, छन्द का ज्ञान बाँटने।। (2) भूसी-चावल सँग रहें, तभी बढ़े परिवार। हुए धान से जब अलग, बाँट खाय संसार।। बाँट खाय संसार, निभाओ साथ हमेशा। करो सरल व्यवहार, दूध-मक्खन के जैसा।। कह 'मयंक' कविराय, बहाओ धारा निर्मल। रहो संग में ऐसे, जैसे भूसी-चावल।। |
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