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रविवार, 31 मार्च 2019

दोहे "कैसे मिलें रसाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कंगाली में बीतते, जिसके सारे पर्व।
वो किसान कैसे करे, त्योहारों पर गर्व।।

बौर छा गया आम पर, कोयल गाये गान।
फसल काटने खेत में, अब चल पड़े किसान।।

फसल काटकर खेत से, गया बेचने अन्न।
लागत मूल्य मिला नहीं, है इसलिए विपन्न।।

कुदरत सबको बाँटती, नित्य नये उपहार।
नैसर्गिक इस देन को, कर लो अंगीकार।।

जगतनियन्ता का करो, सच्चे मन से ध्यान।
बिना वन्दना के नहीं, मिलता है वरदान।।

सबके लिए खुले हुए, स्वर्ग-नर्क के द्वार।
कर्मयोनि मिलती नहीं, जग में बारम्बार।।

बोया पेड़ बबूल का, कैसे मिलें रसाल।
होता है फिर किसलिए, इतना आज मलाल।।


शनिवार, 30 मार्च 2019

आलेख "निष्पक्ष चुनाव के लिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

        आज सारी दुनिया भारत को सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के रूप मे जानती है। परन्तु इस लोकतन्त्र का घिनौना चेहरा अब लोगों के सामने आ चुका है।
       क्या आपने किसी निर्धन और ईमानदार व्यक्ति तो चुनाव लड़ते हुए देखा है?
       वह तो केवल मत देने के लिए ही पैदा हुआ है। यदि कोई ईमानदार और गरीब आदमी भूले भटके ही सही चुनाव में खड़ा हो जाता है, तो क्या वह चुनाव जीत कर संसद के गलियारों तक पहुँचा है।
        इसका उत्तर बस एक ही है ‘नही’ ।
       आज केवल धनाढ्य व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। बस यही सत्य है । नेताओं के पुत्र-पुत्रियाँ, फिल्मी अभिनेता, या बे-ईमान और काला-धन कमाने वाले ही चुनावी समर में दिखाई देते हैं। इसीलिए संसद का चेहरा नित्य प्रति बिगड़ता जा रहा है।
     लोकतन्त्र, लोकतन्त्र कम और राजतन्त्र या भ्रष्टतन्त्र अधिक दिखाई देता है।
       क्या यह कानून बदला नही जा सकता?
     सम्भव तो हैं पर इसे बदलेगा कौन? राजतन्त्र की तरह नेताओं कुर्सी नशीन के पुत्र या भ्रष्ट नेतागण। सारी आशायें दम तोड़ती नजर आती हैं। दूध की रखवाली बिल्लों के हाथ में हो तो ये झूठी आशायें पालना ही बेकार है। 
     आज चारों ओर से आवाज उठ रही हैं कि 100 प्रतिशत मतदान करो। लेकिन ये मत तो राजनेताओं, उनके वंशजों तथा भ्रष्टाचारियों को ही तो जायेंगे।
     कहने को तो चुनाव आयोग बड़े-बड़े अंकुश लगाने के बड़े-बड़े दावे करता है। परन्तु धनाढ्यों को मनमाना धन खर्च करने की छूट मिली हुई है।
      चुनाव आयोग को चाहिए कि वह हर एक प्रत्याशी से एक निश्चित धन-राशि जमा करा कर, चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथ में ले। व्यक्तिगत रूप से न कोई झण्डा न बैनर न पोस्टर न अपील का नियम चुनाव आयोग लागू करे।
        आखिर चुनाव कराना सरकार का काम है। अतः लोकतन्त्र को पुनः सच्चे लोकतन्त्र के रूप में स्थापित के लिए प्रयास सरकार को ही करने चाहियें। सबका समान प्रचार कराने की जिम्मेदारी सरकार को निभानी चाहिए। प्रत्याशी का काम बस नामांकन तक ही सीमित होना चाहिए।
        तभी सच्चा लोकतन्त्र इस देश में प्रतिस्थापित हो सकता है।

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

गीत "चंचल सुमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मोम कभी हो जाता है, तो पत्थर भी बन जाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, 'रूप' बदलता जाता है।।

कभी किसी की नहीं मानता,
प्रतिबन्धों को नहीं जानता।
भरता है बिन पंख उड़ानें,
जगह-जगह की ख़ाक छानता।
वही काम करता है यह, जो इसके मन को भाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, 'रूप' बदलता जाता है।।

अच्छे लगते अभिनव नाते,
करता प्रेम-प्रीत की बातें।
झोली होती कभी न खाली
सबके लिए भरी सौगातें।
तन को रखता सदा सुवासित, चंचल सुमन कहाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, 'रूप' बदलता जाता है।।

पौध सींचता सम्बन्धों की,
रीत निभाता अनुबन्धों की।
मीठे पानी के सागर को,
नहीं जरूरत तटबन्धों की।
बाँध तोड़ देता है सारे, जब रसधार बहाता है।
दिल तो है मतवाला गिरगिट, 'रूप' बदलता जाता है।। 

गुरुवार, 28 मार्च 2019

दोहे "बुड्ढों की औकात" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कभी बड़े होते दिवस, कभी बड़ी हैं रात।
राजनीति में है नहीं, बुड्ढों की औकात।।

जिसने बनकर सारथी, छेड़ा था अभियान।
उसके पुण्य-प्रताप से, बढ़ा कमल का मान।।

अडवानी-जोशी हुए, आज बहुत मजबूर।
अब तो सत्ता से हुए, खंडूरी भी दूर।।

मनमानी करने लगे, सत्ताधारी लोग।
छल-प्रपंच से राजसी, ठाठ रहे हैं भोग।।

आज नियोजितरूप से, पनप रहा षडयन्त्र।
सम्मोहन वक्तव्य का, झेल रहा जनतन्त्र।।

बुधवार, 27 मार्च 2019

दोहे "अभिनय करते लोग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-मंच है जिन्दगी, अभिनय करते लोग।
नाटक के इस खेल में, है संयोग-वियोग।।

विद्यालय में पढ़ रहे, सभी तरह के छात्र।
विद्या के होते नहीं, अधिकारी सब पात्र।।

आपाधापी हर जगह, सभी जगह सरपञ्च।।
रंग-मंच के क्षेत्र में, भी है खूब प्रपञ्च।।

रंग-मंच भी बन गया, जीवन का जंजाल।
भोली चिड़ियों के लिए, जहाँ बिछे हैं जाल।।

रंग-मंच का आजकल, मिटने लगा रिवाज।
मोबाइल से जाल पर, उलझा हुआ समाज।।

कहीं नहीं अब तो रहे, सुथरे-सज्जित मञ्च।
सभी जगह बैठे हुए, गिद्ध बने सरपञ्च।।

नहीं रहे अब गीत वो, नहीं रहा संगीत।
रंग-मंच के दिवस की, मना रहे हम रीत।।
  

मंगलवार, 26 मार्च 2019

ग़ज़ल "ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे
फूल बनकर सदा खिलखिलाते रहे

हमको राहे-वफा में ज़फाएँ मिली
ज़िन्दग़ी भर उन्हें आज़माते रहे

दिल्लगी थी हक़ीक़त में दिल की लगी
बर्क़ पर नाम उनका सजाते रहे

जब भी बोझिल हुई चश्म थी नींद से
ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे

पास आते नहीं, दूर जाते नहीं
अपनी औकात हमको बताते रहे

हम तो ज़ालिम मुहब्बत के दस्तूर को
नेक-नीयत से पल-पल निभाते रहे

जब भी देखा सितारों को आकाश में
वो हसीं 'रूप' अपना दिखाते रहे

सोमवार, 25 मार्च 2019

आलेख "माँ पूर्णागिरि का मेला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जय हो माँ पूर्णागिरि माता की
होली के समाप्त होते ही माँ पूर्णागिरि का मेला प्रारम्भ हो जाता है और भक्तों की जय-जयकार सुनाई देने लगती है! 
मेरा घर हाई-वे के किनारे ही है। अतः साईकिलों पर सवार दर्शनार्थी और बसों से आने वाले श्रद्धालू अक्सर यहीं पर विश्राम कर लेते हैं।
यदि आपका कभी माँ पूर्णागिरि के दर्शन करने का मन हो तो सबसे पहले आप खटीमा से 7 किमी दूर पूर्णागिरि मार्ग पर चकरपुर में बनखण्डी महादेव के प्राचीन मन्दिर भोलेबाबा के दर्शन अवश्य करें।
मान्यता है कि शिवरात्रि पर रात में भोले बाबा के साधारण से दिखने वाले पत्थर का रंग सात बार बदलता है।
इसके बाद आप रास्ते में पढ़ने वाले बनबसा कस्बे में पहुँचें तो भारत-नेपाल की सीमा भी देख लें। 
यहाँ शारदा न नदी पर बना एक विशाल बैराज है। जिसके पार करने पर आप नेपाल की सीमा में प्रविष्ट हो जाएँगे।
पुल के चौंतीस पिलर्स (गेट) हैं उनको पार करने के उपरान्त आपको भारत की आब्रजन और सीमा चौकी पर भी बताना होगा कि हम नेपाल घूमने के लिए जा रहे हैं।
और अगर समय हो तो नेपाल के शहर महेन्द्रनगर की विदेश यात्रा भी कर लें।
बनबसा के आगे पूर्णागिरि जाने के लिए आपको अन्तिम मैदानी शहर टनकपुर आना होगा। 
रास्ते में आपको दिव्य आद्या शक्तिपीठ का भव्य मन्दिर भी दिखाई देगा। आप यहाँ पर भी अपनी वन्दना प्रार्थना करना न भूलें।
यहाँ से 4 किमी दूर जाकर पहाड़ी रास्ते की यात्रा आपको पैदल ही करनी होगी मगर आजकल जीप भी चलने लगीं है इस मार्ग पर। जो आपको भैरव मन्दिर पर छेड़ देंगी। भैरव मन्दिर के बाद तो  कोई सवारी मिलने का सवाल ही नहीं उठता हैा। अपना भार स्वयं उठाते हुए यहाँ से आप माता के दरबार तक 3 किमी तक पैदल चलेंगे।
1500 मीटर चलने के बाद आपको टुन्यास नामक आखरी पड़ाव मिलेगा।
 यहाँ पर आप अपने बाल-गोपाल का मुण्डन संस्कार भी करा सकते हैं।
उसके बाद आपको नागाबाड़ी में पहाड़ी रास्ते के दोनों ओर बहुत से नागा साधुओं के दर्शन होंगे।
    थोडी दूर और चलने के बाद माता का पक्का पहाड़ आ जाएगा और सीढ़ियों से चलकर आपको दरबार तक जाना पड़ेगा।
    और यह है माता के मन्दिर का पिछला भाग। 
इसके साथ ही सीढ़ियाँ माता के मन्दिर की ओर मुड़ती हैं और माता का दरबार आपको दिखाई दे जाएगा।
    यदि भीड़ कम हुई तो शीघ्र ही माता के दर्शनों का लाभ भी मिल जाएगा।
यही वो छोटा सा मन्दिर है जिसके दर्शनों के लिए आप इतना कष्ट उठा कर यहाँ तक आयेंगे। मगर इसकी मान्यताएँ बहुत बड़ी हैं।
नीचे है माता के दरबार से लिया गया पर्वतों का मनोहारी चित्र। 
जिसमें नीचे शारदा नदी दिखाई दे रही है।
आप जिस रास्ते से माता के दर्शन करने के लिए आये थे अब उस रास्ते से वापिस नहीं जा पाएँगे क्योंकि मन्दिर से नीचे उतरने के लिए अलग से सीढ़िया बनाई गईं हैं।
वापस लौटते हुए आप झूठे के चढ़ाए हुए मन्दिर के भी दर्शन कर लें। 
यहाँ आपको यह भोला-भाला नन्दी और कुष्ट रोगियों के परिवार खाना पकाते खाते हुए भी नजर आयेंगे।
आपकी श्रद्धा हो तो आप दान-पुण्य भी कर सकते हैं।
माता पूर्णागिरि आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करें।

रविवार, 24 मार्च 2019

दोहे "कुछ भी नहीं सफेद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

राज-काज में प्रजा को, रक्खा जाता दूर।
पाँच साल जनतन्त्र में, जन रहता मजबूर।।

विजय-पराजय का कब मिले, नहीं जानते लोग।
आ आता अच्छा समय, जब अच्छा हो योग।।

समीकरण जब बिगड़ते, होता जोड़-घटाव।
धन के बल पर जीतते, अब तो लोग चुनाव।।

योगदान की है नहीं, अब दल में औकात।
जब पैसा हो जेब में, तभी बना लो बात।।

काजल की है कोठरी, कुछ भी नहीं सफेद।
उगता है मतभेद में, सबके मन में भेद।।

शनिवार, 23 मार्च 2019

दोहे "लोग खोजते मंच" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आत्मप्रकाशन के लिए, लोग खोजते मंच।
भाँति-भाँति के रच रहे, ढोंगी यहाँ प्रपंच।।
--
खान-पान दूषित हुआ, दूषित हुए विचार।
कूड़े-कचरे से हुई, दूषित जल की धार।।
--
संस्कार दम तोड़ता, मन में भरे विकार।
कदम-कदम पर देश में, फैला भ्रष्टाचार।।
--
नहीं रही है आजकल, प्रीत और मनुहार।
राजनीति में दम्भ से, खिसक रहा आधार।।
--
चाहे कोई भी रहे, दल-बल का सरदार।
राजनीति में हो रही, चमचों की भरमार।।
--
मनचाही मिलती रकम, हाट हुए गुलजार।
जनसेवक सब जगह हैं, बिकने को तैयार।।
--
नामदार सब हो गये, अब तो चौकीदार।
राजनीति में आ गये, अब शातिर मक्कार।।

शुक्रवार, 22 मार्च 2019

दोहे विश्व जल दिवस "पानी को लाचार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सीमित है संसार में, पानी का भण्डार।
व्यर्थ न नीर बहाइए, जल जीवन आधार।।
किया किसी ने भी अगर, पानी को बेकार।
हो जाओगे एक दिन, पानी को लाचार।।
ओस चाटने से बुझे, नहीं किसी की प्यास।
जीव-जन्तुओं के लिए, जल जीवन की आस।।

गन्धहीन-बिन रंग का, पानी का है अंग।
जिसके साथ मिलाइए, देता उसका रंग।।

जल अमोल है सम्पदा, मानव अब तो चेत।
निर्मल जल के पान से, सोना उगलें खेत।।

वृक्ष बचाते धरा को, देते सुखद समीर।
लहराते जब पेड़ हैं, घन बरसाते नीर।।

गुरुवार, 21 मार्च 2019

दोहे "होलक का शुभदान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

होली तो होली हुई, छोड़ गयी सन्देश।
भस्म बुराई हो गयी, बदल गया परिवेश।‍१।
--
पावन होली खेलकर, चले गये हैं ढंग।
रंगों के त्यौहार के, अजब-ग़ज़ब थे रंग।२।
-- 
जली होलिका आग में, बचा भक्त प्रहलाद।
जीवन में सबके रहे, प्यार भरा उन्माद।३।
 --
दहीबड़े-पापड़ सजे, खाया था मिष्ठान।
रंग-गुलाल लगा लिया, गाया होली गान।४।
-- 
मिला हुआ था भाँग में, अदरख-तुलसीपत्र।
बौराये से लोग थे, यत्र-तत्र-सर्वत्र।५।
--
देख खेत में धान्य को, हर्षित हुआ किसान।
होली में अर्पित किया, होलक का शुभदान।६।

दोहे "होली का उपहार"(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कितने अच्छे लग रहे, होली के ये रंग।
रंगों के त्यौहार में, नहीं मिलाना भंग।।
 
रंगों का अब आ गया, मनभावन त्यौहार।
रूठे सुजन मनाइए, करके यत्न हजार।।

होली के त्यौहार में, बाँटो सबको प्यार।
रंगों की बौछार से, निर्मल करो विकार।।

बच्चों-बूढ़ों के लिए, रहना सदा उदार।
रंग-अबीर-गुलाल है, होली का उपहार।।

हँसी-ठिठोली को करो, मर्यादा के संग।
जो लगवाये प्यार से, उसे लगाओ रंग।।

देख खेत में अन्न को, होता हर्ष अपार।
इसीलिए मधुमास में, आता ये त्यौहार।।

बुधवार, 20 मार्च 2019

दोहे "रंगों की बौछार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

-0-0-0-0-0-
होली में अच्छी लगे, रंगों की बौछार।
सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्यौहार।।

शीत विदा अब हो गया, चली बसन्त बयार।
प्यार बाँटने आ गया, होली का त्यौहार।।

पाना चाहो मान तो, करो शिष्ट व्यवहार।
सीख सिखाता है यही, होली का त्यौहार।।

रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।
भेद-भाव को मेटता, होली का त्यौहार।।

तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।
लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।।

भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।
देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।।

छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।
हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्यौहार।।

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