बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया। कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया। अंग शिथिल हैं, दुर्बल तन है, रसना बनी सबल है। आशाएँ और अभिलाषाएँ, बढ़ती जाती प्रति-पल हैं।। धीरज और विश्वास संजो कर, रखना अपने मन में। रंग-बिरंगे सुमन खिलेंगे, घर, आंगन, उपवन में।। यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है। नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।। मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना। वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।। देख-भालकर, सोच-समझकर, ही सारे निर्णय लेना। भावी पीढ़ी को उनका, सुखमय जीवन जीने देना।। |
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शनिवार, 2 जून 2012
"मेरी पुरानी डायरी से" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 24 जनवरी 2012
"अब बसन्त आयेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
उपवन मुस्कायेगा!! कुहासे की चादर, धरा पर बिछी हुई। नभ ने ढाँप ली है, अमल-धवल रुई।। दिवस हैं छोटे, रोशनी मऩ्द है। शीत की मार है, विद्यालय बन्द है।। जल रहे हैं अलाव, आँगन चौराहों पर। चहल-पहल कम है, पगदण्डी-राहों पर।। सूरज अदृश्य है, पड़ रहा पाला है।। पर्वत ने ओढ़ लिया, बर्फ का दुशाला है।। मन में एक आशा है, अब बसन्त आयेगा! खिल जायेंगे नव सुमन, उपवन मुस्कायेगा!! |
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