आखिर क्या बात है इस रचना में? 17 जून,2009 को यह रचना लिखी थी। मगर आज तक यह मेरी लोकप्रिय पोस्ट में नम्बर-1 पर चल रही है। आपके अवलोकनार्थ इसे पुनः प्रकाशित कर रहा हूँ। श्वेत-श्याम से नजर आ रहे मेघों के दल। आसमान में उमड़-घुमड़कर, छाये बादल।। कही छाँव है कहीं घूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, मनभावन रंग-रूप बदलता जाता पल-पल। आसमान में उमड़-घुमड़कर छाये बादल।। मम्मी भीगी , मुन्नी भीगी, दीदी जी की चुन्नी भीगी, मोटी बून्दें बरसाती, निर्मल-पावन जल। आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।। हरी-हरी उग गई घास है, धरती की बुझ गई प्यास है, नदियाँ-नाले नाद सुनाते जाते कल-कल। बिजली नभ में चमक रही है, अपनी धुन में दमक रही है, आसमान में उमड़-घुमड़ कर छाये बादल।। (चित्र गूगल छवियों से साभार) |
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शुक्रवार, 6 जुलाई 2012
"उमड़-घुमड़कर छाये बादल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 29 अप्रैल 2012
"बेमौसम का गीत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों! आज प्रस्तुत है बेमौसम का गीत ताप धरा का कम करने को, नभ में काले बादल छाए। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। मनभावन मौसम हो आया, लू-गर्मी का हुआ सफाया, ठण्डी-ठण्डी हवा चली है, धान खेत में हैं लहराये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। उमड़-घुमड़कर गरज रहे हैं, झूम-झूमकर लरज रहे हैं, लाल-लाल लीची फूली हैं, आम रसीले मन को भाये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। आँगन-चौबारों में पानी, नदियों में आ गई रवानी, मेढक टर्र-टर्र टर्राते, हरे सिंघाड़े बिकने आये। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। सात रंग से सजा रूप है, इन्द्रधनुष कितना अनूप है, बच्चे गलियों के गड्ढों में कागज वाली नाव चलायें। सूखे ताल-तलैया भरने, आँचल में लेकर जल आये।। |
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