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निर्वाचन की नाव में, नेता हुए सवार।
थाम हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।१।
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बातें बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरों ने ताल में, जाल दिया हैं फेंक।२।
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सब अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
देश नोचने के लिए, फिर मंडराये गिद्ध।३।
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सबको अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता को भड़का रहे, भर साधू का भेष।४।
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निशाचरों के देश में, है लाचार समाज।
अन्धों पर काना सदा, करता रहता राज।५।
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निर्वाचन के बाद में, खत्म
हो गया शोर।
जनता ने दिखला दिया, अपने
मत का जोर।६।
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अपनी-अपनी जीत के, दावे करते
लोग।
लेकिन पत्ते बन्द हैं, खोलेगा
आयोग।७।
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बुधवार, 14 मई 2014
"दोहा सप्तक-निर्वाचन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 19 मार्च 2014
"दोहे-निर्वाचन की नाव" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
थाम
हाथ में चल पड़े, छल-बल की पतवार।।
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बातें
बहुत लुभावनी, नहीं इरादे नेक।
मछुआरे
तालाब में, जाल रहे हैं फेंक।।
--
निशाचरों के देश में, है लाचार समाज। उल्लू का बच्चा करे, जंगल में अब राज।। --
सब
अपने को कर रहे, सच्चा सेवक सिद्ध।
देश
नोचने के लिए, फिर मंडराये
गिद्ध।।
--
सबको
अपनी ही पड़ी, जाये भाड़ में देश।
जनता
को भड़का रहे, भर साधू का भेष।।
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मत
देना उनको नहीं, जिनके मन में खोट।
देना
अपना साथियों, सोच-समझकर वोट।।
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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012
"निर्वाचन का दौर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
भारत की महानता का, नही है अतीत याद, वोट माँगने को, नेता आया बिनबुलाया है। देश का कहाँ है ध्यान, होता नित्य सुरापान, जाति, धर्म, प्रान्त जैसे, मुद्दों को भुनाया है। युवराज-सन्त चल पड़े, गली-हाट में, निर्वाचन के दौर ने, ये दिन भी दिखाया है। |
सोमवार, 30 जनवरी 2012
"एक दोहा-तीन मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
♥ एक दोहा ♥
देव भूमि में हो रहा, निर्वाचन का काम।
मैले इस तालाब में, कैसे करें हमाम।।
♥ तीन मुक्तक ♥
एक सुमन खिल जायेगा, मुरझायेंगे कई,
छल की भरी शराब है, बोतल बदल गई।
आये हैं लाखों खर्चकर, पायेंगे सौ करोड़,
मिल जायेगी कुर्सी जिसे, मुस्काएगा वही।।
सत्ता का सुख मिला तो भाग्यवान हो गया,
बिरुआ बबूल का तो नौजवान हो गया।
युवराज बनके उसने विरासत सम्भाल ली,
लिक्खा-पढ़ा हुआ तो बेजुबान हो गया।।
मक्कार-बेईमान ताल ठोक कर खड़े हुए,
ईमानदार जाँच के बबाल में पड़े हुए।
खाते लज़ीज़ माल देश का कसाब हैं,
गद्दार आज कीर्तिमान पर अड़े हुए।।
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