हौसला रख कर कदम आगे धरो। फासले इतने तो मत पैदा करो।। -- चाँद तारों से भरी इस रात में, मत अमावस से भरी बातें करो। -- जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी, मत इसे जज्बात में रौंदा करो। -- उलझनों का नाम ही है जिन्दगी, हारकर, थककर न यूँ बैठा करो। -- छोड़ दो शिकवों-गिलों की बात अब, मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो। -- ज़िन्दगी है चार दिन की चाँदनी, “रूप” पर इतना न तुम ऐंठा करो। -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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गुरुवार, 20 नवंबर 2025
"ग़ज़ल-फासले इतने तो मत पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मंगलवार, 26 अगस्त 2025
गजल "मिलकर बहुत अच्छा लगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मन-सुमन
खिलकर बहुत अच्छा लगा बरसात
में मिलकर बहुत अच्छा लगा बाग में
चहका बहारों का चमन साथ
में चलकर बहुत अच्छा लगा दूर
अब सारे गिले-शिकवे हुए मैल
को धुलकर बहुत अच्छा लगा प्यार
के सैलाब में जब फँस गये ताल
में पलकर बहुत अच्छा लगा हाथ
में रेशम की डोरी आ गयी चाकेदिल
सिलकर बहुत अच्छा लगा ख्वाब
का दरिया हकीकत सा लगा बदन
को मलकर बहुत अच्छा लगा रुप
के बादल बरसकर थम गये आग
में जलकर बहुत अच्छा लगा |
बुधवार, 25 जून 2025
ग़ज़ल "उलझा है ताना-बाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
तब तक जहाँ में रहना, जब तक है आबोदाना सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी होते हैं गमजदा जब, हँसता है तब जमाना घर की तलाश में जो, दर-दर भटक रहे हैं खानाबदोश को तो, मिलता नहीं ठिकाना अपना नहीं बनाया, रहने को आशियाना लेकिन लगा रहा है, वो रोज शामियाना मंजिल मिली न अब तक, दर-दर भटक रहा है बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें सिसक रहीं हैं दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना हुनर को इस जहाँ में, कोई न पूछता है मालिक के दोजहाँ में, खाली हुआ खजाना लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे आया न आदमी को, आपस में सुर मिलाना दिल की नजर धुँधली, है “रूप” तिलमिलाता महफिल में मुफलिसी की, अशआर गुनगुनाना -- |
बुधवार, 23 अक्टूबर 2024
ग़ज़ल "अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है रात में उगता हुआ माहताब है -- था कभी ओझल हुआ जो रास्ता अब नज़र आने लगा मेहराब है -- आसमां से छँट गयीं अब बदलियाँ अब खुशी का आ गया सैलाब है -- पत्थरों में प्यार का ज़ज़्बा बढ़ा अब बगीचे में ग़ुलों पर आब है -- फूल पर मँडरा रहा भँवरा रसिक एक बोसे के लिए बेताब है -- शाम ढलने पर कुमुद हँसने लगे भा रहा कीचड़ भरा तालाब है -- रोज़ आती रौशनी की रश्मियाँ ख़्वाब का ये “रूप” भी नायाब है -- |
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
ग़ज़ल "आका का यहाँ रुतबा सलामत है " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
छुरी को जब मिले मौका, हमेशा वार करती है छुरी मीठी हो या कड़वी, छिपी उसमें कयामत है -- बगीचा सींचना होगा, सभी को नेह के जल से यहाँ जनतन्त्र है जिन्दा, नहीं कोई रियासत है -- लगे प्रतिबन्ध हों कितने, बशर तो उफ नहीं करते चमन को लूटने में भी, उन्हें खासी महारत है -- हिमाक़त को हिमाक़त भी, रियाया कह नहीं सकती खुदा के बाद आका का, यहाँ रुतबा सलामत है -- कोई सरनाम होता है, कोई गुमनाम रहता है सदर के नाम पर होेती, हुकूमत में हजामत है -- घिनौने 'रूप' को उनके, सुहाना बोलना पड़ता शराफत है हिरासत में, हिमाकत में निजामत है -- |
मंगलवार, 10 सितंबर 2024
ग़ज़ल "बरसात अचानक होती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
|
गीतिका -- बिन बादल बरसात अचानक
होती है आँखों की बरसात भयानक
होती है -- दिलवालों की दुनिया बड़ी
निराली है उनकी हर सौगात निदानक
होती है -- बात बुजुर्गों की मानो
हर हालत में उनकी तो हर बात विधानक
होती है -- बुरा कभी मत बोलो चहके
गुलशन में गाली की बारात अमानक
होती है -- रूप अनछुआ ही कलियों का
रहने दो फूलों की औकात समानक
होती है -- |
सोमवार, 9 सितंबर 2024
ग़ज़ल "ढलती उमर में जवानी नहीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- जो
गई है गुजर फिर वो आनी नहीं यह
हकीकत है कोई कहानी नहीं -- चाट
लो चाहे ताकत की चटनी भले चढ़ती
ढलती उमर में जवानी नहीं -- चार
दिन का है मौसम बहारों भरा खिलती
कलियाँ हमेशा सुहानी नहीं -- पालना
पौध को काम मुश्किल बड़ा सबको
आती यहाँ बागवानी नहीं -- मैं
जईफी की किससे कहूँ दास्तां जिन्दगी
की बची अब निशानी नहीं -- सूखकर
है बदन आज काँटा हुआ बहता
दरिया में हर रोज पानी नहीं -- रूप
रहता नहीं है सलामत कभी अब
रवानी रही खानदानी नहीं -- |
रविवार, 8 सितंबर 2024
ग़ज़ल "सावन की झड़ी वो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- खुशी
की आ गयी अब तो घड़ी वो महकने
लग गयी जब से लड़ी वो -- गुजरने
लग गये दिन अब खुशी से सफर
में जुड़ गयी जब से कड़ी वो -- भरी
बरसात में जब हम मिले थे मुझे
है याद सावन की झड़ी वो -- हमारे
प्यार की देती गवाही महल
से कम नहीं थी झोंपड़ी वो -- रूप
का पानी जहाँ हमने पिया था अभी
सूखी नहीं है बावड़ी वो -- |
बुधवार, 4 सितंबर 2024
ग़ज़ल "दुनिया को हैरान न कर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- भौंहें वक्र-कमान न कर लक्ष्यहीन संधान न कर -- ओछी हरक़त करके बन्दे दुनिया को हैरान न कर -- दीन-धर्म पर करके दंगे ईश्वर का अपमान न कर -- मन पर काबू करले प्यारे दिल को बेईमान न कर -- जल-जंगल से ही जीवन है दोहन और कटान न कर -- जो जनता को आहत करदे ऐसे कभी बयान न कर -- जिससे हो नुकसान वतन का ज़ारी वो फ़रमान न कर -- नहीं सलामत 'रूप' रहेगा सूरत पर अभिमान न कर -- |
शुक्रवार, 30 अगस्त 2024
ग़ज़ल "अकड़ा हुआ है आदमी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- फालतू की ऐँठ में, अकड़ा हुआ है आदमी। मज़हबों की कैद में, जकड़ा हुआ है आदमी।। -- सभ्यता की आँधियाँ, जाने कहाँ ले जायेंगी, वासना के वेग ने, पकड़ा हुआ है आदमी। -- छिप गयी है अब हकीकत, कलयुगी परिवेश में, रोटियों के देश में, टुकड़ा हुआ है आदमी। -- हम चले जब खोजने, उसको गली-मैदान में ज़िन्दग़ी के खेत में, उजड़ा हुआ है आदमी। -- बिक रही है कौड़ियों में, देख लो इंसानियत, आदमी की पैठ में, बिगड़ा हुआ है आदमी। -- “रूप” तो है इक छलावा, रंग पर मत जाइए, नगमगी परिवेश में, पिछड़ा हुआ है आदमी। -- |
शुक्रवार, 26 जुलाई 2024
ग़ज़ल "यौवन उबार लेना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना। जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना। -- सावन की घन-घटाएँ, बरसे बिना न रहतीं, बारिश की मार से तुम, मन को न हार देना। -- इठला रहे हैं अब तो, नाले-नदी-गधेरे, गर हो सके तो इनसे, मस्ती उधार लेना। -- धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते, करके निराई इनका, आँचल सँवार देना। -- अब झूम-झूम भँवरे, गुंजार कर रहे हैं, तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना। -- चढ़ती हुई नदी का, तो रूप मस्त होता, तुम ज़लज़लों से अपना, यौवन उबार लेना। -- |
शनिवार, 20 जुलाई 2024
ग़ज़ल "बरसता झूमकर सावन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- बरसने लग गया सावन, चलो भीगें फुहारों में फलक ने रंग बदला है, घटाओं के नजारों में -- दरकते हों भले पत्थर, पहाड़ों की शिलाओं के सुनाते लोरियाँ झरने, महकते देवदारों में -- बड़े मायूस हैं मजदूर, अपने आशियानों में ग्रहण जैसा लगा, बारिश से सारे रोजगारों में -- गरीबी झेलती आफत, अमीरी ऐश करती है मजा भी है सजा भी है, फिजाओं की बहारों में -- फलक पर देखकर बादल, किसानों के खिले चेहरे लगाने धान के पौधे, चले घर से कतारों में -- घटाओं में भरा पानी, बरसता झूमकर सावन खुशी से पेड़ लहराते, भरी मस्ती बयारों में -- धनुष के सात रंगों का, सलोना ‘रूप’ उभरा है इरादों को बताता है, हमें मौसम इशारों में -- |
सोमवार, 15 जुलाई 2024
ग़ज़ल "गुंचा खिला नहीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- बातों का जिससे कोई बना सिलसिला नहीं शिकवा नहीं हैं उससे जो अब तक मिला
नहीं -- अपनों के दिये जख्म याद रहते उम्र भर गैरों की बात का कभी होता गिला नहीं -- दोस्ती करो तो निभाओ वफा के साथ दो कदम का होता कोई फासला नहीं -- आग के दरिया को पार करना इश्क है आशिक कभी भी हारते हैं हौसला नहीं -- दर्जी में अगर काम का हुनर नहीं भरा जिसने कभी फटा हुआ दामन सिला नहीं -- अब आरती के थाल भी खाली ही रह गये किस काम का गुलशन जहाँ गुंचा खिला नहीं -- महफिल सजेगी क्या भला बिन 'रूप' के वहाँ आबाद बादशाह बिना होता किला नहीं -- |
रविवार, 14 जुलाई 2024
ग़ज़ल "बारिश डराने आ गयी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आज फिर बारिश डराने आ गयी। पर्वतों पर कहर ढाने आ गयी। -- मेघ छाये-गगन काला हो गया, चैन आँखों का चुराने आ गयी।। -- लीलने को अब नहीं कुछ भी बचा राग फिर किसको सुनाने आ गयी? -- गाँव की वीरान कुटिया पूछती क्यों यहाँ आफत मचाने आ गयी? -- जिन्दगी के आशियाने ढह गये, पत्थरों को अब सताने आ गयी। -- अब नहीं भाता तुम्हारा “रूप” हमको, क्यों यहाँ सूरत दिखाने आ गयी? -- |
मंगलवार, 25 जून 2024
ग़ज़ल "रियायत कौन करता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है -- शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को, मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है -- सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है -- मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है -- ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है -- सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है-- |
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