आओ हिन्दी दिवस पर, प्रण करलें हम आज। हिन्दी भाषा में हमें, करने हैं सब काज।१। -- ले जाना है विश्व में, हिन्दी का अभियान। हिन्दी से हो जगत में, भारत की पहचान।२। -- तुलसी, सूर-कबीर की, वाणी है अनमोल। देवनागरी के हमें, मीठे लगते बोल।३। -- हिन्दी भाषा का नहीं, कोई है पर्याय। सुधरे सबकी वर्तनी, ऐसे करो उपाय।४। -- सम्बोधन जिसके करें, सबको भावविभोर। लहरों में सम्बन्ध के, होता हृदय हिलोर।५। -- बिन्दी से होता सदा, माँ का अटल सुहाग। हिन्दी से अब कीजिए, प्यार और अनुराग।६। -- उर्दू का नुक़्ता बने, हिन्दी की पहचान। लिखने-पढ़ने में सरल, हिन्दी का विज्ञान।७। -- देवनागरी में रचे, वेदों के सब मन्त्र। भाषा के आधार पर, टिका हुआ जनतन्त्र।८। -- भजन-कीर्तन-आरती, सब हिन्दी में होय। तन-मन को निर्मल करे, योग-ध्यान का तोय।९। -- एक दिवस ही क्यों करें, हिन्दी का सम्मान।। प्रतिदिन होना चाहिए, हिन्दी का गुणगान।१०। -- |
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गुरुवार, 14 सितंबर 2023
दस दोहे "हिन्दी-दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मंगलवार, 13 सितंबर 2016
दस दोहे "हिन्दी का गुणगान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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आओ हिन्दी दिवस पर, प्रण करलें हम आज।
हिन्दी भाषा में हमें, करने हैं सब काज।१।
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ले जाना है विश्व में, हिन्दी का अभियान।
हिन्दी से हो जगत में, भारत की पहचान।२।
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तुलसी, सूर-कबीर की, वाणी है अनमोल।
देवनागरी के हमें, मीठे लगते बोल।३।
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हिन्दी भाषा का नहीं, कोई है पर्याय।
सुधरे सबकी वर्तनी, ऐसे करो उपाय।४।
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सम्बोधन जिसके करें, सबको भावविभोर।
लहरों में सम्बन्ध के, होता हृदय हिलोर।५।
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बिन्दी से होता सदा, माँ का अटल सुहाग।
हिन्दी से अब कीजिए, प्यार और अनुराग।६।
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उर्दू का नुक़्ता बने, हिन्दी की पहचान।
लिखने-पढ़ने में सरल, हिन्दी का विज्ञान।७।
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देवनागरी में रचे, वेदों के सब मन्त्र।
भाषा के आधार पर, टिका हुआ जनतन्त्र।८।
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भजन-कीर्तन-आरती, सब हिन्दी में होय।
तन-मन को निर्मल करे, योग-ध्यान का तोय।९।
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एक दिवस ही क्यों करें, हिन्दी का सम्मान।।
प्रतिदिन होना चाहिए, हिन्दी का गुणगान।१०।
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गुरुवार, 3 जुलाई 2014
"दोहे-जन-जीवन बेहाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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धरती प्यासी हो रही, जन-जीवन बेहाल।
धान लगाने के लिए, लालायित गोपाल।१।
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सावन में सूखा पड़ा, नहीं बरसता नीर।
निर्धन, श्रमिक-किसान का, मन हो रहा अधीर।२।
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बादल के बदले खिली, आसमान में धूप।
ग्रीष्मकाल जैसा लगे, चौमासे का रूप।३।
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बढ़ी हुई मँहगाई से, जन-जीवन है त्रस्त।
अच्छा शासन देख कर, हुए हौसले पस्त।४।
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बिन ईंधन चलती वहीं, बाइक-मोटरकार।
अब तो मध्यम वर्ग को, खिसक रहा आधार।५।
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जनता से फिर हो गयी, भारी-भरकम भूल।
कौआ मोती निगलता, हंस फाँकता धूल।६।
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रामराज का स्वप्न अब, कैसे हो साकार।
जनता के हित की नहीं, सोच रही सरकार।७।
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चलकर आयी चाँदनी, क्यों करता है देर।
क्या कर लेंगे आपका, तीतर और बटेर।८।
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दिल पर अंकित हो गये, जीवन के अनुभाव।
अब तो शीतल लेप भी, बढ़ा रहे हैं घाव।९।
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कल तक थे अच्छे लगे, मीठे-मीठे बोल।
चार दिनों के बाद ही, खुली ढोल की पोल।१०।
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गुरुवार, 26 जून 2014
"दस दोहे-अन्तरजाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
काम-काम को छल रहा, अब तो आठों याम।।
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लटक
रहे हैं कब्र में, जिनके आधे पाँव।
वो
ही ज्यादा फेंकते, इश्क-मुश्क के दाँव।।
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मन
की बात न मानिए, मन है सदा जवान।
तन
की हालत देखिए, जिसमें भरी थकान।।
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नख-शिख
को मत देखिए, होगा हिया अशान्त।
भोगवाद
को त्याग कर, रक्खो मन को शान्त।।
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रोज फेसबुक
पर लिखो, अपने नवल विचार।
अच्छी
सूरत देख कर, मत फैलाओ विकार।।
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सीख
बड़ों से ज्ञान को, छोटों को दो ज्ञान।
जीवन
ढलती शाम है, दिन का है अवसान।।
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अनुभव
अपने बाँटिए, सुधरेगा परिवेश।
नवयुग
को अब दीजिए, जीवन का सन्देश।।
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भरा
हुआ है सिन्धु में, सभी तरह का माल।
जो
भी जिसको चाहिए, देगा अन्तरजाल।।
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महादेव
बन जाइए, करके विष का पान।
धरा
और आकाश में, देंगे सब सम्मान।।
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शुक्रवार, 10 अगस्त 2012
"दोहे-कर्म बनाता भाग्य को" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
निहित ज्ञान का पुंज है, गीता में श्रीमान। पढ़ना इसको ध्यान से, इसमें है विज्ञान।१। कर्म बनाता भाग्य को, यह जीवन-आधार। कर्तव्यों के साथ में, मिल जाता अधिकार।२। प्राणिमात्र कल्याण का, वेदों में सन्देश। जीवन में धारण करो, ये अनुपम उपदेश।३। नेह हमारा साथ है, ईश्वर पर विश्वास। अन्धकार को चीर के, फैले धवल उजास।४। अपने प्यारे देश का, आओ रक्खें मान। जगद्गुरू बनकर पुनः, दुनिया को दें ज्ञान।५। केवल कर्म प्रधान है, जीवन का आधार। बैठे-ठाले कभी भी, मिले नहीं उपहार।६। चन्दा, सूरज धरा भी, चलते हैं दिन-रात। जो देते जड़-जगत को, शीतल-सुखद प्रभात।७। चलना ही है जिन्दगी, रुकना तो है मौत। सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।८। तुलसी, सूर-कबीर की, मीठी-मीठी तान। निर्गुण-सगुण उपासना, भूल गया इन्सान।९। उपादान के मर्म को, समझाते हम आज। धर्म और सत्कर्म से, सुधरे देश-समाज।१०। |
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