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शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

‘‘वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जिन्दगी है तो उलझन-झमेले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


जिन्दगानी बिना कुछ धरा ही नही,

आसमाँ भी नही और धरा भी नही,

जिन्दगी में भरे खेल-खेले भी है।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


हमको जीवन मिला तो वतन भी मिला,

एक तन भी मिला एक मन भी मिला,

शुद्ध भी है बहुत और मैले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


प्रेम का रोग है, योग है भोग है,

दान है पुण्य है साथ में लोभ है,

सद्-गुरू, ज्ञान है और चेले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


बस्तियाँ हैं घनी और जंगल भी है,

प्रीत है मीत है और दंगल भी हैं,

कुछ शहद से भरे कुछ विषैले भी हैं।

वेदनाएँ भी हैं सुख के मेले भी हैं।।


गुरुवार, 30 जुलाई 2009

‘‘वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



रंग भी रूप भी छाँव भी धूप भी,

देखते-देखते ही तो ढल जायेंगे।

देश भी भेष भी और परिवेश भी,

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


ढंग जीने के सबके ही होते अलग,

जग में आकर सभी हैं जगाते अलख,

प्रीत भी रीत भी, शब्द भी गीत भी,

एक न एक दिन तो मचल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


आप चाहे भुला दो भले ही हमें,

याद रक्खेंगे हम तो सदा ही तुम्हें,

तंग दिल मत बनो, संगे दिल मत बनो,

पत्थरों में से धारे निकल आयेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


हर समस्या का होता समाधान है,

याद आता दुखों में ही भगवान है,

दो कदम तुम बढ़ो, दो कदम हम बढ़ें,

रास्ते मंजिलों से ही मिल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


गम की दुनिया से वाहर तो निकलो जरा,

पथ बुलाता तुम्हें रोशनी से भरा,

हार को छोड़ दो, जीत को ओढ़ लो,

फूल फिर से बगीचे में खिल जायेंगे।

वक्त के साथ सारे बदल जायेंगे।।


बुधवार, 29 जुलाई 2009

‘‘आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





झुक गईं शाखाएँ स्वागत में तुम्हारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


बुझ गई प्यासी धरा की है पिपासा,

छँट गई व्याकुल हृदय से अब निराशा,

एक अरसे बाद आयी हैं फुहारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


धान के पौधों को जीवन मिल गया है,

धूप से झुलसा चमन अब खिल गया है,

पर्वतों पर गा रहे हैं गान धारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


पंचमी पर नाग-पूजा रंग लाई,

आसमानों में घटा घनघोर छाई,

बह रही पुरवाई की शीतल बयारे।

आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।


मंगलवार, 28 जुलाई 2009

‘‘हसीन ख्वाब’’ (डा0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


इक हादसे में उनसे मुलाकात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

देखा उन्हें मगर न कोई बात कर सके,
केवल नजर मिली, नजर में बात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

वो भी थे बेकरार और हम भी थे गरजमन्द,
दोनो के लिए प्रेम की सौगात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

इक दूजे के जज्बात दोनो तोलते रहे,
हम डाल-डाल थे वो पात-पात हो गयी।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

खाई थी खेल में उन्होंने शह हजार बार,
जब अन्त आ गया तो मेरी मात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

धूप-छाँव के चले थे सिलसिले बहुत,
मंजिल के बीच में ही तो बरसात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

साया तलाशते रहे हम तो तमाम दिन,
केवल इसी उधेड़-बुन में रात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।

आँखें खुली हसीन ख्वाब टूट गया था,
सूरज चढ़ा हुआ था और प्रात हो गई।
रोज-रोज मिलने की शुरूआत हो गई।।


‘‘काले बादल बरस रहे हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



गरज रहे हैं, लरज रहे हैं,
काले बादल बरस रहे हैं।

कल तक तो सावन सूखा था,
धरती का तन-मन रूखा था,
आज झमा-झम बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

भीग रहे हैं आँगन-उपवन,
तृप्त हो रहे खेत, बाग, वन,
उमड़-घुमड़ घन बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

मुन्ना भीगा, मुन्नी भीगी,
गोरी की है चुन्नी भीगी,
जोर-शोर से बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

श्याम घटाएँ घिर-घिर आयी,
रिम-झिम की बजती शहनाई,
जी भर कर अब बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

‘‘एक मुक्तक’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



दुर्बल पौधों को ही ज्यादा पानी-खाद मिला करती है।

चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है

सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है-

यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।


सोमवार, 27 जुलाई 2009

"बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरे बहुत से ब्लागर मित्र अपनी पोस्ट में केवल एक शेर ही लगाते हैं।

आज मैंने भी केवल कुछ शेर ही पोस्ट करने का मन बनाया है।

कुछ मित्रों की रचनाओं को टिपियाते-टिपियाते यह छन्द बन गये।


हमें लिखने की आदत है, मगर वो पढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


सफीना चलते-चलते ही, भँवर में फँस गया अपना,

उन्हें मिलने की आदत है, मगर हम बढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,

उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


जरा सी मय को पीकर, वो तो पहुँचे आसमानों में,

उन्हें उड़ने की आदत है, मगर हम चढ़ नही सकते।

बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।


‘‘जग के झंझावातों में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


होड़ लगी आगे बढ़ने की, मची हुई आपा-धापी,

मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,

दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


जीने का अन्दाज जगत में, कितना नया निराला है,

ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है,

ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


मित्र, पड़ोसी, और भाई, भाई के शोणित का प्यासा,

भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा।

विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।


एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,

बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,

खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।

दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

रविवार, 26 जुलाई 2009

‘‘झूला झूलें सावन में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।


शनिवार, 25 जुलाई 2009

‘‘अब तो जम करके बरसो, क्यों करते हो कल और परसों?’’(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


नदिया-नाले सूख रहे हैं, जलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी के, व्याकुल खड़े उदासे हैं।।

चौमासे के मौसम में, सूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने को, धरती आज तरसती है।।

नभ की ओर उठा कर मुण्डी, मेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके से, ये कातर स्वर में गाते हैं।।

दीन-कृषक है दुखी हुआ, बादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नही, क्यों आसमान की झोली से?

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।।

दया करो घनश्याम, सुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिम-झिम झड़ी लगा जाओ, क्यों करते हो कल और परसों?

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

‘‘मौत से सब बेखबर हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



ब्लॉगर मित्रों!
उच्चारण के 183 दिन के सफर में वैराग्य की यह

300वीं रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

आशा ही नही अपितु विश्वास भी है कि

आप सबका स्नेह मुझे आगे भी मिलता रहेगा।


देखते हैं रात दिन शमशान को,

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।

आयेंगे चौराहे और दोराहे कितने,

एक जैसी अन्त में सबकी डगर हैं।।

जिन्दगी में स्वप्न सुन्दर हैं सजाये,

गगनचुम्बी भवन सुन्दर हैं बनाये,

साथ तन नही जायेगा, तन्हा सफर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


बन्धु और बान्धव मिलाने खाक में ही जायेंगे,

देह कुन्दन कनक सी सब राख ही हो जायेंगे।

चाँद-सूरज फेर ही लेंगे, नजर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


धार में दरिया की सारी अस्थियाँ बह जायेंगी,

सब तमन्नाएँ धरी की धरी ही रह जायेंगी,

स्वर्ग की सरिता में, कितने ही भँवर हैं।

किन्तु कितना मौत से सब बेखबर हैं।।


"जीत की गन्ध आने लगी हार में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कितनी ताकत छिपी शब्द की धार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

वो तो बातों से नश्तर चुभोते रहे,
हम तो हँसते हुए, घाव ढोते रहे,
घात ही घात था उनके हर वार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

मेरे धीरज को वो आजमाते रहे,
हम भी दिल पर सभी जख्म खाते रहे,
पीठ हमने दिखाई नही प्यार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

दाँव-पेंचों को वो आजमा जब चुके,
हार थक कर के अब वार उनके रुके,
धार कुंठित हुई उनके हथियार मे।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

संग-ए-दिल बन गया मोम जैसा मृदुल,
नेह आया उमड़ सिन्धु जैसा विपुल,
हार कर जीत पाई थी उपहार में।
जीत की गन्ध आने लगी हार में।।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

"याद वो मंजर पुराने आ गये हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)"


फिर चली पुरवाई बादल छा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

पेड़ के नीचे अचानक बैठ जाना,
गीत लिखना और उनको गुनगुनाना,
शब्द बनकर छन्द लय को पा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

झूमते भौंरो का गुंजन-गान गाना,
मस्त होकर सुमन का सौरभ लुटाना,
फूल-पत्ते भी नजर को भा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

झाँक कर खिड़की से उनका मुस्कुराना,
नजर मिलते ही नजर अपनी झुकाना,
नयन में सपने सुहाने छा गये हैं।
याद वो मंजर पुराने आ गये हैं।।

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

‘‘आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

भार हम जिन्दगी का ही ढोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

हाथ पर हाथ रख कर नही बैठे हम,

सुख में हँसते रहे, गम में रोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

कुछ भी आगे नही बढ़ सके राह में,

हादसे दिन-ब-दिन रोज होते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

हमने महफिल में उनके तराने पढ़े,

मखमली ख्वाब दिल में संजोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

आँखों-आखों में काटी थी राते बहुत,

वो तो खर्राटे भर-भर के सोते रहे।
आँसुओं से ही दामन भिगोते रहे।।

सोमवार, 20 जुलाई 2009

‘‘क्यों यहाँ हिंसा बहाने पर तुले हो?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






बुलबुलों का सदन है मेरा वतन,

क्यों इसे वीरां बनाने पर तुले हो?


खुशबुओं का चमन है मेरा वतन,

क्यों यहाँ दुर्गन्ध लाने पर तुले हो?


शान्त-सुन्दर भवन है मेरा वतन,

आग क्यों इसमें लगाने पर तुले हो?


प्यार की गंग-ओ-जमुन मेरा वतन,

क्यों यहाँ हिंसा बहाने पर तुले हो?


रोशनी में मगन है, नन्हा दिया,

इससे क्यों घर को जलाने पर तुले हो?

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

‘‘पाँच शेर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



हौसला रख कर जरा आगे बढ़ो,

फासले इतने तो मत पैदा करो।


चाँद तारों से भरी इस रात में,

मत अमावस से भरी बातें करो।


जिन्दगी है बस हकीकत पर टिकी,

मत इसे जज्बात में रौंदा करो।


उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,

हारकर, थककर न यूँ बैठा करो।


छोड़ दो शिकवों-गिलों की डगर को,

मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।


रविवार, 19 जुलाई 2009

रूमानी शायर गुरूसहाय भटनागर "बदनाम" की एक ग़ज़ल



वस्ल की शाम

महकी महकी सी है वादियों की सवा
शौक से आके इस का मज़ा लीजिऐ

बन गयी मैं गज़ल आप के सामने
जैसे चाहो मुझे आजमा लीजिऐ

मय को पी कर अगर दिल मचलने लगे
अपना दिल हमें फिर बना लीजिऐ

ये बहारों का रंग हुस्न की तश्नगी
प्यास नजरों की अपनी बुझा लीजिऐ

मैं बयाबां में हूँ खुशनुमा एक कली
मुझको जैसे जहाँ हो सजा लीजिऐ

कल तलक आरजूयें जो ‘बदनाम’ थीं
वस्ल को शाम है दिल लुटा लीजिऐ

वादियों-जंगल, कानन, वस्ल-मिलन, मुलाकात, सवा-हवा,
मय, शराब तश्नगी-प्यास, बयाबां-जंगल, आरजूयें-इच्छायें

‘‘जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है,
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

‘‘सुख की मुस्कान नही छाई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आसमान में बादल छाये, इन्द्रधनुष भी दिया दिखाई।
मस्त झखोरे ले कर आयी, पुरवा पवन चली सुखदायी।


देख-देख जिउरा हरसे, रिम-झिम बून्दों को तरसे,
नभ में हैं घनश्याम घिरे, वर्षा अब तक क्यों नही आयी?


सावन सूखा निकल गया, अब भादो आने वाला है,
ताल-तलैया रूखे-भूखे, दिन-प्रतिदिन बढ़ती मँहगाई।


आल्हा की चौपाल, बिना बारिश के सूनी-सूनी हैं,
मेघ मल्हारों की गुन्जन भी, अब तो पडत़ी नही सुनाई।


त्रस्त हुए तन-मन गर्मी से जनता आकुल-व्याकुल है,
जन मानस में अब तक भी, सुख की मुस्कान नही छाई।

शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

‘‘रंग-बिरंगी, तितली आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)






तितली आई! तितली आई!!

रंग-बिरंगी, तितली आई।।


कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।

आँखों को लगते हैं प्यारे।।


फूलों पर खुश हो मँडलाती।

अपनी धुन में हो इठलाती।।


जब आती बरसात सुहानी।

पुरवा चलती है मस्तानी।।


तब तुम अपनी चाल दिखाती।

लहरा कर उड़ती बलखाती।।


पर जल्दी ही थक जाती हो।

दीवारों पर सुस्ताती हो।।


बच्चों के मन को भाती हो।

इसीलिए पकड़ी जाती हो।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


गुरुवार, 16 जुलाई 2009

‘‘जरा ठहर जाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



अभी तो शाम है शब जल्द आने वाली है।

अभी चराग सजे हैं, जरा ठहर जाओ।।

तुम्हीं से ईद है, तुमसे मेरी दिवाली है।

मेरी ये अर्ज है, कुछ देर तो ठहर जाओ।।

तुम्हारे वास्ते दिल का मकान खाली है।

दिल-ए-चमन में मिरे, दो घड़ी ठहर जाओ।।

ज़फा-ए-दौर में, उम्मीद भी मवाली है,

गम-ए-दयार में आकर जरा ठहर जाओ।।


‘‘एक दिन स्वप्न साकार हो जायेगा’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


तुम अगर रोज मिलते-मिलाते रहे,

एक दिन स्वप्न साकार हो जायेगा।

मद-भरे मय के प्याले पिलाते रहे,

प्यार का ज़ाम उपहार हो जायेगा।।



मौन हैं शब्द, लब मेरे खामोश हैं,

गन्ध से हो गये भाव मदहोश हैं,

तुम अगर लाज से मुँह छिपाते रहे,

मेरा जीना भी दुश्वार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


मेरा मन है चमन, फूल बन कर खिलो,

खिल-खिलाते हुए, मीत बन कर मिलो,

हुस्न से इश्क को गर रिझाते रहे,

प्रीत में भी, अलंकार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


मेरी नजरों तुम और नजारों में तुम,

हो खिजाओं में तुम और बहारों में तुम,

मेरे आँगन में गर आते-जाते रहे,

सुख का सागर ये परिवार हो जायेगा।

एक दिन प्यार उपहार हो जायेगा।।


बुधवार, 15 जुलाई 2009

‘‘पानी नदारत है, आने वाली कयामत है?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सावन का महीना
बादलों की
आँख-मिचौली
और
पानी नदारत है,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
चारों ओर
सूखा और सिर्फ सूखा
प्यासे हैं बाग, तड़ाग,
व्यर्थ हो गई
सब प्रार्थना
और
इबादत हैं
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
खेतों में
उड़ रही है धूल
चमन में
मुरझा रहे हैं फूल
क्या
आने वाली
कयामत है?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

’’तुम ही मेरा सकल काव्य संसार हो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मेरी गंगा भी तुम, और यमुना भी तुम,
तुम ही मेरे सकल काव्य की धार हो।
जिन्दगी भी हो तुम, बन्दगी भी हो तुम,
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।

मुझको जब से मिला आपका साथ है,

शह मिली हैं बहुत, बच गईं मात है,
तुम ही मझधार हो, तुम ही पतवार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

बिन तुम्हारे था जीवन बड़ा अटपटा,

पेड़ आँगन का जैसे कोई हो कटा,
तुम हो अमृत घटा तुम ही बौछार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

तुम महकता हुआ शान्ति का कुंज हो,

जड़-जगत के लिए ज्ञान का पुंज हो,

मेरे जीवन का सुन्दर सा संसार हो।

गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

तुम ही हो वन्दना, तुम ही आराधना,

दीन साधक की तुम ही तो हो साधना,
तुम निराकार हो, तुम ही साकार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

आस में हो रची साँस में हो बसी,

गात में हो रची, साथ में हो बसी,
विश्व में ज्ञान का तुम ही भण्डार हो।
गीत-गजलों का तुम ही तो आधार हो।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

सोमवार, 13 जुलाई 2009

‘‘तुम अगर मेरे जीवन में आते नही’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


तुम अगर मेरे जीवन में आते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।


होती खेतों में तम्बू-कनाते गड़ी,
एक सुन्दर सा घर हम बनाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

प्यार करना न आता हमें उम्र भर,
गीत-कविताएँ हम गुन-गुनाते नही।।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

करनी पड़ती हमें एक दिन खुदकशी,
राह जीने की गर तुम दिखाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

डर गयीं थी सभी रोशनी की किरण,
आँख चन्दा व सूरज मिलाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

ले ही जाती भँवर में लहर खींच कर,
हाथ अपना अगर तुम थमाते नही।
हमको रंग जिन्दगी के लुभाते नही।।

रविवार, 12 जुलाई 2009

‘‘चलो झूला झूलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





सावन की आई बहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

बागों में कुहु-कुहु, बोले कोयलिया,
जियरा में अगन लगाये बदलिया,
गायेंगे मेघ-मल्हार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

मेंहदी रचाओ और गजरा सजाओ,
कजरारे नयनों में, कजरा लगाओ,
चूनर को लेना सँवार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

खेतों में धनवा की सोंधी महक है,
तालों में पनिया की चंचल चहक है,
शीतल चलत है बयार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

हरी-हरी धरती, हरी-हरी चुडियाँ,
महकी हैं कुड़ियाँ, चहकीं हैं बुढ़िया,
तीजो का आया त्योहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)


शनिवार, 11 जुलाई 2009

"बिन डोर खिचें सब आते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




शब्दों के मौन निमन्त्रण से,
बिन डोर खिचें सब आते हैं।
मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

इनके बिन बात अधूरी है,
नजदीकी में भी दूरी है,
दुनिया दारी में पड़ करके,
बतियाना बहुत जरूरी है,
मकड़ी के नाजुक जालों में,
बलवान सिंह फंद जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

पशु-पक्षी और संगी-साथी,
शब्दों से मन को भरमाते,
तीखे शब्दों से मीत सभी,
पल भर में दुश्मन बन जाते,
पहले तोलो, फिर कुछ बोलो,
स्वर मधुर छन्द बन जाते हैं।

मुद्दत से टूटे रिश्ते भी,
सम्बन्धों में बंध जाते हैं।।

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

‘‘तप कर निखर गये हम तो’’ (डॉ रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



डायरी से एक पुरानी गज़ल

इश्क की राह में चल कर बिखर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।


कल तलक ख्वाब था अब बनके हकीकत आया,
उनका इक वार मेरे दिल में नसीहत लाया,
अपने जज्बात में आकर सिहर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

बदले हालात में, किस्मत ने साथ छोड़ दिया,
बीती यादों ने मुकद्दर को गम से जोड़ दिया,
तुम जिधर को चले थे, बस उधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

तुम कहाँ हो? मेरे हालात पर तरस खाओ,
चाँदनी रात में आकर के दरस दिखलाओ,
राह-ए -उल्फत में कुछ सुधर गये हम तो।
आग के ताप में तप कर निखर गये हम तो।।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

‘‘घन छाये हैं’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




सागर से जल भर लाये हैं।

आसमान में घन छाये हैं।।


धरती की ये प्यास हरेंगे।

अब सूखे तालाब भरेंगे।।


खेतों में हल चल जायेंगे।

मेंढक टर-टर टर्रायेंगे।।


मेह झमा-झम अब बरसेगा।

बागों का तन-मन हर्षेगा।।


शीतल मन्द बयार चलेगी।

उपवन में अब कली खिलेगी।।


झींगुर अब गुंजार करेंगे।

प्यासे जलचर नही मरेंगे।।


अब हरियाली छा जायेगी।

गैया हरी-घास खायेगी।।


अन्न धरा अब उपजायेगी।

महँगाई कम हो जायेगी।।



बुधवार, 8 जुलाई 2009

‘‘गगन में छा गये बादल’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बड़ी हसरत दिलों में थी, गगन में छा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

गरज के साथ आयें हैं, बरस कर आज जायेंगे,
सुहानी चल रही पुरवा, सभी को भा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

धरा में जो दरारें थी, मिटी बारिश की बून्दों से,
किसानों के मुखौटो पर, खुशी चमका गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

पवन में मस्त होकर, धान लहराते फुहारों में,
पहाड़ों से उतर कर, मेह को बरसा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

‘‘इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

दिल में घुसा हुआ है,
दल-दल दलों का जमघट।
संसद में फिल्म जैसा,
होता है खूब झंझट।
फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे। 
होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे।।

गुस्सा व प्यार इनका,
केवल दिखावटी है।
और देश-प्रेम इनका,
बिल्कुल बनावटी है।
बदमाश, माफिया सब इनके ही घर पलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

खादी की केंचुली में,
रिश्वत भरा हुआ मन।
देंगे वहीं मदद ये,
होगा जहाँ कमीशन।
दिन-रात कोठियों में, घी के दिये जलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।

सोमवार, 6 जुलाई 2009

‘‘जंगल और जीव’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


रहता वन में और हमारे,
संग-साथ भी रहता है।
यह गजराज तस्करों के,
जालिम-जुल्मों को सहता है।।

समझदार है, सीधा भी है,
काम हमारे आता है।
सरकस के कोड़े खाकर,
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार) नूतन करतब दिखलाता है।।

मूक प्राणियों पर हमको तो,
तरस बहुत ही आता है।
इनकी देख दुर्दशा अपना,
सीना फटता जाता है।।



वन्य जीव जितने भी हैं,
सबका अस्तित्व बचाना है,
जंगल के जीवों के ऊपर,
दया हमें दिखलाना है।
वृक्ष अमूल्य धरोहर हैं,
इनकी रक्षा करना होगा।

जीवन जीने की खातिर,
वन को जीवित रखना होगा।
तनिक-क्षणिक लालच को,
अपने मन से दूर भगाना है।
धरती का सौन्दर्य धरा पर,
हमको वापिस लाना है।।

‘‘जोकर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जो काम नही कर पायें दूसरे,

वो जोकर कर जाये।
सरकस मे जोकर ही,
दर्शक-गण को खूब रिझाये।
नाक नुकीली, चड्ढी ढीली,
लम्बी टोपी पहने,
उछल-कूद कर जोकर राजा,
सबको खूब हँसाये।
चाँटा मारा साथी को,
खुद रोता जोर-शोर से,
हाव-भाव से, शैतानी से,
सबका मन भरमाये।
लम्बावाला तो सीधा है,
बौना बड़ा चतुर है,
उल्टी-सीधी हरकत करके,
बच्चों को ललचाये।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

रविवार, 5 जुलाई 2009

‘‘जग की यही कहानी है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जबरा मारे रोने ना दे, जग की यही कहानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


मेड़ खेत को लगी निगलने, किसको दोषी ठहरायें,

रक्षक ही भक्षक बन बैठे, न्याय कहाँ से हम पायें,

अन्धा है कानून, न्याय की डगर बनी बेगानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।



दुर्जन कुर्सी पर, लेकिन सज्जन फिरते मारे-मारे,

सच्चों की अब खैर नही, झूठों के हैं वारे-न्यारे,

शौर्य-वीरता की तो मानों, थम सी गयी रवानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।


दुर्बल को बलवान लूटता, जनता को राजा लूटे,

निर्धन बिना मौत मरता, धन के बल से कातिल छूटे,

बे-ईमानों की इस कलयुग में, चमक रही पेशानी है।

छिपी हुई खारे आँसू में, दुख की कोई निशानी है।।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

‘‘माता और पिता’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)






बचपन की धुँधली यादें, जब मानस पर छा जाती हैं।
माता और पिता की सूरत, आखों में आ जाती हैं।।



लालन-पालन में कितने, भरसक प्रयत्न किये होंगे।
अच्छी शिक्षा दिलवाने में, कितने यत्न किये होंगे।।

वृद्ध पिता-माता मुझको, अपने प्राणों से प्यारे हैं।
जीवन के आधार यही हैं, ये भगवान हमारे हैं।।

ये मेरे हैं महादेव, मैं इनको भोग लगाता हूँ।
मात-पिता के चरणों में, मैं स्वर्ग अलौकिक पाता हूँ।।

‘‘सुन्दर सुमन खिलाना होगा’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



मानवता मर गयी विश्व में, सूरज है पथराया।
डोल गये ईमान-धर्म, सारा जग है बौराया।।

नदियों में बहने वाले, तालाबों को क्या पहचाने।
महलों में रहने वाले, सर्दी-गर्मी को क्या जाने।।

जगत बँधा है, प्रीत-रीत के अभिनव बन्धन में।
ब्याल लिप्त रहता है, चन्दन के महके तन में।।

जीवन एक सफर, इसमें यादें आती जाती है।
रिश्तों की बुनियाद, राह में बनती जाती है।।

जितना जख्म कुरेदोगे, उतना ही दर्द बढ़ेगा।
जितनी धूल उड़ाओगे, उतना ही गर्द चढ़ेगा।।

जोड़-तोड़ करके अपना परिवार चलाना होगा।
वीराने गुलशन में सुन्दर सुमन खिलाना होगा।।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

‘‘जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



अन्तर रखने वालों से, मेरा अन्तर नही मिलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


जीवन कभी कठोर कठिन है, कभी सरल सा है,

भोजन अमृत-तुल्य कभी है, कभी गरल सा है,

माली बिना किसी उपवन में, फूल नही खिलता हैं।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


सावन मे भी कभी-कभी सूखा भी होता है,

खाना खाकर कभी, उदर भूखा भी होता है,

काँटे जिनकी करें सुरक्षा उनका तन नही छिलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।


नर्म-नर्म बिस्तर में, सुख की नींद नही आती है,

किन्तु श्रमिक को कंकड़ की ढेरी पर आ जाती है,

तप और श्रम से पत्थर का भी हृदय पिघलता है।

जब आती है हवा, तभी बूटा-पत्ता हिलता है।।

‘‘आओ तो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सब अंधियारे मिट जायेंगे, आशा का दीप जलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

बागों में कोयल बोल रही,
मिश्री कानों में घोल रही,
हम साज बजाने आयेंगे, तुम अभिनव राग सुनाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

क्यों नील गगन को ताक रहे,
चितवन से क्यों हो झाँक रहे,
हम मर कर भी जी जायेंगे, अमृत की बून्द पिलाओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

लहरों से कटते हैं कगार,
करते हो किसका इन्तजार,
हम चप्पू लेकर आयेंगे, तुम नौका बन कर आओ तो।
भँवरे गुन-गुन कर गायेंगे, गुलशन में फूल खिलाओ तो।।

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

‘‘जरा सी बात’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



जरा सी बात में ही युद्ध होते हैं बहुत भारी।

जरा सी बात में ही क्रुद्ध होते हैं धनुर्धारी।।

जरा सी बात ही माहौल में विष घोल देती है।

जरा सी जीभ ही कड़ुए वचन को बोल देती है।।

मगर हमको नही इसका कभी आभास होता है।

अभी जो घट रहा कल को वही इतिहास होता है।।

बुधवार, 1 जुलाई 2009

‘‘सुमन से मन का नाता जोड़ो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बालक हो या फूल, कभी भी नन्हा मन मत तोड़ो।

देखो, सूँघो खूब, सुमन से मन का नाता जोड़ो।।


नाजुक होता फूल और पंखुड़ियाँ भोली-भाली सी।

सबको आकर्षित करती है, इनकी गन्ध निराली सी।।


काँटों की गोदी में रहना, इनको बहुत सुहाता है।

कोमल शैया पा कर इनका, तन और मन मुरझाता है।।


शिशु को उसकी माता की, गोदी में ही रहने दो।

खिलने दो, मुस्काने दो, सर्दी-गर्मी को सहने दो।।

‘‘वि़द्यालय से नाता जोड़ो’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





सुस्ती, मस्ती, आलस छोडो़।

विद्यालय से नाता जोड़ो।


गरमी ने कितना झुलसाया।

अब बारिश का मौसम आया।।

पुस्तक, बस्ता, पेन सम्भालो।

छोटा छाता एक मँगा लो।।


नित्य-प्रति विद्यालय जाओ।

पढ़ने में मन खूब लगाओ।।


होम-वर्क करना मत भूलो।

फिर अपने झूले पर झूलो।।



लेबल

-अच्छा लगता है -एक गीत" -नाच रहा इंसान -बादल -सन्देश- :(नवीन जोशीःनवीन समाचार से साभार) :ताजमहल का सच :स्वर-अर्चना चावजी का !!रावण या रक्तबीज!! ''धान खेत में लहराते" 'आप' का अन्दाज़ बिल्कुल 'आप' सा 'गबन' और 'गोदान' 'सिफत' के लिए शुभाशीष ‘‘चम्पू छन्द’’ ‘‘बाल-गीत’’ ‘‘वन्दना’’ ‘‘हाइकू’’ ‘कुँवर कान्त’ ‘क्षणिका’ ‘ग़ज़लियात-ए-रूप’ ‘चन्दा और सूरज’ ‘भूख ‘रूप’ का इस्तेमाल मत करना ‘रूप’ की महताब ‘सुख का सूरज’ को पढ़ने का अनुभव " (सौंदर्य) Beauty by John Masefield" अनुवादक - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' " दुखद समाचार" मेरे पिताश्री श्रद्धेय घासीराम आर्य जी का देहावसान " रावण सारे राम हो गये "1975 में रची गयी मेरी एक पेशकश" "5 मार्च-मेरे पौत्र का जन्मदिवस" "अनोखा संस्मरण" "अपना वतन" "अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई का 193वाँ जन्मदिवस" "अमलतास खिलता मुस्काता" "आज से ब्लॉगिंग बन्द" (डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक') "आजादी का जश्न" "आजादी की वर्षगाँठ" "ईद मुबारक़" "उल्लू" "कुहरा पसरा है गुलशन में" "क्षणिका" "खटीमा का छोटी लाइन से बड़ी लाइन तक का ऐतिहासिक सफर" "खेतों में शहतूत उगाओ" "गधा हो गया है बे-चारा" "गिलहरी" "गोबर लिपे हुए घर" "चिड़िया रानी" "जग का आचार्य बनाना है" "जय विजय का अप्रैल-2018 का अंक" "जय विजय का नवम्बर-2020 का अंक" "जय विजय का सितम्बर-2019 का अंक" "जय विजय के अगस्त-2016 अंक में प्रकाशित" "जय विजय के दिसम्बर अंक में "जय-विजय "जय-विजय-जुलाईः2016" "जाड़े पर आ गयी जवानी "ज्येठ भ्राता सम मेरे बहनोई मा. रघुनन्दन प्रसाद" "टुकड़ा-Fragment' a poem by Amy Lowell" "टुकड़ा" (Fragment' a poem by Amy Lowell) "ढल गयी है उमर" "ताऊ डॉट इन पर 2009 में मेरा साक्षात्कार" "तेरह सितम्बर-ज्येष्ठ पुत्र का जन्मदिन" "दीपावली" "दो जून की रोटी" "दो फरवरी" छोटेपुत्र की वैवाहिक वर्षगाँठ "दोहा दंगल में मेरे दोहे" "नया-नवेला साल" "नववर्ष" "नूतन भारत के निर्माता पं. नेहरू को नमन" "पर्यावरण-दिवस" "पावन प्यार-दुलार" "पितृ दिवस पर विशेष" "पुस्तक दिवस" "पैंतालिसवीं वैवाहिक वर्षगाँठ" "प्राणों से प्यारा है अपना वतन" "बचपन" "बच्चों का संसार निराला" "बसन्त पञ्चमी" "भइया दूज का तिलक" "भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन" "भावावेग-कुन्दन कुमार" "मातृ दिवस" "मित्र अलबेला खत्री की 5वीं पुण्य तिथि पर" "मूरख दिवस" "मेरी पसन्द के पाँच दोहे" "मेरी मुहबोली बहन" "मौसम के अनुकूल बया ने "रूप की अंजुमन" से ग़ज़ल "रेफ लगाने की विधि और उसका उच्चारण" "लगा रहे हैं पहरों को" "विविध दोहावली" "विश्व रंग-मंच दिवस" "विश्व हिन्दीदिवस" "व्योम में घनश्याम क्यों छाया हुआ?" "शरीफों की नजाकत है" "श्री कृष्ण जन्माष्टमी" "सबका ऊँचा नाम करूँ" "सावन आया रे.... "साहित्य सुधा-अक्टूबर (प्रथम) में "सिसक रहे शहनाई में" "सीधा प्राणी गधा कहाता" "सीधी-सच्ची बात" "सुनानी पड़ेगी ग़ज़ल धीरे-धीरे" "हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे" "हमारा गणतन्त्र" "हमारे प्रधानमन्त्री मोदी जी का जन्मदिन" "हमीं पर वार करते हैं" “अरी कलम! तू कुछ तो लिख” “एहसास के गुंचे” “ग़ज़लियात-ए-रूप” तथा “स्मृति रपट “गुरुओं से सम्वाद” “नदी सरोवर झील” “प्रकाश स्तम्भ” “बीमार गुलाब:William Blake” “रूप” को मोम के पुतले घड़ी भर में बदलते हैं “रूप” सुखनवर तलाश करता हूँ “लौट चलें अब गाँव” “सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियाँ” “सम्वेदना की नम धरा पर” “हरेला” “हिन्दी व्यञ्जनावली-पवर्ग” “DEATH IS A FISHERMAN" BY BENJAMIN FRANKLIN (जय विजय (डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द') (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') ♥ फोटोफीचर ♥ 1111 13 सितम्बर 13 सितम्बर- नितिन तुमको हो मुबारक जन्मदिन 15वीं वर्षगाँठ १‍६००वीं पोस्ट 17-04-2015 (शुक्रवार) को प्रातः 10 बजे से यज्ञ (हवन) तत्पश्चात श्रद्धांंजलि 1800वीं पोस्ट 1901वाँ पुष्प 2000वीं पोस्ट 2016 2017 2017 में मेरा गीत प्रकाशित 2017 में मेरी बालकविता 2019 2019 में मेरी 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अपनी भाषा हिन्दी अपनी माटी गीत सुनाती अपनी मुरलिया बना तो अपनी मेहनत से मुकद्दर को बनाना चाहिए अपनी रक्षा का बहन अपनी वाणी मधुर बनाओ अपनी हिन्दी अपनीआजादी अपनीबात अपने छोटे से जीवन में अपने ज़माने याद आते हैं अपने पैर पसार चुका है अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन अपने मन को बहलाते हैं अपने वीर जवान अपने शब्दों में धार भरो अपने सढ़सठ साल अपने हिन्दुस्तान की अफजलगुरू अब आ जाओ कृष्ण-कन्हैया अब आँगन में वृक्ष अब इस ओमीक्रोन से अब कागा की काँव में अब कैसे सुधरें हाल सुनो अब गर्मी पर चढ़ी जवानी अब जगत के बन्धनों से मुक्त होना चाहता हूँ अब जम्मू-कश्मीर की ध्वस्त करो सरकार अब जूते के सामने अब झूठे सम्मान अब तक का लोखा जोखा अब तो करो प्रहार अब तो जम करके बरसो अब तो दुआ-सलाम अब तो युद्ध जरूरी है अब न कुठाराघात करो अब नीड़ बनाना है अब पढ़ना मजबूरी है अब पैंतालिस वर्ष अब बसन्त आने वाला है अब बसन्त आयेगा अब भी वीर सुभाष के अब मिट गया वजूद अब मेरे सिर पर नहीं अब हिन्दी की धूम अबकी बार दिवाली में अभिनय करते लोग अमन अमन का सन्देश अमन चाँदपुरी अमन हो गया गोल अमर बारती अमर भारती जिन्दाबाद अमर रहे साहित्य अमर रहेगा जगत में अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई की 159वीं पुण्यतिथि अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई के 185वें जन्मदिवस पर अमर वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई अमर वीरांगना लक्ष्मीबाई और श्रीमती इन्दिरा गांधी का जन्मदिवस अमरउजाला अमरभारती अमरभारती पहेली 100 के परिणाम अमरूद अमरूद गदराने लगे अमल-धवल होता नहीं अमलतास अमलतास का रूप अमलतास के झूमर अमलतास के पीले गजरे अमलतास के पीले झूमर अमलतास के फूल अमलतास खिलता-मुस्काता अमलतास तुम धन्य अमलतास राहत पहुँचाता अमिया अम्बेदकर जी का जन्मदिन अयोध्या पर फैसला अरमानों की डोली अर्चना चावजी अर्चना चावजी और रचनाबजाज अर्चना-रचना अर्चाना चावजी अर्द्धकुम्भ की धूम अलग-अलग हैं राग अलबेला खत्री जी को श्रद्धाजलि अलाव असली 'रूप' दिखाता दर्पण असार-संसार अस्तित्व अस्मत बचाना चाहिए अहंकार की हार अहसास अहोई अष्टमी अहोईअष्टमी आ गई गुलशन में फिर बहार आ गया नव वर्ष फिर से आ गया बसन्त. बसन्तपंचमी आ गयी दीपावली आ गये नेता नंगे आ गये फकीर हैं आ गये बादल आ जाओ अब कृष्ण-कन्हैया आ जाओ गोपाल आ भी आओ चन्द्रमा आ भी आओ चन्द्रमा तारों भरे आकाश में आ भी जाओ! आ हमारे साथ श्रम को ओढ़ ना आँखें आँखें कर देतीं इज़हार आँखें कुदरत का उपहार आँखें नश्वर देह का आँखों का उपहार आँखों का दर्पण आँखों के बिन जग सूना है आँखों में होती है भाषा आँचल में है दूध और आँसू आँसू औ’ मुस्कान आँसू का अस्तित्व आँसू की कथा-व्यथा आँसू यही बताते हैं आइना आई चौदस रूप की आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से लोहिड़ी लेकर नवल उमंग। आई फिर से होली आई बसन्त-बहार आई होली आई होली रे आओ अपना धर्म निभाएँ आओ गौतम बुद्ध आओ तिरंगा फहरायें आओ दीप जलायें हम आओ दूर करें अँधियारा आओ पेड़ लगायें हम आओ प्यार की बातें करें आओ मोहन प्यारे आओ आग के बिन धुँआ नहीं होता आग बरसती धरा पर आगत का स्वागत करने में आगरा आगे बढ़ना आसान नहीं आगे बढ़िए-आगे बढ़िए.... आचमन के बिना आचरण आचरण होता नहीं आचार की बातें करें आचार्य देवेन्द्र देव आज अहोई पर्व आज आदमी बौना है आज और कल का भेद आज करवाचौथ पर मन में हजारों चाह हैं आज का नेता आज कुछ उपहार दूँगा आज के परिवेश में आज खिले कल है मुरझाना आज तो मूर्ख भी दिवस है ना आज दिवस प्रस्ताव आज नदारद प्याज आज नीम की छाँव आज पुरवा-बयार आयी है आज फिर बारिश डराने आ गयी आज बरखा-बहार आयी है आज बहनों की हैं ये ही आराधना आज बहुत है शोक आज मेरे देश को सुभाष चाहिए आज रफायल बन गया आज विश्व हिन्दी दिवस आज शाखाएँ बहकी आज शिक्षक दिवस है आज सुखद संयोग आज सुखद-संयोग आज हम खेलें ऐसी होली आज हमारी खिलती बगिया आज हा-हा कार सा है आज हारी है अमावस आज हुई बरसात आज-कल आजाद भारत आजाद हिन्दुस्तान के नारे बदल गये आजादी आजादी अक्षुण्ण हमारी आजादी करती है आज सवाल आजादी का तन्त्र आजादी का तोहफा आजादी का पर्व आजादी का मन्त्र आजादी की वर्षगाँठ आजादी मुझको खलती है आठ दोहे आठ मार्च-आठ दोहे आड़ू आतंक को पाल रहा नापाक आतंकवाद आतंकी आती इन्दिरा याद आते हैं बदलाव आदत में अब चाय समायी आदत है हैवानों की आदमी का चमत्कार आदमी तो आज फिर से ताज पा गया आदमी से अच्छे जानवर आदमी ही बन गये हैं आदिदेव कर दीजिए बेड़ा भव से पार आधा "र्" का प्रयोग आधी आजादी आन-बान आने वाला है नया साल आने वाला है बसन्त आप सबको मुबारक नया वर्ष हो आपका एहतराम करते हैं आपके बिन मेरी होली सूनी है। आपदा आफत मचाने आ गयी आपस के सम्बन्ध आपस में तकरार आपस में मतभेद आपस में सुर मिलाना आपाधापी आफत की बरसात आफत के परकाले आभार आभारदर्शन आभासी दुनिया आभासी संसार आभासी संसार में आम आम और लीची आम और लीची का उदगम आम के वास्ते अब कहाँ तन्त्र है आम गया है हार आम दिलों में खास आम पिलपिले हो भले आम पेड़ पर लटक रहे हैं आम में ज़ायका नहीं आता आम हो गया खास का आम-नीम बौराये फिर से आमआदमी आमन्त्रण आया नया निखार आया नहीं सुराज आया पास किनारा आया फागुन मास आया बसन्त आया भादौ मास आया मधुमास आया राखी का त्यौहार आया है ऋतुराज आया है त्यौहार ईद का आया है त्यौहार तीज का आया हैं मधुमास आयी रेल आयी सावन तीज आयी है बरसात आयी है शिवरात आयी होली आयी होली-आयी होली आये सन्त कबीर आये हैं शैतान आयेगा इस बार भी नया-नवेला साल आरती आरती उतार लो आरती उतार लो आ गया बसन्त है आराधना आर्य समाज: बाबा नागार्जुन की दृष्टि में आलिंगन उपहार आलिंगन/चुम्बन दिवस आलिंगनदिवस आलू आलूबुखारा आलेख आलोकित परिवेश आल्हा आवश्यक सामान आवश्यक सूचना आवागमन आशा आशा का चमत्कार आशा का दीप जलाया क्यों आशा के दीप जलाओ तो आशा पर उपकार टिका है आशा शैली आशा है आशाएँ मुस्काती हैं आशाएँ विश्वास जगाती आशाओं पर प्यार टिका है आशियाना चाहिए आशीष का आशीष तुम्हें मैं देता आशु-कविता आसमान आसमान का छोर आसमान की झोली से... आसमान के दीप आसमान में आसमान में कुहरा छाया आसमान में छाये बादल आसमान में बादल छाया आस्था-विश्वास आह्वान इंसान बदलते देखे हैं इंसानियत का रूप इंसानी पौध उगाओ इंसानी भगवानों में इक मौन-निमन्त्रण तो दे दो इक शामियाना चाहिए इतनी मत मनमानी कर इतने न तुम ऐंठा करो इनकी किस्मत कौन सँवारे इन्तज़ार इन्दिरा गांधी इन्दिरा! भूलेंगे कैसे तेरो नाम इन्द्र बहादुर सेन इन्द्रधनुष का चौमासे में “रूप” हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष का रूप हमें दिखलाते हैं इन्द्रधनुष के रंग निराले इन्सानी भगवानों में इबादत इमदाद आयेगी इलज़ाम के पत्थर इल्म रहता पायदानों में इशारे समझना इस जीवन की शाम ढली इस धरा को रौशनी से जगमगायें इस नये साल में ईद ईद और तीज आ गई है हरियाली ईद का चाँद आया है ईद तीज आ गई है हरियाली ईद मनाई जाती है ईद मुबारक़ ईद-दिवाली-होली मिलकर ईमान बदलते देखे हैं ईवीएम में बन्द ईश्वर के आधीन उगता दिल में प्यार उगने लगे बबूल उग्रवाद-आतंक का उच्चारण की सबसे लोकप्रिय प्रविष्टि उच्चारण खामोश उजड़ गया है तम का डेरा उजड़ गया है नीड़ उज्जवल-धवल मयंक उड़ जायें जाने कब तोते उड़ता गर्द-गुबार उड़ता बग़ैर पंख के नादान आज तो उड़ती हुई पतंग उड़तीं हुई पतंग उड़नखटोला द्वार टिका है उड़नखटोला-यान उड़ान उड़ान में प्रकाशित उतना पानी दीजिए जितनी जग को प्यास उतना ही साहस पाया है उत्कर्षों के उच्च शिखर पर चढ़ते जाओ उत्तर अब माकूल उत्तराखण्ड उत्तराखण्ड का पर्व हरेला उत्तराखण्ड का स्थापना दिवस और संक्षिप्त इतिहास उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक धरोहर उत्तराखण्ड के कर्मठ मुख्यमन्त्री उत्तराखण्ड के पर्व हरेला पर विशेष उत्तराखण्ड राज्य स्थापनादिवस उत्तराखण्ड राज्य का स्थापना दिवस उत्तरायणी उत्तरायणी पर्व उत्तरायणी-मकर संक्रान्ति उत्तरायणी-लोहड़ी उत्सव ललित-ललाम उत्सव हैं उल्लास जगाते उद्धव की सरकार उन्मीलन पत्रिका में मेरा एक गीत उन्हें हम प्यार करते हैं उपन्यास सम्राट को उपमा में उपमान उपवन के फूल उपवन मुस्कायेगा उपवन में अब रंग उपवन में हरियाली छाई उपवन” का विमोचन उपसर्ग और प्रत्यय उपहार उपहार में मिले मामा-मामी उपासना में वासना उमड़-घुमड़ कर आये बादल उमड़ा झूठा प्यार उमड़ी पर्वत से जल धारा उम्मीद मत करना उम्र छियासठ साल हो गयी उलझ गया है ताना-बाना उलझ गये हैं तार उलझ रहे हैं तार उलझा है ताना-बाना उलझे हुए सवाल उलझे हुए सवालों में उल्फत के ठिकाने खो गये हैं उल्लास का उत्तरायणी पर्व उल्लू और गदहे उल्लू का आतंक उल्लू की परवाज उल्लू की है जात उल्लू जी का भूत उसका होता राम सा उसूल नापता रहा उसूल बाँटता रहा ऋतुएँ तो हैं आनी जानी ऋतुराज ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता ऋषियों की सन्तान ऋषियों की हम सन्ताने हैं ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को श्रद्धाञ्जलि एक अशआर एक कविता और एक संस्मरण एक गीत एक गीत-एक कविता एक दिन तो मचल जायेंगे एक दोहा एक ग़ज़ल. झाड़ू की तगड़ी मार एक दोहा और गीत एक नज़्म एक निवेदन एक पुराना गीत एक बालकविता एक मुक्तक एक मुक्तक पाँच दोहे एक रचना एक रहो और नेक रहो एक समय का कीजिए दिन में अब उपवास एक समान विधान से एक हजार एक-विचार एककविता एकगीत एकगीत एकता की धुन बजायें एकल कवितापाठ एकाकीपन एतबार अपने पे कम हैं एतिहासिक विवरण एप्रिलफूल एमिली डिकिंसन एमीलोवेल एला और लवंग एला व्हीलर विलकॉक्स एसी-कूलर फेल ऐ दुलारे वतन ऐतिहासिकआलेख ऐसा करो उपाय ऐसे घर-आँगन देखे हैं ऐसे पुत्र भगवान किसी को न दें ऐसे होगा देश महान ओ जालिम-गुस्ताख ओ बन्दर मामा ओ मेरे मनमीत ओटन लगे कपास ओम् जय शिक्षा दाता ओले ओलों की बरसात ओसामा और अब कितना चलूँगा...? और न अब हिमपात करो कंकड़ और कबाड़ कंकरीट की ठाँव में कंकरीटों ने मिटा डाला चमन कंचन सा रूप कंजूस मधुमक्खी कंस आज घनश्याम हो गये ककड़ी ककड़ी खाने को करता मन ककड़ी बिकतीं फड़-ठेलों पर ककड़ी मौसम का फल अनुपम ककड़ी लम्बी हरी मुलायम ककड़ी-खीरा खरबूजा है कट्टरपन्थी जिन्न कठमुल्लाओं की कटी कठिन झेलना शीत कठिन बुढ़ापा बीमारी है कठिन बुढ़ापा होता है कठिन हो गया आज गुज़ारा कड़ाके की सरदी में ठिठुरा बदन है कड़ी धूप को सहते हैं कड़ुए दोहे कथा कथानक क़दम क़दम पर घास कदम बड़ायेंगे कदम मिला कर चल रहा जीवनसाथी साथ कदम-कदम पर घास कनकइया की डोर तुम्हारे हाथो में कनिष्ठ पुत्र विनीत का जन्मदिन कनेर मुस्काया है कपड़े का पंडाल कब चमकेंगें नभ में तारे कब तक तुम सन्ताप भरोगे? कब तक मौन रहोगे कब बरसेंगे बादल काले कबूतर का घोंसला कभी आकाश में बादल घने हैं कभी उम्मीद मत करना कभी कुहरा कभी न उल्लू तुम कहलाना कभी न करना भंग कभी न करना माफ कभी न टूटे मित्रता कभी भी लाचार हमको मत समझना कभी सूरज कमल कमल के बिन सरोवर पर कमल पसरे है कमल पसरे हैं कमा रहे हैं माल कम्प्यूटर कम्प्यूटर और इंटरनेट कम्प्यूटर और इण्टरनेट कम्प्यूटर और जालजगत कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी कम्बल-लोई और कोट से कर दिया क्या आपने कर दो काम तमाम कर दो दूर गुरूर कर लेना कुछ गौर कर लो सच्चा प्यार करके विष का पान करगिल विजय दिवस करता हूँ मैं ध्यान करते दिल पर वार करते श्रम की बात करना ऐसा प्यार करना पूरी मात करना भूल सुधार करना मत कुहराम करना मत दुष्कर्म करना मत हठयोग करना राह तलाश करना सब मतदान करनी-भरनी. काठी का दर्द करने को कल्याण करने बवाल निकले करने मलाल निकले करवा पूजन की कथा करवाचौछ करवाचौथ करवाचौथ पर करें सितम्बर मास में करो आज शृंगार करो तनिक अभ्यास करो पाक को ढेर करो भोज स्वीकार करो मदद हे नाथ करो मेल की बात करो रक्त का दान करो शहादत याद करो सतत् अभ्यास करो साक्षर देश कर्तव्य और अधिकार कर्म हुए बाधित्य कर्मनाशा कर्मों का ताबीज कल की बातें छोड़ो कल हो जाता आज पुराना कल-कल कल-कल शब्द निनाद कलम मचल जाया करती है क़लम मचल जाया करती है कल़मकार लिए बैठा हूँ कलयुग तुम्हें पुकारता कलयुग में इंसान कलेण्डर ही तो बदला कल्पनाएँ निर्मूल हो गईं कल्पित कविराज कवर्ग कवायद कौन करता है कवि कवि और कविता कवि लिखने से डरता हूँ कविगोष्ठी कविता कविता का आकार कविता का आथार कविता का आधार कविता का संयोग कविता को अब तुम्हीं बाँधना कविता क्या है? कविताओँ का मर्म कविता् कवित्त कविधर्म कवियों के लिए कुछ जानकारियाँ कव्वाली कष्ट उठाना पड़ता है कसाब कसाब को फाँसी कह राम और रहीम कहते लोग रसाल कहनेभर को रह गया अपना देश महान कहलाना प्रणवीर कहा कीजिए कहाँ खो गई मीठी-मीठी इन्सानों की बोली कहाँ गयी केशर क्यारी? कहाँ जायें बताओ पाप धोने के लिए कहाँ रहा जनतन्त्र कहाँ है आचरण कहानी कहीं आकाश में बादल घने हैं कहीं है हरा कहें मुबारक ईद कहें सुखी परिवार कहो मुबारक ईद काँटे और गुलाब काँटे और सुमन काँटे बुहार लेना काँटों ने उलझाया मुझको काँधे पर हल धरे किसान काँप रही है थर-थर काया काँव-काँव कौआ चिल्लाया। काँव-काँवकर चिल्लाया है कौआ काँवड़ का व्यतिरेक काक-चेष्टा को अपनाओ कागज की नाव काग़ज़ की नाव कागज की है नाव काठ की हाँडी चढ़ेगी कब तलक काठी का दर्द काने करते राज काम अपना तमाम करते हैं काम कलम का बोलता काम न करना बन्द काम-आराम कामी आते पास कामी और कुसन्त कामुकता का दौर कायदे से धूप अब खिलने लगी है। कार यात्रा कार हमारी हमको भाती कारवाँ कारा उम्र तमाम कारा में सच्चाई बन्द है कार्टूननिस्ट-मयंक खटीमा कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा-गंगा स्नान काल की रफ्तार को छलता रहा हूँ काला अक्षर भैंस बराबर कालातीत बसन्त काले अक्षर काले बादल काव्य (छन्दों) को जानिए काव्य का मर्म काव्यानुवाद काव्यानुवाद-पिता की आकांक्षाएँ.. काश्..कोई मसीहा आये कितना आज सुकून कितनी अच्छी लगती हैं कितनी मैली हो गयी गंगा जी की धार कितनी सुन्दर मेरी काया कितने बदल गये हैं बन्दे कितने सपने देखे मन में किन्तु शेष आस हैं किया बहुत उपकार किये श्राद्ध निष्पन्न किसको गीत सुनाती हो? किसको लुभायेंगे अब किसलय कहलाते हैं किसान किसान-जवान किसे अच्छी नहीं लगती किसे सुनायें गीत किस्मत में लिक्खे सितम हैं कीटनिकम्मे कीर्तिमान सब ध्वस्त कुंठित हुआ समाज कुगीत कुछ अभिनव उपहार कुछ उड़ी हुई पोस्ट कुछ उद्गार कुछ और ही है पेट में कुछ काँटे-कुछ फूल कुछ क्षणिकाएँ कुछ चित्र ‘‘हाइकू’’ में कुछ तो करो यकीन कुछ तो बात जरूरी होगी कुछ दोहे कुछ भी नहीं असली है कुछ भी नहीं सफेद कुछ मजदूरी होगी कुछ शब्दचित्र कुटिल न चलना चाल कुटिल नहीं होते कभी कुटिल-काँटे लड़ाई ठानते हैं कुटिलकाँटे कुटी बनायी नीम पर कुण्ठा कुण्ठा भरे विचार कुण्ठाओं ने डाला डेरा कुण्डलिया कुण्डलियाँ कुण्डलियाँ-चीयर्स बालाएँ कुदरत का उपहार अधूरा होता है कुदरत का कानून कुदरत का हर काज सुहाना लगता है कुदरत की करतूत कुदरत ने फल उपजाये हैं कुदरत ने सिंगार सजाया कुदरत से खिलवाड़ कुन्दन जैसा रूप कुन्दन सा है रूप कुमाऊं के ब्लॉग कुमुद कुम्भ कुम्भ की महिमा अपरम्पार कुर्ता होली खेलता कुर्बानी कुहका कुहरा कुहरा करता है मनमानी कुहरा चारों ओर कुहरा छँटने ही वाला है कुहरा छाया है कुहरा पसरा आज चमन में कुहरा पसरा है आँगन में कुहरे का है क्लेश कुहरे की फुहार कुहरे की मार कुहरे की सौगात कुहासे का आवरण कुहासे की चादर कु्ण्डलिया कूटनीति की बात कूड़ा-कचरा कूर्मा़ञ्चली कविता कूलर कूलर गर्मी हर लेता है कृपा करो अब मात कृषक कृष्ण सँवारो काज कृष्णचन्द्र अधिराज कृष्णचन्द्र गोपाल के बिना केवल कुनबावाद केवल यहाँ धनार्थ केवल हिन्दू वर्ष क्यों केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि केशव भार्गव "निर्दोष" की 8वीं पुण्यतिथि के अवसर पर केसर के फूल केसरिया का रंग कैद कैमरे में करो कैसी है ये आवाजाही कैसे अपना भजन करूँ मैं कैसे आज बचाऊँ कैसे आये स्वप्न सलोना? कैसे उतरें पार? कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं कैसे उलझन को सुलझाऊँ कैसे गुमसुम हो जाऊँ मैं कैसे जान बचाऊँ मैं कैसे देश-समाज का होगा बेड़ा पार कैसे नवअंकुर उपजाऊँ? कैसे नियमित यजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं कैसे नूतन सृजन करूँ मैं? कैसे पायें पार कैसे पौध उगाऊँ मैं कैसे प्यार करेगा? कैसे फूल खिलें उपवन में कैसे बचे यहाँ गौरय्या कैसे मन को सुमन करूँ मैं कैसे मन को सुमन करूँ मैं? कैसे मिलें रसाल कैसे मुलाकात होती कैसे लू से बदन बचाएँ? कैसे शब्द बचेंगे अपने कैसे साथ चलोगे मेरे? कैसे सेवा-भाव भरूँ कैसे होंगे पार कैसै आये बहार भला कॉफी कॉफी की चुस्की कॉफी की चुस्की ले लेना कॉफी की तासीर निराली कोई बात बने कोई भूला हुए मंजर कोई वादा-क़रार मत करना कोई सोपान नहीं कोटि-कोटि वन्दन तुम्हें कोमल बदन छिपाया है कोयल आयी मेरे घर में कोयल आयी है घर में कोयल का सुर कोयल गाये गान कोयल चहकी कोयल रोती है कानन में कोयलिया खामोश हो गई कोरोना कोरोना का दैत्य कोरोना की बाढ़ कोरोना की मार कोरोना के रोग से कोरोना के साथ कोरोना को हराना है कोरोना वायरस कोरोना से डर रहा सारा ही संसार कोरोना से सारे हारे कोशिश कौआ कौआ होता अच्छा मेहतर कौड़ी में नीलाम मुहब्बत कौन सुखी परिवार कौन सुने फरियाद कौन सुनेगा सरगम के सुर क्या है प्यार क्या है प्यार-रॉबर्ट लुई स्टीवेंसन क्या हो गया है क्या होता है प्यार क्यों देश ऐसा क्यों राम और रहमान मरा? क्यों होता है हुस्न छली क्यों? क्रिकेट विश्वकप झलकियाँ क्रिसमस का त्यौहार क्रिसमस का शुभकामनाएँ क्रिसमस की बधाई क्रिसमस-डे क्रिस्टिना रोसेट्टी की कविता क्रोध क्षणभंगुर हैं प्राण क्षणिका क्षणिका को भी जानिए क्षणिका क्या होती है? क्षणिकाएँ खंजर उठा लिया खटमल-मच्छर का भेद खटीमा खटीमा (उत्तराखण्ड) का पावर हाउस बह गया खटीमा का परिचय खटीमा में आयोजितपुस्तक विमोचन के कार्यक्रम की रपट खटीमा में आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन सम्पन्न खट्टे-मीठे और रसीले खतरे में आज सारे तटबन्ध हो गये हैं खतरे में तटबन्ध हो गये हैं खद्योत खद्योतों का निर्वाचन खबर छपी अखबारों मे ख़बरों की भरमार खर-पतवार उगी उपवन में खरगोश खरपतवार अनन्त खरबूजा खरबूजा-तरबूज खरबूजे खरबूजे का मौसम आया ख़ाक सड़कों की अभी तो छान लो खाता-बही है खादी खादी-खाकी खादी-खाकी की केंचुलियाँ खान-पान में शुद्धता खान-पान-परिधान विदेशी फिर भी हिन्दी वाले हैं खानदानों में खाने में सबको मिले रोटी-चावल-दाल ख़ार आखिर ख़ार है खार पर निखार है ख़ार से दामन बचाना चाहिए खारा पानी खारा-खारा पानी खारिज तीन तलाक खाली पन्नों को भरता हूँ खाली हुआ खजाना खास को होने लगी चिन्ता खास हो रहे मस्त खिल उठा है इन्हीं से हमारा चमन खिल उठे फिर से बगीचे में सुमन खिल जायेंगे नव सुमन खिल रहे फूल अब विषैले हैं खिलता फागुन आया खिलता सुमन गुलाब खिलता हुआ बसन्त खिलती बगिया है प्रतिपल खिलते हुए कमल पसरे हैं खिलने लगते फूल खिलने लगा सूखा चमन खिला कमल का फूल खिला कमल है आज खिली रूप की धूप खिली सुहानी धूप खिली हुई है डाली-डाली खिले कमल का फूल खिसक रहा आधार खीरा खुद को आभासी दुनिया में झोका खुद को करो पवित्र ख़ुदगर्ज़ी का हुआ ज़माना खुदा की मेहरबानी है खुद्दारों की खुद्दारी खुमानी खुलकर खिला पलाश खुलकर हँसा मयंक खुली आँखों का सपना खुली ढोल की पोल खुली बहस- खुलूस से खुश हो करके लोहड़ी खुश हो रहा बसन्त खुश हो रहे किसान खुशियों का परिवेश खुशियों की डोरी से नभ में अपनी पतंग उड़ाओ खुशियों से महके चौबारा खूब थिरकती है रंगोली खूबसूरत लग रहे नन्हें दिये खेत खेत उगलते गन्ध खेत घटते जा रहे हैं खेती का कानून खेतीहर-मजदूर खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है खेतों में झुकी हैं डालियाँ खेतों में शहतूत लगाओ खेतों में सोना बिखरा है खेलते होली मोहनलाल खेलो रंग खो गई इन्सानियत खो गया कहाँ संगीत-गीत खो चुके सब कुछ खोज रहे हैं शीतल छाया खोल दो मन की खिड़की खोलो तो मुख का वातायन ख़्वाब का ये रूप भी नायाब है ख़्वाब में वो सदा याद आते रहे गंगा गंगा का अस्तित्व बचाओ गंगा जी की धार गंगा पुरखों की है थाती गंगा बचाओ गंगा बहुत मनोहर है गंगा मइया गंगा स्नान गंगास्नान गंगास्नान मेला गंजे गगन में छा गये बादल गगन में मेघ हैं छाये गजल गज़ल ग़जल ग़ज़ल ग़जल "शरीफों के घरानों की" ग़ज़ल "ख़ानदानों ने दाँव खेलें हैं" ग़ज़ल "उल्लओं की पंचायतें लगीं थी" ग़ज़ल की परिभाषा ग़ज़ल के उद्गगार ग़ज़ल में फिर से रवानी आ गयी है ग़जल या गीत ग़ज़ल संग्रह ग़ज़ल हो गयी क्या गजल हो गयी पास ग़ज़ल-गुरूसहाय भटनागर बदनाम ग़ज़ल? ग़ज़ल. ईमान आज तो ग़ज़ल. खून पीना जानते हैं ग़ज़ल. जीवन में खुशियाँ लाते हैं ग़ज़ल. दो जून की रोटी ग़ज़ल. पत्थरों को गीत गाना आ गया है ग़ज़लगो स्वयम् को बताने लगे ग़ज़लनुमा कुछ अशआर गज़लिका ग़ज़लिया-ए-रूप से एक नज़्म ग़ज़लियात-ए-रूप ग़ज़लियात-ए-रूप से एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप से मेरी एक ग़ज़ल ग़ज़लियात-ए-रूप” की भूमिका गठबन्धन की नाव गढ़ता रोज कुम्हार गणतंत्र महान गणतन्त्र गणतन्त्र दिवस गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ गणतन्त्र दिवस पर राग यही दुहराया है गणतन्त्र पर्व पर गणतन्त्र महान गणतन्त्रदिवस गणनायक भगवान गणेश चतुर्थी पर विशेष गणेश वन्दना गणेशवन्दना गणेशोत्सव पर विशेष गणों का छन्दों में प्रयोग गणों की जानकारी गत गदहे गद्दार गद्दारी-मक्कारी गद्दारों को जूता गद्य-गीत गद्य-पद्य गद्यगीत गधा हो गया है बे-चारा गधे इस देश के गधे को बाप भी अपना समय पर वो बताते हैं। गधे बन गये अरबी घोड़े गधे हो गये आज गन्दे हैं हम लोग गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है गया अँधेरा-हुआ सवेरा गया दिवाकर हार गया पुरातन भूल गयी चाँदनी रात गयी बुराई हार? गयी मनुजता हार गये आचरण भूल गरम-गरम ही चाय गरमी का अब मौसम आया गरमी में जीना हुआ मुहाल गरमी में ठण्डक पहुँचाता मौसम नैनीताल का गरमी में तरबूज सुहाना गरिमा जीवन सार गरिमा दीपक पन्त गर्मी गर्मी आई खाओ बेल गर्मी के फल गर्मी को अब दूर भगाओ गर्मी में खीरा वरदान गर्मी में स्वेदकण गर्मी से तन-मन अकुलाता गली-गली में बिकते बेर गले न मिलना ईद गले पड़े हैं लोग गा रही दीपावली गाँधी का निर्वाण गांधी जी कहते हे राम! गाँधी जी का चित्र गांधी जी का जन्म दिवस गांधी हम शरमिन्दा हैं गांधीजयन्ती गाँव याद बहुत आते हैं गाँवों का निश्छल जीवन गाओ फिर से नया तराना गाता है ऋतुराज तराने गाना तो मजबूरी है गान्धी-लालबहुदुर जयन्ती गाय गाय-भैंस को पालना गायब अब हल-बैल गिजाई गिनते नहीं हो खामियाँ अपने कसूर पे गिरवीं बुद्धि-विवेक गिरवीं रखा जमाल गिरी जनक पर गाज गिलहरी गीत गीत "गाओ फिर से नया तराना" गीत और प्रीत का राग है ज़िन्द़गी गीत का व्याकरण गीत की परिभाषा के साथ मेरा एक गीत गीत को भी जानिए गीत गाना जानता है गीत गाने का ज़माना आ गया है गीत ढोंग-आडम्बर गीत न जबरन गाऊँगा गीत बन जाऊँगा गीत मेरा गीत सुनाती माटी गीत सुनाती माटी अपने गीत सुर में गुनगुनाओ तो सही गीत-ग़ज़लों का तराना गीत-छन्द लिखने का फैशन हुआ पुराना गीत? गीत. नाविक फँसा समन्दर में गीत. पुनः हरा नही हो सकता गीत. मतवाला गिरगिट रूप बदलता जाता है गीत. मेरे तीन पुराने गीत गीत. वीरों के बलिदान से गीतकार नीरज तुम्हें गीतिका गीतिका छन्द गीतिका. आजादी की वर्षगाँठ गीदड़ और विडाल गुझिया-बरफी गुनगुनाओ तो सही गुब्बारे गुरु नानक का जन्मदिन गुरु नानक जयन्ती गुरु पूर्णिमा गुरु वन्दना गुरुओं का ज्ञान गुरुओं का दिन गुरुकुल में हम साथ पढ़े गुरुदेव का वन्दन गुरुवर का सम्मान गुरू ज्योति का पुंज गुरू पूर्णिमा गुरू पूर्णिमा-गंगा स्नान गुरू वन्दना गुरू सहाय भटनागर गुरू सहाय भटनागर नहीं रहे गुरू-शिष्य गुरूकुल गुरूदक्षिणा गुरूदेव का ध्यान गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब गुरूनानक का दरबार गुरूपूर्णिमा गुरूवन्दना गुरूसहाय भटनागर बदनाम गुरूसहाय भटनागार गुर्गे देते बाँग गुलमोहर गुलमोहर का रूप गुलमोहर का रूप सबको भा रहा गुलमोहर खिलने लगा गुलमोहर लुभाता है गुलशन बदल रहा है गुलाब दिवस गुलामी बेहतर थी गुलाल-अबीर गूँगी गुड़िया आज गूँगे और बहरे हैं गूँज रहा उद्घोष गूँज रहे सन्देश गूगल-फेसबुक गेहूँ गेहूँ करते नृत्य गैस सिलेण्डर गैस सिलेण्डर है वरदान गोबर की ही खाद गोबर लिपे हुए घर-आँगन नहीं रहे गोमुख से सागर तक जाती गोरा-चिट्टा कितना अच्छा गोरी का शृंगार गोल-गोल है दुनिया सारी गोवर्धन गोवर्धन पूजा गोवर्धन पूजा करो गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामना गोवर्धनपूजा और भइयादूज की शुभकामनाएँ गोविन्दसिंह कुंजवाल गौमाता भूखी मरे गौमाता से प्रीत गौरय्या गौरय्या का गाँव गौरय्या का नीड़ चील-कौओं ने हथियाया है गौरय्या के गाँव में गौरव और गुमान की गौरव का आभास गौरी और गणेश गौरैया का गाँव में पड़ने लगा अकाल गौरैया ने घर बनाया ग्यारह दोहे ग्राम्यजीवन ग्रीष्म ग्वाले हैं भयभीत घटते जंगल-खेत घटते वन-बढ़ता प्रदूषण घनाक्षरी घनाक्षरी गीत घर की रौनक घर भर का अभिमान बेटियाँ घर में कभी न लायें हम घर में पढ़ो नमाज घर में पानी घर में बहुत अभाव घर सब बनाना जानते हैं घातक मलय समीर घास घिर-घिर बादल आये घिर-घिर बादल आये रे घुटता गला सुवास का घूम रहा है चक्र घोंसला हुआ सुनसान आज तो घोटालों पर घोटाले घोड़ों से भी कीमती घोर संक्रमित काल में मुँह पर ढको नकाब चंचल “रूप” सँवारा चंचल चितवन नैन चंचल सुमन चकरपुर चक्र है आवागमन का चक्र है आवागमन का। चढ़ा केजरी रंग चढ़ा हुआ बुखार है चतुर्दशी का पर्व चदरिया अब तो पुरानी हो गयी चना-परमल चन्दा कितना चमक रहा है चन्दा देता है विश्राम चन्दा मामा-सबका मामा चन्दा से मुझको मोह नहीं चन्दा-सूरज चन्द्र मिशन चन्द्रमा सा रूप मेरा चमकती न बिजली न बरसात होती चमकेगा फिर से गगन-भाल चमचों की महिमा चमत्कार चमन का सिंगार करना चाहिए चमन की तलाश में चमन हुआ गुलजार चम्पावत जिले की सुरम्य वादियाँ चम्पू काव्य चरित्र चरित्र पर बाइस दोहे चरैवेति का मन्त्र चरैवेति की सीख चरैवेति-मेरा एक गीत चलके आती नही चलता खूब प्रपञ्च चलता जाता चक्र निरन्तर चलते बने फकीर चलना कछुआ चाल चलना कभी न वक्र चलना सीधी चाल। चलने से कम दूरी होगी चला दिया है तीर चला है दौर ये कैसा चली झूठ की नाव चली बजट की नाव चले आये भँवरे चले थामने लहरों को चलो दीपक जलाएँ हम चलो भीगें फुहारों में चलो होली खेलेंगे चवन्नी चहक रहे घर द्वार चहक रहे हैं उपवन में चहक रहे हैं रंग चहक रहे हैं वन-उपवन में चहकता-महकता चमन चहका है मधुमास चहके गंगा-घाट चहके प्यारी सोन चिरैया चाँद बने बैठे चेले हैं चाँद-तारों की बात करते हैं चाँद-सूरज चाँदनी का हमें “रूप” छलता रहा चाँदनी रात चाँदनी रात बहुत दूर गई चाँदी की संगत चाचा नेहरू को शत्-शत् नमन चाचा नेहरू तुम्हें नमन चाटुकार सरदार हो गये चापलूस बैंगन चाय चाय हमारे मन को भाई चार कुण्डलियाँ चार चरण-दो पंक्तियाँ चार दोहे चार फुटकर छन्द चारों ओर बसन्त हुआ चारों ओर भरा है पानी चालबाजी चाहत कभी न पूरी होगी चिंकू तो है शाकाहारी चिंकू ने आनन्द मनाया चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे चिट्ठी-पत्री का युग बीता चिड़िया चिड़ियारानी चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज चित्रकारिता दिवस चित्रग़ज़ल चित्रपट चित्रावली चित्रोक्ति चिन्तन चिन्तन-मन्थन चीत्कार पसरा है सुर में चीनी लड़ियाँ-झालर अपने चुगलखोर चुनना नहीं आता चुनाव चुनाव लड़ना बस की बात नहीं चुनावी कानून में बदलाव की जरूरत चुम्बन का व्यापार चुम्बन दिवस चुम्बन दिवस की शुभकामनाएँ चुम्बनदिवस चुरा रहे जो भाव चूनरी तो तार-तार हो गई चूहों की सरकार में बिल्ले चौकीदार चेतावनी चेहरा चमक उठा चेहल्लुम का जुलूस चैतन्य की हिन्दी की टेक्सटबुक (अंकुर हिन्दी पाठमाला) चॉकलेट देकर नहीं चॉकलेट देकर नहीं उगता दिल में प्यार चॉकलेट-डे चोदहदोहे चोर पुराण चोरों से कैसे करें अपना यहाँ बचाव चोरों से भरपूर है आभासी संसार चौकस चौकीदार चौदह जनवरी-चौदह दोहे चौदह दिन के ही लिए हिन्दी से है प्यार चौदह दोहे चौदह फरवरी चौदह सितम्बर को समर्पित चौदह दोहे चौदह सितम्बर-चौदह दोहे चौपाई चौपाई के बारे में भी जानिए चौपाई लिखना सीखिए चौपाई लिखिए चौमासा बारिश से होता चौमासे का रूप चौमासे ने अलख जगाई छँट गये बादल हुआ निर्मल गगन छंदहीनता छटा अनोखी अपने नैनीताल की छठ का है त्यौहार छठ पूजा छठ माँ का उद्घोष छठ माँ हरो विकार छठपूजा छठपूजा त्यौहार छन्द और मुक्तक छन्द क्या होता है? छन्द हो गये क्ल्ष्टि छन्दशास्त्र छन्दों का विज्ञान छन्दों के विषय में जानकारी छल-छल करती गंगा छल-छल करती धारा छल-फरेब के गीत छल-बल की पतवार छाई हुई उमंग छाई है बसन्त की लाली छाता छाते छाप रहे अखबार छाया का उपहार छाया चारों ओर उजाला छाया देने वाले छाते छाया बहुत अन्धेरा है छाया भारी शोक छाया है उल्लास छाये हुए हैं ख़यालात में छिन जाते हैं ताज छीनी है हिन्दी की बिन्दी छुक-छुक करती आती रेल छुट्टी दे दो अब श्रीमान छुहारे-किशमिश छूट गया है साथ छोटी-छोटी बात पर छोटे पुत्र विनीत का छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिन छोटे पुत्र विनीत का जन्मदिवस छोटों को सम्बल दिया लिया बड़ों से ज्ञान छोड़ विदेशी ढंग छोड़ा पूजा-जाप छोड़ा मधुर तराना जंग ज़िन्दगी की जारी है जंगल का कानून जंगल की चूनर धानी है जंगल के शृंगाल सुनो जंगलों के जानवर जंगी यान रफेल जकड़ा हुआ है आदमी जग उसको पहचान न पाता जग का आचार्य बनाना है जग के झंझावातों में जग के नियम-विधान जग को लुभा गये हैं जग में अन्तरजाल जग में ऊँचा नाम जग में केवल योग जग में माँ का नाम जग में सबसे न्यारा मामा जग है एक मुसाफिरखाना जगत है जीवन-मरण का जगदम्बा माँ आपकी जगमग सजी दिवाली जगह-जगह मतदान जड़े न बदलें पेड़ जन-गण का विश्वास जन-गण का सन्देश जन-गण रहे पछाड़ जन-जागरण जन-जीवन बेहाल जन-मानस बदहाल जन.2017 में मेरा गीत जनता का जनतन्त्र जनता का तन्त्र कहाँ है जनता का धीरज डोल रहा जनता जपती मन्त्र जनता है कंगाल जनमानस के अन्तस में आशाएँ मुस्काती हैं जनमानस लाचार जनवरी-2017 जनसेवक खाते हैं काजू जनसेवक लाचार जनहित के कानून को जन्म दिन जन्म दिन मेरी श्रीमती जन्म दिवस जन्मदिन जन्मदिन की दे रहे हैं सब बधायी जन्मदिन पर रूप मुझको भा गया है जन्मदिन फिर आज आया जन्मदिन है आज मेरा जन्मदिवस जन्मदिवस की बेला पर जन्मदिवस चाचा नेहरू का जन्मदिवस चाचा नेहरू का भूल न जाना जन्मदिवस पर विशेष जन्मदिवस विशेष जन्मदिवस विशेष) जन्मदिवस है आज जन्मभूमि में राम जन्माष्टमी जन्मे थे धनवन्तरी जब खारे आँसू आते हैं जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार जब मन में हो चाह जब-जब मक्कारी फलती है जमा न ज्यादा दाम करें जमाना बहुत बदल गया जय बोलो नन्दलाल की जय माता की कहने वालो जय विजय जय विजय 2019 में मेरी बालकविता जय विजय अगस्त-2019 जय विजय के फरवरी जय विजय जुलाई-2018 जय विजय जून जय विजय पत्रिका में मेरा गीत जय विजय पत्रिका में मेरी बालकविता जय विजय मई जय विजय मासिक पत्रिका के नवम्बर-2016 अंक में मेरी ग़ज़ल जय विजय में मेरी बाल कविता जय विजय-अप्रैलः2020 जय शिक्षा दाता जय सिंह आशावत जय हिन्दी-जय नागरी जय हो देव महेश जय हो देव सुरेश जय-जय गणपतिदेव जय-जय जगन्नाथ भगवान जय-जय जय वरदानी माता जय-जय-जय गणपति महाराजा जय-जवान और जय-किसान जय-विजय जय-विजय अगस्त जय-विजय पत्रिका जय-विजय पत्रिका में मेरा गीत जय-विजय पत्रिका अक्टूबर-2016 में मेरी ग़ज़ल प्रकाशित जयविजय जयविजय नवम्बर 2018 जयविजय मई-15 जयविजय में मेरी ग़ज़ल जयविजय-जून जरी-सूत या जूट के धागे हैं अनमोल जरूरी है जल का स्रोत अपार कहाँ है जल जीवन की आस जल दिवस जल बिना बदरंग कितने जल बिना बेरंग कितने जल रहा च़िराग है जलद जल धाम ले आये जलधारा जलमग्न खटीमा जहरीला पेड़:A Poison Tree जाँच-परख कर मीत जागरण जागा दयानन्द का ज्ञान जागेगा इंसान जाति-धर्म के मन्त्र जातिवाद में बँट गये जादू-टोने जान बिस्मिल हुई जानिए मेरे खटीमा को भी जाने वाला साल जाम जाम ढलने लगे ज़ारत जालजगत जालजगत की शाला है ज़ालिमों से पुकार मत करना जिजीविषा जितना चाहूँ भूलना उतनी आती याद जितने ज्यादा आघात मिले जिनके पास जमीर ज़िन्दगी ज़िन्दग़ी अब नरक बन गयी है ज़िन्दगी इक खूबसूरत ख़्वाब है जिन्दगी का सफर निराला है ज़िन्दग़ी का सहारा ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा ज़िन्दग़ी के तीन मुक्तक ज़िन्दग़ी के लिए जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है ज़िन्दग़ी भर उन्हें आज़माते रहे जिन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दगी भर सलामत रहो साजना ज़िन्दग़ी में न ज़लज़ले होते जिन्दगी में प्यार-Life in a Love ज़िन्दग़ी सस्ती हुई जिन्दगी है बस अधूरी ज़िन्दग़ी जिन्दा उसूल हैं ज़िन्दादिली जिन्दादिली का प्रमाण दो जियो ज़िन्दगी को जिसमें पुत्रों के लिए होते हैं उपवास जी रहा अब भी हमारे गाँव में जीत का आचरण जीते-जी की माया जीना पड़ेगा कोरोना के साथ जीना-मरना सदा से जीने का अंदाज जीने का अन्दाज़ जीने का अन्दाज़ निराला जीने का आधार हो गया जीने का ढंग जीव सभी अल्पज्ञ जीवन जीवन आशातीत हो गया जीवन का गीत जीवन का चक्र जीवन का ताना-बाना जीवन का भावार्थ जीवन का विज्ञान जीवन का संकट गहराया जीवन का है मर्म जीवन किताबी हो गया जीवन की अब शाम हो गई जीवन की आपाधापी में जीवन की ये नाव जीवन की है भोर तुम्हारे हाथों में जीवन के आधार जीवन के हैं खेल जीवन के हैं ढंग निराले जीवन को हँसी-खेल समझना न परिन्दों जीवन जटिल जलेबी जैसा जीवन जीना है दूभर जीवन तो बहुत जरा सा है जीवन दर्शन समझाया जीवन पतँग समान जीवन बगिया चहके-महके जीवन में अभिसार जीवन में सन्तुष्ट जीवन में है मित्रता जीवन ललित-ललाम जीवन श्रम के लिए बना है जीवन है बदहाल जीवन है बेहाल जीवनचक्र जीवनयात्रा जीवित देवी-देवता दुनिया में माँ-बाप जीवित रहती घास जीवित हुआ पराग जीवित हुआ बसन्त जुलाईः18 जुल्म के आगे न झुकेंगे जुल्म झोंपड़ी पर ढाया जूझ रहा है देश जूती-टोपी बनी सहेली जूतों की बौछार जून-2109 जेठ लग रहा है चौमासा जैविकपिता जो नंगापन ढके बदन का हमको वो परिधान चाहिए जोकर जोकर खूब हँसाये जोकर-बौने ज्ञान का तुम ही भण्डार हो ज्ञान का प्रसाद लो ज्ञान की अमावस ज्ञान न कोई दान ज्ञान हुआ विकलांग ज्ञानी भी मूरख बनें ज्यादा दाद मिला करती है ज्यादा दोहाखोर ज्यादातर तो कट गयी ज्येष्ठ पुत्र का जन्मदिन ज्येष्ठ पुत्र नितिन का जन्मदिन ज्येष्ठ पूर्णिमा झंझावात बहुत गहरे हैं झंझावातों में झटका और हलाल झण्डे रहे सँभाल झनकइया मेला गंगास्नान झनकइया-खटीमा झरता हुआ प्रपात झरने करते शोर झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की 160वीं पुण्यतिथि पर विशेष झाँसी की रानी झाड़ुएँ सवाँर लो झालर-बन्दनवार झुक गयी है कमर झुकेगी कमर धीरे-धीरे झूठ की तकरीर बच गयी झूठ जायेगा हार झूमर से लहराते हैं झूमर से सोने के गहने झूल रही हैं ममता-माया झूला झूले कैसे पड़ें बाग में? झेल रहा है देश झेलना जरूरी है टाबर टोली टिप्पणियाँ टिप्पणी और पसन्द टिप्पणी पोस्ट टुकड़ा-एमी लोवेल टूटा कुनबेवाद से टूटी-फूटी रोमन-हिन्दी टॉम-फिरंगी टॉम-फिरंगी प्यारे-प्यारे टोपी टोपी हिन्दुस्तान की टोपी है बलिदान की ठलवे-जलवे ठहर गया जन-जीवन ठिठुर रहा है गात ठिठुर रही है सबकी काया ठिठुरा बदन है ठिठुरा सकल समाज ठेंगा न सूरज को दिखाना चाहिए ठेले पर बिकते हैं बेर ठोकरें खाकर सँभलना सीखिए डमरू का अब नाद सुनाओ डरता हूँ डरा और धमका रहा कोतवाल को चोर डरा रहा देश को है करोना डूबे गोताखोर डॉ. गंगाधर राय डॉ. महेन्द्र प्रताप पाण्डेय 'नन्द' डॉ. राजविन्दर कौर डॉ. सारिका मुकेश डॉ. सुभाष वर्मा डॉ. हरि 'फैजाबादी' डॉ.धर्मवीर डॉ.राष्ट्रबन्धु डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ डॉक्टर गोपेश मोहन जैसवाल डोल रहा ईमान डोलियाँ सजने लगीं ढंग निराले होते जग में मिले जुले परिवार के ढंग हमारे बदल गये ढकी ढोल की पोल ढल गयी है उमर ढाई आखर नही व्याकरण चाहिए ढाईआखर ढुल-मुल नहीं उसूल ढोंग और षड़यन्त्र ढोंग-आडम्बर ढोंगी और कुसन्त ढोंगी साधू ढोलकी का सुर नगाड़ा हो गया तंज करने से बिगड़ती बात हैं तजना नहीं उमंग तजो पश्चिमी रीत तन्त्र अब खटक रहा है तन्त्र ये खटक रहा है तपते रेगिस्तानों में तब मैने माँ तुम्हें पुकारा तब-तब मैं पागल होता हूँ तबाही के कुछ ताजा चित्र तमन्नाओं की लहरे हैं तम्बाकू दो त्याग तम्बाकू को त्याग दो तम्बाकू दो छोड़ तम्बाकू निषेध दिवस तम्बाकू निषेध दिवस पर सन्देश तरबूज तरस रहा माँ-बाप की तवर्ग ताजमहल का सच ताजमहल की हकीकत ताल-लय उदास हैं तालाबों की पंक तिगड़ी की खिचड़ी तिज़ारत तिज़ारत में सियासत है तिजारत ही तिजारत है तितली तितली आई! तितली आई!! तितली करती नृत्य तितली है फूलों से मिलती तिनका-तिनका दोहा संग्रह तिनके चुन-चुन लाती हैं तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा तिलक दूज का कर रहीं तीज आ गई है हरियाली तीजो का आया त्यौहार चलो झूला झूलेंगे तीजो का त्यौहार तीन अध्याय तीन तलाक तीन दिनों से भार बारिश तीन मिसरी शायरी (तिरोहे) तीन मुक्तक तीन साल का लेखा जोखा तीन-लाइना तीस सितम्बर तुकबन्दी तुकबन्दी को ही अपनाओ तुकबन्दी मादक-उन्मादी तुकबन्दी से खिलता उपवन तुम पंखुरिया फैलाओ तो तुम साथ क्या निभाओगे? तुम हो दुर्गा रूप तुमने सबका काज सँवारा तुमसे ही मेरा घर-घर है तुमसे ही है दुनियादारी तुम्हारे चरण-रज का कण चाहता हूँ तुम्हारे हाथों में तुम्ही मेरी आराधना तुम्हीं ज्ञान का पुंज तुम्हीं साधना-तुम ही साधन तुलसी का पौधा गुणकारी तुलसी का बिरुआ गुणकारी तुलसीदास तुहिन-हिम नभ से अचानक धरा पर झड़ने लगा तू माँ का वरदान ना पाये तू से आप और सर तूफानों से लड़ने में तेजपाल का तेज तेरह दोहे तेरह सितम्बर तेल कान में डाला क्यों? तेल-लकड़ी तेवर नहीं अब वो रहे तो कोई बात बने तोंद झूठ की बढ़ी हुई है तोता तोल-तोलकर बोल त्योहारों की रीत त्यौहार त्यौहारों की गठरी त्यौहारों पर किसी का खाली रहे न हाथ थक जायेगी नयी रीत फिर थम जाये घुसपैंठ थमे हुए जल में सदा बन जाते शैवाल थर-थर काँपे देह थाली के बैंगन थीम चुराई मेरी थोड़ी है अवशेष थोड़े दिन का प्यार थोड़े दोहाकार है दंगों का है जोर दबा सुरीला कोकिल का सुर दबी हुई कस्तूरी होगी दम घुटता है आज चमन में दम घुटता है आज वतन में दमक उठा है रूप भी’ दया करो हे दुर्गा माता दयानन्द पाण्डेय दरबान बदलते देखे हैं दरवाजे की दस्तक दर्द का मरहम दर्द का सिलसिला दिया तुमने दर्द की छाँव में मुस्कराते रहे दर्द दिल में जगा दिया उसने दर्पण असली 'रूप' दिखाता दर्पण काला-काला क्यों दर्पण में तसबीर दलबदलू दशहरा दशहरा पर दस दोहे दस दोहे दहे दहेज दाढ़ी में है चोर दादी अम्मा दादी जी! प्रसाद दे दो ना दाम नहीं है पास दामिनी काण्ड की बरसी दामिनी को भावभीनी श्रद्धांजलि दिखने लगा उजाड़ दिखायी तो नहीं जाती दिखावा हटाओ दिन आ गये हैं प्यार के दिन में छाया अँधियारा दिन में सितारों को बुलाते हो दिन है कितना खास दिन है देवोत्थान का व्रत-पूजन का खास दिन हैं अब नजदीक दिनकर है भयभीत दिनांक 27-04-2016 दिया तिरंगा गाड़ दिल दिल की आग दिल की बात दिल की बेकरारी दिल की लगी क्या चीज़ है दिल के करीब और दिल से दूर दिल को बेईमान न कर दिल तो है मतवाला गिरगिट दिल में इक दीप जलाकर देखो दिल-ए-ज़ज़्बात