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शुक्रवार, 31 मई 2019

दोहे "तम्बाकू दो छोड़" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गघे नहीं खाते जिसे, तम्बाकू वो चीज।
खान-पान की मनुज को, बिल्कुल नहीं तमीज।।
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रोग कैंसर का लगे, समझ रहे हैं लोग।
फिर भी करते जा रहे, तम्बाकू उपयोग।।
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खैनी-गुटका-पान का, है हर जगह रिवाज।
गाँजा, भाँग-शराब का, चलन बढ़ गया आज।।
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तम्बाकू को त्याग दो, होगा बदन निरोग।
जीवन में अपनाइए, भोग छोड़कर योग।।
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पूरब वालो छोड़ दो, पश्चिम की सब रीत।
बँधा हुआ सुर-ताल से, पूरब का संगीत।।
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खोलो पृष्ठ अतीत के, आयुध के संधान।
सारी दुनिया को दिया, भारत ने विज्ञान।।
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जगतगुरू यह देश था, देता जग को ज्ञान।
आज नशे की नींद में, सोया चादर तान।।

गुरुवार, 30 मई 2019

कविता "कड़ी धूप को सहते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तपती हुई दुपहरी में, झूमर जैसे लहराते हैं।
कंचन जैसा रूप दिखाते, अमलतास भा जाते हैं।।
जब सूरज झुलसाता तन को, आग बरसती है भूपर।
ये छाया को सरसाते हैं, आकुल राही के ऊपर।।

स्टेशन और सड़क किनारे, कड़ी धूप को सहते हैं।
लू के गर्म थपेड़े खा कर, खुलकर हँसते रहते हैं।।


शाखाओं पर बैठ परिन्दे, मन ही मन हर्षाते हैं।
इनके पीले-पीले गहने, उनको बहुत लुभाते हैं।।

दुख में कैसे मुस्काते हैं, ये जग को बतलाते हैं।
सहना सच्चा गहना होता है, सीख यही सिखलाते हैं।।

दोहे "ख़बरों की भरमार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पत्रकारिता दिवस पर, होता है अवसाद।
गुणा-भाग तो खूब है, मगर नहीं गुणवाद।।
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पत्रकारिता में लगेजब से हैं मक्कार।
छँटे हुओं की नगर केतब से है जयकार।।
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समाचार के नाम पर, ब्लैकमेल है आज।
विज्ञापन का चल पड़ा, अब तो अधिक रिवाज।।
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पीड़ा के संगीत मेंदबे खुशी के बोल।
देश-वेश-परिवेश मेंकौन रहा विष घोल।।
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बैरी को तो मिल गये, घर बैठे जासूस।
सच्ची खबरों के लिए, देनी पड़ती घूस।।
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ख़बरें अब साहित्य कीहुई पत्र से लुप्त।
सामाजिकता हो रहीइसीलिए तो सुप्त।।
--
मिर्च-मसाला झोंक करछाप रहे अखबार।
हत्या और बलात् कीख़बरों की भरमार।।
--
पड़ी बेड़ियाँ पाँव मेंहाथों में जंजीर।
सच्चाई की हो गयीअब खोटी तकदीर।।

बुधवार, 29 मई 2019

“KIN A POEM : CARL STANDBURG” (अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

KIN A POEM: 
Carl Sandburg  
(अनुवादक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सागरतल की गहराई में
ज्वाला बनकर धधक रही हूँ,
हुए हजारों साल, आज भी
मैं वैसे ही भभक रही हूँ,

मत छूना मुझको ऐ भाई!
अपना धर्म नहीं छोड़ूँगी,
मेरा नाम आग है भाई!
मैं नही शीतलता ओढ़ूँगी

मुझे परिधि में सीमित रखकर,
कैद कभी नही कर पाओगे,
कितने ही प्रयत्न करो, पर
गोदी में नही भर पाओगे,

अगर बदलना चाहो तो, तुम
खुद को बदलो ऐ भाई!
मेरा करो प्रयोग-भोग पर,
मैं नही बदलूँगी भाई!
Carl Sandburg
(1878-1967)
American poet

मंगलवार, 28 मई 2019

दोहाग़ज़ल "प्यार भरे अशआर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नहीं समझना ग़ज़ल को, लफ्जों का व्यापार।
ज़ज़्बातों की शायरी, करती दिल पर वार।।

बिना बनावट के जहाँ, होते हैं अल्फाज़,
अच्छे लगते वो सभी, प्यार भरे अशआर।

मतला-मक़्ता-क़ाफिया, हुए ग़ज़ल से दूर,
मातम के माहौल में, सजते बन्दनवार।

डूब रही है आजकल, उथले जल में नाव,
छूट गयी है हाथ से, केवट के पतवार।

अब कविता के साथ में, होता है अन्याय,
आज क़लम में है नहीं, वीरों की हुँकार।

शायर बनकर आ गये, अब तो सारे लोग,
कलियों-फूलों पर बहुत, होता अत्याचार।

कृत्रिमता से किसी का, नहीं दमकता “रूप”
चाटुकार-मक्कार अब, इज़्ज़त के ह़कदार।

सोमवार, 27 मई 2019

गीत "हाड़ धुन रहे राजदुलारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

भूख बन गई है मजबूरी,
हाड़ धुन रहे राजदुलारे।
बाल श्रमिक करते मजदूरी,
हालातों से बालक हारे।।

आश्वासन पर देश चल रहा,
जन-गण को सन्देश छल रहा,
झूठे सब सरकारी दावे,
इनकी किस्मत कौन सँवारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

टूटे-फूटे हैं कच्चे घर,
नहीं यहाँ परपंखे-कूलर.
महलों को मुँह चिढ़ा रही है,
इनकी झुग्गी सड़क किनारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

मिलता इनको झिड़की-ताना,
दूषित पानीझूठा खाना,
जनसेवक की सेवा में हैं,
अफसर-चाकर कितने सारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

रविवार, 26 मई 2019

दोहे "हार गये सामन्त" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेटा-बेटी और माँ, करते नाटक खूब।
काँगरेस की धरा पर, नहीं उगेगी दूब।।

टूटा कुनबेवाद से, जन-गण का विश्वास।
जनता को परिवार से, नहीं रही अब आस।।

गाँधी जी के स्वप्न को, किया नेस्त-नाबूद।
काँगरेस का अब नहीं, बाकी बचा वजूद।।

देख रहे दिग्गज सभी, लेकिन बैठे मौन।
अब बिल्ली के गले में, घण्टा बाँधे कौन।।

हालत बिगड़ी है बहुत, काँगरेस की आज।
मोदी जी के साथ में, अब चल पड़ा समाज।।

चालबाजियाँ अब सभी, समझ गयी मखलूक।
नरसिंहा के साथ में, कैसा किया सुलूक।।

करणी का फल आज तो, भुगत रहे युवराज।
हुई कोढ़ में खाज अब, जिसका नहीं इलाज।।

काँगरेस का हो गया, भारत से अब अन्त।
लोकतन्त्र के समर में, हार गये सामन्त।

शनिवार, 25 मई 2019

दोहे "मोदी की सरकार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जनता ने युवराज को, फिर से दिया नकार।
जोर-शोर से आ गयी, मोदी की सरकार।।

काँगरेस के जब तलक, पप्पू हैं अध्यक्ष।
सबल नहीं होगा कभी, काँगरेस का पक्ष।।

जनता जिसको चाहती, उसको मिलता ताज।
जिसमें हो गम्भीरता, वो ही करता राज।।

जिसका होता देश में, पाक-साफ किरदार।
सत्ता-शासन का वही, होता है हकदार।।

नीयत में होता नहीं, जिसकी कोई खोट।
मिलते आम चुनाव में, उसको ज्यादा वोट।।

दशकों से दिल में रहा, जिनके भारी बैर।
जनता खूब समझ गयी, मतलब की यह सैर।।

लोकतन्त्र में हो गये, अब सम्पन्न चुनाव।
डूब गयी मझधार में, ठगबन्धन की नाव।।

शुक्रवार, 24 मई 2019

बालकविता "शिव-शंकर को प्यारी बेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो शिव-शंकर को भाती है 
बेल वही तो कहलाती है 
 
तापमान जब बढ़ता जाता 
पारा ऊपर चढ़ता जाता 

अनल भास्कर जब बरसाता 
लू से तन-मन जलता जाता 
 
तब पेड़ों पर पकती बेल 
गर्मी को कर देती फेल 

इस फल की है महिमा न्यारी 
गूदा इसका है गुणकारी 
 
पानी में कुछ देर भिगाओ 
घोटो-छानो और पी जाओ 

ये शर्बत सन्ताप हरेगा 
तन-मन में उल्लास भरेगा 

गुरुवार, 23 मई 2019

दोहे "बिकती नहीं तमीज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कहीं किसी भी हाट में, बिकती नहीं तमीज।

वैसा ही पौधा उगे, जैसा बोते बीज।।

करके सभी प्रयास अब, लोग गये हैं हार।
काशी में अब भी बहे, पतित-पावनी धार।।

पूरी ताकत को लगा, चला रहे पतवार।
लेकिन नहीं विपक्ष की, नाव लग रही पार।।

कृपण बने खुद के लिए, किया महल तैयार।
अपशब्दों की वो करें, रोज-रोज बौछार।।

पूर्व जन्म में किसी का, खाया था जो कर्ज।
उसको सूद समेत अब, लौटाना है फर्ज।।

रखना नहीं दिमाग में, राजनीति में मैल।
खटते रहना रात-दिन, ज्यों कोल्हू का बैल।।

बुधवार, 22 मई 2019

ग़ज़ल "कवायद कौन करता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

खुदा की आजकल, सच्ची इबादत कौन करता है
बिना मतलब ज़ईफों से, मुहब्बत कौन करता है

शहादत दी जिन्होंने, देश को आज़ाद करने को,
मगर उनकी मज़ारों पर, इनायत कौन करता है

सियासत में फक़त है, वोट का रिश्ता रियाया से
यहाँ मज़लूम लोगों की, हिमायत कौन करता है

मिला ओहदा उज़ागर हो गयी, करतूत अब सारी
वतन को चाटने में, अब रियायत कौन करता है

ग़रज़ जब भी पड़ी तो, ले कटोरा भीख का आये
मुसीबत में गरीबों की, हिफ़ाजत कौन करता है

सजीले “रूप” की चाहत में, गुनगुन गा रहे भँवरे
कमल के बिन सरोवर पर, कवायद कौन करता है

मंगलवार, 21 मई 2019

ग़ज़ल "आपस में सुर मिलाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जीवन की हकीकत का, इतना सा है फसाना
खुद ही जुटाना पड़ता, दुनिया में आबोदाना

सुख के सभी हैं साथी, दुख का कोई न संगी
रोते हैं जब अकेले, हँसता है कुल जमाना

घर की तलाश में ही, दर-दर भटक रहे हैं
खानाबदोश का तो, होता नहीं ठिकाना

अपना नहीं बनाया, कोई भी आशियाना
लेकिन लगा रहे हैं, वो रोज शामियाना

मंजिल की चाह में ही, दर-दर भटक रहे हैं
बेरंग जिन्दगी का, उलझा है ताना-बाना

 अशआर हैं अधूरे, ग़ज़लें नहीं मुकम्मल
दुनिया समझ रही है, लहजा है शायराना

हो हुनर पास में तो, भर लो तमाम झोली
मालिक का दोजहाँ में, भरपूर है खजाना

लड़ते नहीं कभी भी, बगिया में फूल-काँटे
सीखो चमन में जाकर, आपस में सुर मिलाना

दिल की नजर से देखो, मत रूप-रंग परखो
रच कर नया तराना, महफिल में गुनगुनाना
  

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