नौका में छल-छद्म की, मतलब के सब मीत। |
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2020
शनिवार, 3 मार्च 2018
दोहे "बैंगन होते खास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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मतलब के संसार में, बैंगन होते खास।
खुशनसीब वे लोग हैं, बैंगन जिनके पास।।
होते हैं वो ही सफल, जो होते हैं धूर्त।
केवल झूठ-फरेब से, सपने करते मूर्त।।
जोड़-तोड़ के खेल में, जो होते अनुरूप।
राजनीति के समर में, निखरा उनका “रूप”।।
शासक का मन मोहते, ऐसे ही चितचोर।
चापलूस बैंगन उन्हें, करते भाव विभोर।।
जो कल तक कंगाल थे, आज हुए धनवान।
रिश्वत के बल पर वही, मार रहे मैदान।।
घोटाले के नाम पर, बनते हैं आयोग।
सिद्ध नहीं होंगे कभी, बैंगन के अभियोग।।
ढुल-मुल लोगों की कभी, करना मत तारीफ।
थाली के बैंगन नहीं, होंगे कभी शरीफ।।
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गुरुवार, 29 जनवरी 2015
"दोहा, रोला और कुण्डलिया की परिभाषाएँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहा और रोला और कुण्डलिया
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दोहा
दोहा, मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में १३-१३ मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में ११-११ मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के आदि में जगण (।ऽ।) नहीं होना चाहिए। सम चरणों के अन्त में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है अर्थात अन्त में लघु होता है।
उदाहरण-
मन में जब तक आपके, होगा शब्द-अभाव।
दोहे में तब तक नहीं, होंगे पुलकित भाव।१।
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गति-यति, सुर-लय-ताल सब, हैं दोहे के अंग।
कविता रचने के लिए, इनको रखना संग।२।
--
दोहा वाचन में अगर, आता हो व्यवधान।
कम-ज्यादा है मात्रा, गिन लेना श्रीमान।३।
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लघु में लगता है समय, एक-गुना श्रीमान।
अगर दो-गुना लग रहा, गुरू उसे लो जान।४।
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दोहे में तो गणों का, होता बहुत महत्व।
गण ही तो इस छन्द के, हैं आवश्यक तत्व।५।
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तेरह ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
विषम चरण के अन्त में, होता जगण निषिद्ध।६।
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कठिन नहीं है दोस्तों, दोहे का विन्यास।
इसको रचने के लिए, करो सतत् अभ्यास।७।
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रोला
रोला एक छन्द है। यह मात्रिक सम छन्द है। इसमें कुल 24 मात्राएँ होती हैं, अर्थात् विषम चरणों में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों में 13-13 मात्राएँ। ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्राओं पर विराम होता है। अन्त में 'गुरू' होने आवश्यक हैं।
उदाहरण-
नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं।
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है।
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३
मैथिलीशरण गुप्त
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कुण्डलिया
कुण्डलिया मात्रिक छंद है। एक दोहा तथा दो रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। दोहे का अंतिम चरण ही प्रथम रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होती है।
उदाहरण -
(1)
बेटे-बेटी में करो, समता का व्यवहार।
बेटी ही संसार की, होती सिरजनहार।।
होती सिरजनहार, स्रजन को सदा सँवारा।
जिसने ममता को उर में जीवन भर धारा।।
कह 'मयंक' दामन में कँटक रही समेटे।
बेटी माता बनकर जनती बेटी-बेटे।।
(2)
हरे-भरे हों पेड़ सब, छाया दें घनघोर।
उपवन में हँसते सुमन, सबको करें विभोर।।
सबको करें विभोर, प्रदूषण हर लेते हैं।
कंकड़-पत्थर खाकर, मीठे फल देते हैं।।
कह 'मयंक' आचरण, विचार साफ-सुथरे हों।
उपवन के सारे, पादप नित हरे-भरे हों।।
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सोमवार, 22 दिसंबर 2014
"दोहे-दोहों का मर्म..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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मन में
जब तक आपके, होगा शब्द-अभाव।
दोहे
में तब तक नहीं, होंगे पुलकित भाव।१।
--
गति-यति,
सुर-लय-ताल सब, हैं दोहे के अंग।
कविता
रचने के लिए, इनको रखना संग।२।
--
दोहा
वाचन में अगर, आता हो व्यवधान।
कम-ज्यादा
है मात्रा, गिन लेना श्रीमान।३।
--
लघु में
लगता है समय, एक-गुना श्रीमान।
अगर दो-गुना
लग रहा, गुरू उसे लो जान।४।
--
दोहे
में तो गणों का, होता बहुत महत्व।
गण ही
तो इस छन्द के, हैं आवश्यक तत्व।५।
--
तेरह
ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
विषम
चरण के अन्त में, होता जगण निषिद्ध।६।
--
कठिन
नहीं है दोस्तों, दोहे का विन्यास।
इसको रचने
के लिए, करो सतत् अभ्यास।७।
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रविवार, 13 जनवरी 2013
"दोहा-चार चरण-दो पंक्तियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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तेरह-ग्यारह से बना, दोहा छन्द प्रसिद्ध।
सरस्वती की कृपा से, करलो इसको सिद्ध।१।
चार चरण-दो पंक्तियाँ, करती गहरी मार।
कह देती संक्षेप में, जीवन का सब सार।२।
सरल-तरल इस छन्द में, बहते गहरे भाव।
दोहे में ही निहित है, नैसर्गिक अनुभाव।३।
तुलसीदास-कबीर ने, दोहे किये पसन्द।
दोहे के आगे सभी, फीके लगते छन्द।४।
दोहा सज्जनवृन्द के, जीवन का आधार।
दोहों में ही रम रहा, सन्तों का संसार।५।
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