चार दिनों का ही मेला है, सारी दुनियादारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
अमर समझता है अपने को, दुनिया का हर प्राणी,
छल-फरेब के बोल, बोलती रहती सबकी वाणी,
बिना मुहूरत निकल जायेगी इक दिन प्राणसवारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
ठाठ-बाट और महल-दुमहले, साथ न तेरे जायेंगे,
केवल मरघट तक ही सारे, रस्म निभाने आयेंगे,
जिन्दा लोगों से सब रखते, अपनी नातेदारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
काम-क्रोध, मद-लोभ सभीकुछ, जीते-जी की माया,
धू-धू करके जल जायेगी, इक दिन तेरी काया,
आने के ही साथ बँधी है, जाने की तैयारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
याद करे तुझको दुनिया, तू ऐसा पुण्य कमाता जा,
मरने से पहले ऐ प्राणी, सच्चा पथ अपनाता जा,
जीवन का अवसान हो रहा, सिमट रही है पारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
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शनिवार, 19 जनवरी 2013
"भजन-दुनियादारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 4 जून 2012
"आगे बढ़ना आसान नहीं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दुर्गम पथरीला पथ है, आगे बढ़ना आसान नहीं। ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।। पहले पढ़ना-लिखना, फिर जीविका कमाना पड़ता है, कदम-कदम पर यहाँ, बहुत से कष्ट उठाना पड़ता है। दुनियादारी एक हक़ीक़त, ये गुड़ियों का खेल नहीं- घास-फूस-तिनके चुन कर, घर-बार बनाना पड़ता है। जीवन तो है एक साधना, तप करना आसान नहीं। ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।। हाड़ कँपाती सर्दी, लू के थप्पड़ खाना पड़ता है, आँधी-पानी में खेतों में, पौध लगाना पड़ता है। स्वयं परिश्रम करना पड़ता, नहीं हाट में ये मिलता, मक्कारों, बे-ईमानों को, सबक सिखाना पड़ता है। सत्य-अहिंसा की राहों पर, चलना है आसान नहीं। ऊँची पर्वत-मालाओं पर, चढ़ना है आसान नहीं।। |
शुक्रवार, 11 मई 2012
"नाम इसी का तो है जीवन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
तन में-मन में हो अपनापन। नाम इसी का तो है जीवन।। नागर बन बैठा वनचारी, लगी महकने बगिया सारी। सपनों ने आकार लिया जब, लगी चहकने दुनियादारी। परिणय-प्रणय और उद्दीपन, नाम इसी का तो है जीवन।। भँवरे ने गुंजार सुनाई, सुमन हँसा, कलिका मुस्काई। फूलों का मीठा रस पीने, पंख हिलाती तितली आई। रस की लोभी मधु की मक्खी, पंखुड़ियों का करती चुम्बन। नाम इसी का तो है जीवन।। सन्तानों को पिता प्यार से, पाल रहा कितने दुलार से। आयेगा जब कठिन बुढ़ापा, झुक जायेगी रीढ़ भार से। शिथिल अंग को रामबाण सा, मिल जायेगा रस संजीवन। नाम इसी का तो है जीवन।। |
रविवार, 18 दिसंबर 2011
"सीख रहा हूँ दुनियादारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| सम्बन्धों के चक्रव्यूह में, सीख रहा हूँ दुनियादारी। जब पारंगत हो जाऊँगा, तब बन जाऊँगा व्यापारी।। खुदगर्जी के महासिऩ्धु में, कैसे सुथरा कहलाऊँगा? पीने का पानी सागर से, गागर में कैसे पाऊँगा? बिना परिश्रम, बिना कर्म के, कदम-कदम पर लड़ना होगा। बाधाओं को दूर हटाकर, पथ पर आगे बढ़ना होगा। जीवन का अस्तित्व बचाना, मेरे जीवन की लाचारी। जब पारंगत हो जाऊँगा, तब बन जाऊँगा व्यापारी।। माँ ने जन्म दिया है मुझको बापू ने चलना बतलाया। जन्मभूमि ने मेरे मन में, देशप्रेम का भाव जगाया। अपने पथदर्शक गुरुओं का, सदा रहूँगा मैं आभारी। जब पारंगत हो जाऊँगा, तब बन जाऊँगा व्यापारी।। |
रविवार, 13 नवंबर 2011
"आज बन गये सब व्यापारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
आपाधापी की दुनिया में, मतलब की सब दुनियादारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। बिना काम के कोई किसी को, बिल्कुल याद नहीं करता है, अमृत पाने के लालच में , सागर का पानी भरता है, स्वार्थ पड़ा है सब पर भारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। मानवता के इस दंगल में, केवल दाँव-पेंच चलते हैं, धनवानों की घुड़सालों में, बलशाली घोड़े पलते हैं, पश्चिम की असभ्य आँधी से, पूरब की पुरवा है हारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। सजे-धजे परिधान छोड़कर, अंगों का हो रहा प्रदर्शन, सोच हुई है कितनी बौनी, घटा “रूप” का सब आकर्षण, भूल गये हैं शब्द लाज का, फैशन की पनपी बीमारी। दुनियादारी के मेले में, आज बन गये सब व्यापारी।। |
शनिवार, 25 जून 2011
"ग़ज़ल" कठिन गुजारा लगता है (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सुखद बिछौना सबको प्यारा लगता है यह तो दुनिया भर से न्यारा लगता है जब पूनम का चाँद झाँकता है नभ से उपवन का कोना उजियारा लगता है सुमनों की मुस्कान भुला देती दुखड़े खिलता गुलशन बहुत दुलारा लगता है जब मन पर विपदाओं की बदली छाती तब सारा जग ही दुखियारा लगता है देश चलाने वाले हाट नहीं जाते उनको तो मझधार किनारा लगता है बातों से जनता का पेट नहीं भरता सुनने में ही प्यारा नारा लगता है दूर-दूर से “रूप” पर्वतों का भाता बाशिन्दों को कठिन गुजारा लगता है |
मंगलवार, 21 जून 2011
"गीत- प्यार हुआ आवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सिसक रहा है आज वतन में, खुशियों का चौबारा। छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।। पगडण्डी पर चोर-लुटेरे, चौराहों पर डाकू, रिश्तों की झाड़ी में पसरे, भाई बने लड़ाकू, सम्बन्धों में गरल भरा है, प्यार हुआ आवारा। छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।। मन में कोरा स्वार्थ समाया, मुख पर मीठी बातें, ममता-समता झूठी-झूठी, झूठी सब सौगातें, अपने ही हो गये बिराने, देगा कौन सहारा? छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।। नहीं तमन्ना है दुलार की, नहीं प्यार में राहत, सन्तानों को केवल है अब, अधिकारों की चाहत, पर आने पर पंछी ने घर से कर लिया किनारा। छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।। |
रविवार, 12 जून 2011
"गीत-...छाया नभपर घन होता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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