-- चाँदी की चम्मच से खाया, पोती ने पहला आहार।। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।। -- जिस दिन की कर रहा प्रतीक्षा, बहुत दिनों से कुल परिवार। आज अन्नप्राशन गुड़िया का, प्रथम अन्न का है उपहार। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।1। -- माता के नवरात्र चल रहे, खुशियों का पसरा अम्बार। खीर और खिचड़ी भी खायी, गुड़िया ने लेकर चटखार। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।2। -- बाबा-दादी, मम्मी-पापा, ताऊ-ताई करते प्यार। पा करके जीवन्त खिलौना, भइया-दीदी करें दुलार। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।3। -- षष्ठ मास की हुई अंशिका, बार-बार करती किलकार। चहका-महका एक बार फिर, बाबा का सूना घर-द्वार। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।4। -- मिले सभी को ठौर-ठिकाना, उतरें सब भवसागर पार। बना रहे आशीष मात का, माता सृष्टि की पतवार। मना रहे इस दिन को सारे, जैसे हो घर में त्योहार।5। -- |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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रविवार, 28 सितंबर 2025
बालगीत "मेरी पोती अंशिका का अन्नप्राशन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 20 नवंबर 2024
बालगीत "प्रकाश का पुंज हमारा सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रविवार, 24 मार्च 2024
बालगीत "मस्ती लेकर आई होली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
आयी होली, आई होली। रंग-बिरंगी आई होली।। ![]() मुन्नी आओ, चुन्नी आओ, रंग भरी पिचकारी लाओ, मिल-जुल कर खेलेंगे होली। रंग-बिरंगी आई होली।। मठरी खाओ, गुँजिया खाओ, पीला-लाल गुलाल उड़ाओ, मस्ती लेकर आई होली। रंग-बिरंगी आई होली।। ![]() रंगों की बौछार कहीं है, ठण्डे जल की धार कहीं है, भीग रही टोली की टोली। रंग-बिरंगी आई होली।। ![]() परसों विद्यालय जाना है, होम-वर्क भी जँचवाना है, मेहनत से पढ़ना हमजोली। रंग-बिरंगी आई होली।। |
शुक्रवार, 22 मार्च 2024
बालगीत "होली का मौसम अब आया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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-- रंग-गुलाल साथ में लाया। होली का मौसम अब आया। -- पिचकारी फिर से आई हैं, बच्चों के मन को भाई हैं, तन-मन में आनन्द समाया। होली का मौसम अब आया।। -- गुझिया थाली में पसरी हैं, पकवानों की महक भरी हैं, मठरी ने मन को ललचाया। होली का मौसम अब आया।। -- बरफी की है शान निराली, भरी हुई है पूरी थाली, अम्मा जी ने इसे बनाया। होली का मौसम अब आया।। -- मम्मी बोली पहले खाओ, उसके बाद खेलने जाओ, सूरज ने मुखड़ा चमकाया। होली का मौसम अब आया।
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सोमवार, 18 मार्च 2024
बालगीत "जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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-- लिखना सीखो पढ़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- गदराई पेड़ों की डाली, बिखरी खेतों में हरियाली, अब आया है समय सुहाना, छोड़ो गाना राग पुराना, नये शब्द भी गढ़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- नौका में जब पाँव बढ़ाओ, साहस को पतवार बनाओ, पार करो सागर रतनारे, दूर नहीं मैदान-किनारे, लहरों से तुम लड़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- कभी न दु:खों
से घबराना, आँसू को मुस्कान बनाना, सुमन खिले हैं प्यारे-प्यारे, उपवन महक रहे हैं सारे, फूटी ढोलक मढ़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- मुँह का वातायन जब खोलो, कटुक-वचन को कभी न बोलो, शाकाहारी भोजन खाओ, बुरी आदतें मत अपनाओ, सच्चाई पर अड़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- मात-पिता का आदर करना, दया-धर्म को दिल में भरना, मानव हो दानवता छोड़ो, सम्बन्धों को कभी न तोड़ो, सोपानों को चढ़ना सीखो। जीवन-पथ पर बढ़ना सीखो।। -- |
रविवार, 17 मार्च 2024
बालगीत "खुशियों की सौगात लिए होली आई है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
-- खुशियों की सौगात लिए होली आई है। रंगों की बरसात लिए, होली आई है।। -- रंग-बिरंगी पिचकारी ले, बच्चे होली खेल रहे हैं। मम्मी-पापा दोनों मिल कर, मठरी-गुझिया बेल रहे हैं। पकवानों का थाल लिए, होली आई है। रंगों की बरसात लिए, होली आई है।। -- जाड़ा भागा, गरमी आई, होली यह सन्देशा लाई। कोयल बोल रही बागों में, बाजों ने पाँखे खुजलाई। ठण्डी कुल्फी हाथ लिए, होली आई है। रंगों की बरसात लिए, होली आई है।। -- सरसों फूली, टेसू फूले, आम-नीम बौराये हैं। मक्खी-मच्छर भी होली का, गीत सुनाने आये हैं। साथ चाँदनी रात लिए, होली आई है। रंगों की बरसात लिए, होली आई है।। -- |
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2024
बाल गीत "सीख काम की हम सिखलाते" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
-- मौसम कितना हुआ सुहाना। रंग-बिरंगे सुमन सुहाते। सरसों ने पहना पीताम्बर, गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- दिवस बढ़े हैं शीत घटा है, नभ से कुहरा-धुंध छटा है, पक्षी कलरव राग सुनाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- काँधों पर काँवड़ें सजी हैं, बम भोले की धूम मची है, शिवशंकर को सभी रिझाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- तन-मन में मस्ती छाई है, अपनी बेरी गदराई है, सभी झूमकर हँसते गाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- निर्मल है नदियों का पानी, पेड़ों पर छा गई जवानी, खुश हो करके ये इठलाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- बच्चों अब मत समय गँवाओ, पढ़ने में भी ध्यान लगाओ, सीख काम की हम सिखलाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- प्रतिदिन पुस्तक को दुहराओ, पास परीक्षा में हो जाओ, श्रम से सभी सफलता पाते। गेहूँ के बिरुए लहराते।। -- |
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