ठिठुरन से मित्रता
भास्कर ने जोड़ ली।
निर्धनता खोज रही
आग के अलाव,
ईंधन के बढ़ गये
ऐसे में भाव।
जंगलों का दोहन,
ठण्ड से काँप रहा
कोमल बदन,
कूड़े से पन्नियाँ
बीन रहा बचपन।
कुहरा तो एक दिन
छँट ही जायेगा.
उसके बाद सूरज भी
गर्मी दिखायेगा।
सर्दी में कम्पन,
गर्मी में स्वेदकण
झेलना जरूरी है.
नून, तेल-आटे को
लाना मजबूरी है।।