मित्रों...! गर्मी अपने पूरे यौवन पर है। ऐसे में मेरी यह बालरचना आपको जरूर सुकून देगी! पिकनिक करने का मन आया! मोटर में सबको बैठाया!! -- पहुँच गये जब नदी किनारे! खरबूजे के खेत निहारे!! -- ककड़ी, खीरा और खरबूजे! कच्चे-पक्के थे तरबूजे!! प्राची, किट्टू और प्रांजल! करते थे जंगल में मंगल!! लो मैं पेटी में भर लाया! खरबूजे का मौसम आया!! देख पेड़ की शीतल छाया! हमने आसन वहाँ बिछाया!! -- जम करके खरबूजे खाये! शाम हुई घर वापिस आये!! -- |
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सोमवार, 15 मई 2023
बालकविता "ककड़ी, खीरा- खरबूजे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
शनिवार, 12 अप्रैल 2014
"बालकविता-ककड़ी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लम्बी-लम्बी
हरी मुलायम।
ककड़ी
मोह रही सबका मन।।
कुछ
होती हल्के रंगों की,
कुछ
होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ
होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ
तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी
खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल
मन का उपवन।
ककड़ी
मोह रही सबका मन।।
नदी
किनारे पालेजों में,
ककड़ी
लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी
बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव
में, फड़-ठेलों
पर,
यह
रोगों को दूर भगाती,
यह
मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी
मोह रही सबका मन।।
![]()
आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म
जब लू चलती हैं,
तापमान
दिन का बढ़ जाता,
गर्मी
से धरती जलती है,
ऐसे
मौसम में सबका ही,
ककड़ी
खाने को करता मन।
ककड़ी
मोह रही सबका मन।।
|
मंगलवार, 26 अप्रैल 2011
"ककड़ी मोह रही सबका मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
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