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बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

गीत "सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

दया के द्वार पर, बैठे हुए हैं लोभ के पहरे, 
मिटी सम्वेदना सारी, मनुज के स्रोत है बहरे, 
सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

जो सदियों से नही सी पाये, अपने चाकदामन को, 
छुरा ले चल पड़े हैं हाथ वो, अब काटने तन को, 
वो रहते भव्य भवनों में, कभी थे जो विराने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

युवक मजबूर होकर खींचते हैं रात-दिन रिक्शा, 
मगर कुत्ते और बिल्ले कर रहें हैं दूध की रक्षा, 
श्रमिक का हो रहा शोषण, धनिक के कारखाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।
 

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

दोहे "शरदपूर्णिमा पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


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शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास।
शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।१।
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लक्ष्मीमाता धरा पर , आने को तैयार।
शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।२।
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त्यौहारों का आगमन, करे कार्तिक मास।
सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।३।
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दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार।
देता शुभसन्देश है, पावस का त्यौहार।४।
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दमक उठे हैं रात में, कोठी-महल-कुटीर।
नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।५।
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अमृत वर्षा कर रही, शरदपूर्णिमा रात।
आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।६।
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खिला हुआ है गगन में, उज्जवल-धवल मयंक।
नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।७।
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निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर।
मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।८।
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शरदपूर्णिमा दे रही, सबको यह सन्देश।
तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।९।
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फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ।
भरा रहेगा धान्य से, मजदूरों का हाथ।१०।
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सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

गीत "तुम पंखुरिया फैलाओ तो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जलने को परवाना आतुरआशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुवन में महक समाई हैकलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकरभँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुलतुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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मधुमक्खी भीने-भीने स्वर मेंसुन्दर राग सुनाती है,
सुन्दर पंखों वाली तितली भीआस लगाए आती है,
सूरज की किरणें कहती हैकलियों खुलकर मुस्काओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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चाहे मत दो मधु का कणभरपर आमन्त्रण तो दे दो,
पहचानापन विस्मृत करकेइक मौन-निमन्त्रण तो दे दो,
काली घनघोर घटाओं मेंबिजली बन कर आ जाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातकगगरी से जल छलकाओ तो।।
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रविवार, 17 अक्तूबर 2021

गीत "खुशियों से महके चौबारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आलोकित हो चमन हमारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

दुर्गुण मन से दूर भगाओ,
राम सरीखे सब बन जाओ,
निर्मल हो गंगा की धारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

विजय पर्व हो या दीवाली,
रहे न कोई मुट्ठी खाली,
स्वच्छ रहे आँगन-गलियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

कंचन जैसा तन चमका हो,
उल्लासों से मन दमका हो,
खुशियों से महके चौबारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

सभी अल्पना आज सजाएँ,
माता से धन का वर पाएँ,
आओ दूर करें अँधियारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

घर-घर बँधी हुई हो गैया,
चहके प्यारी सोन चिरैया,
सुख का सरसेगा फव्वारा।
हो सारे जग में उजियारा।।

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

गीत "गोमुख से सागर तक जाती" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नद-नालों, सरिताओँ को जो,

खुश हो करके अंग लगाती।

धरती की जो प्यास बुझाती,

वो पावन गंगा कहलाती।।

 

आड़े-तिरछे और नुकीले,

पाषाणों को तराशती है।

पर्वत से मैदानों तक जो,

अपना पथ खुद तलाशती है।

गोमुख से सागर तक जाती।

वो पावन गंगा कहलाती।।

 

फसलों को नवजीवन देती,

पुरखों का भी तर्पण करती।

मैल हटाती-स्वच्छ बनाती,

मन का निर्मल दर्पण करती।

कल-कल, छल-छल नाद सुनाती।

वो पावन गंगा कहलाती।।

 

चलना ही जीवन होता है

जो रुकता है वो सड़ जाता,

जो पत्रक नहीं लहराता है,

वो पीला पड़कर झड़ जाता।

चरैवेति सन्देश सिखाती।

वो पावन गंगा कहलाती।।

 

मैला और विषैला पानी,

गंगा में अब नहीं बहाओ।

समझो अपनी जिम्मेदारी,

गंगा का अस्तित्व बचाओ।

जो अपने पुरखों की थाती।

वो पावन गंगा कहलाती।।

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

दोहे "उसका होता राम सा, जग में ऊँचा नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रावण का वध हो गया, गयी बुराई हार।
विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार।१।
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जो दुष्टों के दलन का, करता काम तमाम।
उसका होता राम सा, जग में ऊँचा नाम।२।
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मर्यादाओं का रखा, जिसने भी आधार।
होती है उस राम की, जग में जय-जयकार।३।
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त्यौहारों का कीजिए, नहीं कभी उपहास।
सब पर्वों के मूल में, घटनाएँ हैं खास।४।
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विजय पर्व पर बाँचिए, स्वर्णिम निज इतिहास।
हो जायेगा आपको, गौरव का आभास।५।
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सत्यनिष्ठ होकर यहाँ, जो करता काम।
कहलाता वो जगत में, राजा जैसा राम।६।
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सुख-सुधिधाएँ त्यागना, नहीं यहाँ आसान।
निष्कामी इंसान का, होता है गुण-गान।७।
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अन्न उगाकर खेत में, कृषक नहीं सम्पन्न।
फिर भी सुमन समान वो, रहता सदा प्रसन्न।८।
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नहीं आज भी सत्य का, कोई कहीं विकल्प।
सत्य बोलने का करो, धारण अब संकल्प।९।
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मंजिल पाने के लिए, बदलो अपने ढंग।
अच्छे लोगों का करो, जीवन में तुम संग।१०।
  --

गुरुवार, 14 अक्तूबर 2021

अकविता "बाइक से सीता का हरण" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अन्तिम राक्षस?

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कल

दशहरा है

दो वर्षों के बाद

उपवन हरा-भरा है

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फिर से

दशानन, मेघनाद

और कुम्भकर्ण के

गगनचुम्बी पुतले

मैदान में सजे हैं

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रामलीला मैदान में

मेला लगा है

कोरोना के बाद

फिर से राम का

अनुराग जगा है

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श्री राम जी की

जय के उद्घोष के साथ

पुतलों का दहन

फिर से हो पायेगा

राम मन्दिर का स्वप्न

साकार हो जायेगा

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लो अन्तिम राक्षस 

रावण तो 

 जला दिया जायेगा।

किन्तु इस बार

कलयुगी रावण द्वारा

बाइक से

सीता का 

हरण किया जायेगा।।


बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

दुर्गा जी की वन्दना "नवदुर्गा के नवम् रूप हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आरती नव दुर्गा
तुमको सच्चे मन से ध्याता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
व्रत-पूजन में दीप-धूप हैं,
नवदुर्गा के नवम् रूप हैं,
मैं देवी का हूँ उद् गाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
प्रथम दिवस पर शैलवासिनी,
शैलपुत्री हैं दुख विनाशिनी,
सन्तति का माता से नाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
 
द्वितीय दिवस पर ब्रह्मचारिणी,
देवी तुम हो मंगलकारिणी,
निर्मल रूप आपका भाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
बनी चन्द्रघंटा तीजे दिन,
मन्दिर में रहती हो पल-छिन,
सुख-वैभव तुमसे है आता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
कूष्माण्डा रूप तुम्हारा,
भक्तों को लगता है प्यारा,
पूजा से संकट मिट जाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
पंचम दिन में स्कन्दमाता,
मोक्षद्वार खोलो जगमाता,
भव-बन्धन को काटो माता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
कात्यायनी बसी जन-जन में,
आशा चक्र जगाओ मन में,
भजन आपका मैं हूँ गाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
कालरात्रि की शक्ति असीमित,
ध्यान लगाता तेरा नियमित,
तव चरणों में शीश नवाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
महागौरी का है आराधन,
कर देता सबका निर्मल मन,
जयकारे को रोज लगाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
सिद्धिदात्री तुम कल्याणी
सबको दो कल्याणी-वाणी।
मैं बालक हूँ तुम हो माता।
दया करो हे दुर्गा माता।।

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