मेरे गीत को सुनिए-
अर्चना चावजी के मधुर स्वर में!
सुख के बादल कभी न बरसे,
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था, उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!
|
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शनिवार, 16 फ़रवरी 2013
"मेरा एक पुराना गीत" (डॉ.रूपचन्द्र सास्त्री 'मयंक')
शनिवार, 12 जनवरी 2013
"चिल्लाया है कौआ-बालकविता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
काफी समय पहले
एक बाल कविता लिखी थी!
मेरे आग्रह पर इसे मेरी मुँहबोली भतीजी
अर्चना चावजी ने बहुत मन से गाया था!
आप भी इस बाल कविता का रस लीजिए!
काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का,
जोड़ा कितना प्यारा।
नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।
काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।
कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली,
इनका मन बहलाती।।
देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँवकर,
चिल्लाया है कौआ।।
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सोमवार, 30 अप्रैल 2012
"आज फिर से मेरा एक पुराना गीत अर्चना चावजी के स्वर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों! आज फिर से मेरा एक पुराना गीत सुनिए! बहन अर्चना चावजी के स्वर में! आप इक बार ठोकर से छू लो हमें, हम कमल हैं चरण-रज से खिल जायेगें! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! फूल और शूल दोनों करें जब नमन, खूब महकेगा तब जिन्दगी का चमन, आप इक बार दोगे निमन्त्रण अगर, दीप खुशियों के जीवन में जल जायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! हमने पारस सा समझा सदा आपको, हिम सा शीतल ही माना है सन्ताप को, आप नज़रें उठाकर तो देखो जरा, सारे अनुबन्ध साँचों में ढल जायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! झूठा ख़त ही हमें भेज देना कभी, आजमा कर हमें देख लेना कभी, साज-संगीत को छेड़ देना जरा, हम तरन्नुम में भरकर ग़ज़ल गायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! |
बुधवार, 4 मई 2011
"सारे अनुबन्ध साँचों में ढल जायेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
हम कमल हैं चरण-रज से खिल जायेगें! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! फूल और शूल दोनों करें जब नमन, खूब महकेगा तब जिन्दगी का चमन, आप इक बार दोगे निमन्त्रण अगर, दीप खुशियों के जीवन में जल जायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! हमने पारस सा समझा सदा आपको, हिम सा शीतल ही माना है सन्ताप को, आप नज़रें उठाकर तो देखो जरा, सारे अनुबन्ध साँचों में ढल जायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! झूठा ख़त ही हमें भेज देना कभी, आजमा कर हमें देख लेना कभी, साज-संगीत को छेड़ देना जरा, हम तरन्नुम में भरकर ग़ज़ल गायेंगे! प्यार की ऊर्मियाँ तो दिखाओ जरा, संग-ए-दिल मोम बन कर पिघल जायेंगे!! |
शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011
"आज तो मूर्ख दिवस है न!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बुद्धिमान बुद्धू बनें, मूर्ख दिवस है आज। देवदत्त प्रसून भी, नाच रहे बिन साज।। |
मैंने गा दिया है। मगर मैंने इसे मूर्खता दिवस का उपहार समझकर उनको कह दिया "भतीजी! आज मैं..... बनने वाला नहीं हूँ!" कल-कल, छल-छल करती गंगा, मस्त चाल से बहती है। श्वाँसों की सरगम की धारा, यही कहानी कहती है।। हो जाता निष्प्राण कलेवर, जब धड़कन थम जाती हैं। सड़ जाता जलधाम सरोवर, जब लहरें थक जाती हैं। चरैवेति के बीज मन्त्र को, पुस्तक-पोथी कहती है। श्वाँसों की सरगम की धारा, यही कहानी कहती है।। हरे वृक्ष की शाखाएँ ही, झूम-झूम लहरातीं हैं। सूखी हुई डालियों से तो, हवा नहीं आ पाती है। जो हिलती-डुलती रहती है, वही थपेड़े सहती है। श्वाँसों की सरगम की धारा, यही कहानी कहती है।। काम अधिक हैं थोड़ा जीवन, झंझावात बहुत फैले हैं। नहीं हमेशा खिलता गुलशन, रोज नहीं लगते मेले हैं। सुख-दुख की आवाजाही तो, सदा संग में रहती है। श्वाँसों की सरगम की धारा, यही कहानी कहती है।। |
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
"औआ-औआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
कल एक बाल कविता लिखी थी! मेरे आग्रह पर इसे मेरी मुँहबोली भतीजी अर्चना चावजी ने बहुत मन से गाया है! आप भी इस बाल कविता का रस लीजिए! काले रंग का चतुर-चपल, पंछी है सबसे न्यारा। डाली पर बैठा कौओं का, जोड़ा कितना प्यारा। नजर घुमाकर देख रहे ये, कहाँ मिलेगा खाना। जिसको खाकर कर्कश स्वर में, छेड़ें राग पुराना।। काँव-काँव का इनका गाना, सबको नहीं सुहाता। लेकिन बच्चों को कौओं का, सुर है बहुत लुभाता।। कोयलिया की कुहू-कुहू, बच्चों को रास न आती। कागा की प्यारी सी बोली, इनका मन बहलाती।। देख इसे आँगन में, शिशु ने बोला औआ-औआ। खुश होकर के काँव-काँवकर, चिल्लाया है कौआ।। |
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