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बुधवार, 19 दिसंबर 2018

गीत "पहाड़ों की सतह में" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

है यहाँ जीवन कठिन,
वातावरण कितना सलोना।
बाँटता सुख है सभी को,
मखमली जैसा बिछौना।

पेड़-पौधें हैं सजीले,
खेत हैं सीढ़ीनुमा,
पर्वतों की घाटियों में,
पल रही है हरितिमा,
प्राणदायक बूटियों से,
महकता जंगल का कोना।

शारदा, गंगो-जमुन का,
है यहीं पर स्रोत-उदगम,
मन्दिरों-देवालयों की,
छटा अद्भुत और अनुपम,
किन्तु आकर कुछ दरिन्दे,
खेल रचते हैं घिनौना।

चोटियों पर बर्फ की चादर
यहाँ किसने बिछायी,
घाटियों में नीर की गागर,
छनक-छन-छनछनायी,
देख कुदरत का करिश्मा,
हो गया इन्सान बौना।

इन पहाड़ों की सतह में,
बस रहे कुछ प्राण भी हैं
कंकड़ों और पत्थरों में
रम रहे भगवान भी हैं,
नाम है पत्थर मगर,
पाषाण हैं अनमोल सोना।
 बाँटता सुख है सभी को,
मखमली जैसा बिछौना।।

1 टिप्पणी:

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