खेल-कूद में रहे रात-दिन, अब पढ़ना मजबूरी है। सुस्ती - मस्ती छोड़, परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।। मात-पिता,विज्ञान,गणित है, ध्यान इन्हीं का करना है। हिन्दी की बिन्दी को, माता के माथे पर धरना है।। देव-तुल्य जो अन्य विषय है, उनके भी सब काम करेगें। कर लेंगें, उत्तीर्ण परीक्षा, अपना ऊँचा नाम करेंगे।। श्रम से साध्य सभी कुछ होता, दादी हमें सिखाती है। रवि की पहली किरण, हमेशा नया सवेरा लाती है।। |
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शुक्रवार, 2 मार्च 2012
"परीक्षा देना बड़ा जरूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012
"रंग-बिरंगे सुमन सुहाते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
मौसम कितना हुआ सुहाना। रंग-बिरंगे सुमन सुहाते। सरसों ने पहना पीताम्बर, गेहूँ के बिरुए लहराते।। दिवस बढ़े हैं शीत घटा है, नभ से कुहरा-धुंध छटा है, पक्षी कलरव राग सुनाते। काँधों पर काँवड़ें सजी हैं, बम भोले की धूम मची है, शिवशंकर को सभी रिझाते। होली की मस्ती छाई है, अपनी बेरी गदराई है, झूम-झूम सब हँसते गाते। निर्मल है नदियों का पानी, पेड़ों पर छा गई जवानी, खुश हो करके ये इठलाते। बच्चों अब मत समय गँवाओ, पढ़ने में भी ध्यान लगाओ, सीख काम की हम सिखलाते। प्रतिदिन पुस्तक को दुहराओ, पास परीक्षा में हो जाओ, श्रम से सभी सफलता पाते। |
रविवार, 27 फ़रवरी 2011
"परीक्षा की खातिर..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
![]() हिन्दी ने बहुत सताया है। अंग्रेजी की देख जटिलता, मेरा मन घबराया है।। भूगोल और इतिहास मुझे, बिल्कुल भी नही सुहाते हैं। श्लोकों के कठिन अर्थ, मुझको करने नही आते हैं।। देखी नही किताब उठाकर, खेल-कूद में समय गँवाया, अब सिर पर आ गई परीक्षा, माथा मेरा चकराया।। बिना पढ़े ही मुझको, सारे प्रश्नपत्र हल करने हैं। किस्से और कहानी से ही, कागज-कॉपी भरने हैं।। नाहक अपना समय गँवाया, मैं यह खूब मानता हूँ। स्वाद शून्य का चखना होगा, मैं यह खूब जानता हूँ।। तन्दरुस्ती के लिए खेलना, सबको बहुत जरूरी है। किन्तु परीक्षा की खातिर, पढ़ना-लिखना मजबूरी है।। |
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