दोहे "गंगास्नान मेला"


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दोहे "गंगास्नान मेला"


देती नरकचतुर्दशी, सबको यह सन्देश। साफ-सफाई को करो, सुधरेगा परिवेश।। -- दीपक यम के नाम का, जला दीजिए आज। पूरी दुनिया से अलग, हो अपने अंदाज।। -- जन्मे थे धनवन्तरी, करने को कल्याण। रहें निरोगी सब मनुज, जब तक तन में प्राण।। -- भेषज लाये धरा से, खोज-खोज भगवान। धन्वन्तरि संसार को, देते जीवनदान।। -- रोग किसी के भी नहीं, आये कभी समीप। सबके जीवन में जलें, हँसी-खुशी के दीप।। -- त्यौहारों की शृंखला, पावन है संयोग। इसीलिए दीपावली, मना रहे सब लोग।। -- कुटिया-महलों में जलें, जगमग-जगमग दीप। सरिताओं के रेत में, मोती उगले सीप।। |
-- कुलदीपक के है लिए, पर्व अहोई खास। होती है सन्तान पर, माताओं को आस।1। -- माताएँ इस दिवस पर, करती हैं अरदास। उनके सुत का हो नहीं, मुखड़ा कभी उदास।2। -- सन्तानों के लिए है, यह अद्भुत त्यौहार। बेटा-बेटी में करो, समता का ब्यौहार।3। -- शिशुओं की किलकारियाँ, गूँजें सबके द्वार। मिलता बड़े नसीब से, मात-पिता का प्यार।4। -- घर के बड़े-बुजुर्ग है, जीवन में अनमोल। मात-पिता के प्यार को, दौलत से मत तोल।5। -- चाहे कोई वार हो, कोई हो तारीख। संस्कार देते हमें, कदम-कदम पर सीख।6। -- जीवन में उल्लास को, भर देते हैं पर्व। त्यौहारों की रीत पर, हमको होता गर्व।7। -- माता जी सिखला रही, बहुओं को सब ढंग। होते हर त्यौहार के, अपने-अपने रंग।8। -- |
धन के बल पर जुट रहा, भारी
आज हुजूम। कृषक-दिवस के नाम पर,
आडम्बर की धूम।। माटी में करता कृषक, खुद
को मटिया-मेट। फिर भी भरता जा रहा, वो
दुनिया का पेट।। दीन-हीन क्यों हो गया, धरती
का भगवान। देख कृषक की दुर्दशा, भारत
माँ हैरान।। चाहे भारत में रही, कोई
भी सरकार। नहीं किसानों को दिया,
जीवन का आधार।। झूठे भाषण सब करें, झूठी
करते प्रीत। है पोषण के नाम पर, शोषण
की सब रीत।। जागो श्रमिक-किसान अब, धरती
करे पुकार। दूर सियासत से करो, झूठे
नम्बरदार।। कहते भारत देश से, खेत
और खलिहान। शासक बनना चाहिए, धरती
का भगवान।। |
शशि की किरणों में भरी, सबसे अधिक उजास। शरदपूर्णिमा धरा पर, लाती है उल्लास।१। -- लक्ष्मीमाता धरा पर , आने को तैयार। शरदपूर्णिमा पर्व पर, लेती हैं अवतार।२। -- त्यौहारों का आगमन, करे कार्तिक मास। सरदी का होने लगा, अब कुछ-कुछ आभास।३। -- दीपमालिका आ रही, लेकर अब उपहार। देता शुभसन्देश है, पावस का त्यौहार।४। -- दमक उठे हैं रात में, कोठी-महल-कुटीर। नदियों में बहने लगा, निर्मल पावन नीर।५। -- अमृत वर्षा कर रही, शरदपूर्णिमा रात। आज अनोखी दे रहा, शरदचन्द्र सौगात।६। -- खिला हुआ है गगन में, उज्जवल-धवल मयंक। नवल-युगल मिलते गले, होकर आज निशंक।७। -- निर्मल हो बहने लगा, सरिताओं में नीर। मन्द-मन्द चलने लगा, शीतल-सुखद समीर।८। -- शरदपूर्णिमा दे रही, सबको यह सन्देश। तन-मन, आँगन-गेह का, करो स्वच्छ परिवेश।९। -- फसल धान की आ गयी, खुशियाँ लेकर साथ। भरा रहेगा धान्य से, मजदूरों का हाथ।१०। -- |
अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार।। -- विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार। आज झूठ है जीतता, सत्य रहा है हार।। -- रावण के जब बढ़ गये, भू पर अत्याचार। लंका में जाकर उसे, दिया राम ने मार।। -- तब से पुतले दहन का, बढ़ता गया रिवाज। मन का रावण आज तक, जला न सका समाज।। -- आज भोग में लिप्त हैं, योगी और महन्त। भोली जनता को यहाँ, भरमाते हैं सन्त।। -- दावे करते हैं सभी, बदलेंगे तकदीर। अपनी रोटी सेंकते, राजा और वजीर।। -- मनसा-वाचा-कर्मणा, नहीं सत्य भरपूर। आम आदमी मजे से, आज बहुत है दूर।। -- |
![]() -- पूरे श्रद्धा-भाव से, किये श्राद्ध निष्पन्न। पितृअमावस पर हुए, काम सभी सम्पन्न।। -- अब आयेंगे सामने, माता के नवरूप। निष्ठा से पूजन करो, लेकर दीपक-धूप।। -- सच्चे मन से कीजिए, माता का गुण-गान। माता तो सन्तान का, ऱखती पल-पल ध्यान।। -- अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास। करो प्रेम से आरती, रक्खो व्रत-उपवास।। -- शुद्ध बनाने के लिए, आते हैं नवरात्र। ज्ञानी बनने के लिए, पढ़ो नियम से शास्त्र।। सारे सपनों को करें, माता जी साकार। कर्मों से ही तो बने, जीवन का आधार।। -- ज्ञानदायिनी शारदे, भर दो खाली ताल। वीणा की झंकार से, कर दो मुझे निहाल।। -- |
सबके अपने ढंग हैं, सबके अलग रिवाज। श्राद्ध पक्ष में कीजिए, विधि-विधान से काज।। -- मात-पिता को मत कभी, देना तुम सन्ताप। पितृपक्ष में कीजिए, वन्दन-पूजा-जाप।। -- जिनके पुण्य-प्रताप से, रिद्धि-सिद्धि का वास। उनका कभी न कीजिए, जीवन में उपहास।। -- वंशबेल चलती रहे, ऐसा वर दो नाथ। पितरों का तर्पण करो, भक्ति-भाव के साथ।। -- अभ्यागत को देखकर, होना नहीं उदास। पूरे श्रद्धाभाव से, रक्खो व्रत-उपवास।। -- जग में आवागमन का, चलता रहता चक्र। अन्तरिक्ष में ग्रहों की, गति होती है वक्र।। -- अच्छे कामों को करो, सुधरेगा परलोक। नेकी के ही कर्म से, फैलेगा आलोक।। -- |
श्री गणेश चतुर्थी -- आदिदेव के नाम से, करना सब शुभ-कार्य। गणपति की पूजा करो, कहते धर्माचार्य।। -- भर देता नवऊर्जा, चतुर्दशी का पर्व। गणपति के त्यौहार पर, भक्तों को है गर्व।। हुआ चतुर्थी से शुरू, गणपति जी का पर्व। हर्षित होते दस दिवस, सुर-नर, मुनि गन्धर्व।। वन्दन-पूजन से किया, सबने विदा गणेश। विघ्नविनाशक आप ही, सबके हो प्राणेश।। बाधाओं का शमन हो, मिट जायेंगे रोग। मोदक से विध्नेश को, आप लगायें भोग।। रमा और माँ शारदे, रहें आपके साथ। रखना मेरे शीश पर, गणनायक जी हाथ।। मूषक ढोता आपका, भारी-भरकम भार। गणपति मेरे सदन में, आओ बारम्बार।। |